भास्कर 360 डिग्री / पठानकोट से पुलवामा हमले तक पहले ही ही मिली खुफिया सूचना, तो क्यों शहीद हो रहे जवान



Attack information was still did not make security arrangements.
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Attack information was still did not make security arrangements.

  • पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले से देश आक्रोश में है
  • साथ ही इस घटना ने देश के खुफिया तंत्र और इस तंत्र के सुरक्षा बलों से तालमेल पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। 

Dainik Bhaskar

Feb 17, 2019, 12:36 PM IST

नई दिल्ली .  जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने पुलवामा की घटना को खुफिया विफलता बताया है। दूसरी ओर खुफिया सूत्रों का दावा है कि हमले से एक सप्ताह पहले 8 फरवरी को कश्मीर पुलिस महानिरीक्षक की ओर से संभावित आतंकी हमले की चेतावनी का एक खुफिया इनपुट जारी किया गया था। एक्स्ट्रीमली अर्जेन्ट शीर्षक से जारी उनका एक पत्र भी मीडिया तक पहुंच चुका है। इसमें स्पष्ट लिखा है कि सुरक्षा बल तैनाती से पहले अपने स्थान की अच्छी तरह से जांच कर लें। क्योंकि आईईडी की मदद से हमले के इनपुट मिले हैं।

 

यह पत्र दक्षिणी श्रीनगर, उत्तरी श्रीनगर,  उत्तरी कश्मीर (बारामूला), दक्षिणी कश्मीर (अवंतीपुरा), दक्षिणी कश्मीर (अनंतनाग) क्षेत्रों के डीआईजी तथा डीआईजी सशस्त्र सीमा बल के नाम था। इसके अलावा सीमा सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, सेना तथा वायु सेना को भी संभावित हमले की जानकारियां देने की बात इस पत्र में है। बताते हैं कि राज्य पुलिस द्वारा साझा इन इनपुट्स के साथ 33 सेकंड का एक वीडियो भी अटैच था, जो "313_get' नाम के ट्विटर किसी हैंडल पर अपलोड हुआ था।

 

वीडियो में सोमालिया के सुरक्षा दस्ते पर आतंकी हमले का दृश्य था। वीडियो के नीचे कश्मीर में भी एेसे ही हमले की बात लिखी हुई थी। यानी पुख्ता इनपुट्स होने के बावजूद हम 40 से ज्यादा जवान खो बैठे। हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब खुफिया एजेंसी इनपुट्स देने का दावा करती रहीं और घाटी में आतंकी मंसूबे कामयाब हो गए। हाल के वर्षों में पठानकोट से लेकर अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों के बीच तालमेल पर सवाल खड़े करते हैं।

 

तीन साल में हुए इन 5 हमलों के बाद भी यही उठा सवाल

 

1 . पठानकोट एयरबेस हमला : 2 जनवरी 2016 को पंजाब के पठानकोट एयरफोर्स बेस में चार आंतकियों ने हमला कर दिया था। आतंकी सेना की वर्दी में घुसे थे, सभी आतंकी मार गिराए गए, लेकिन इस मुठभेड़ में 7 जवान भी शहीद हो गए थे। हमले से कुछ दिन पहले गृह मंत्रालय की तरफ से एक इंटेलीजेंस अलर्ट जारी किया गया था। कहा गया था कि आतंकी इस बार पंजाब को निशाना बना सकते हैं। हमले से दो दिन पहले गुरदासपुर के एसपी सलविंदर सिंह को 4 आतंकियों ने किडनैप कर लिया था। इसके बाद पठानकोट और गुरदासपुर को सील तक कर दिया गया था। फिर भी हमला नहीं रोका जा सका।

 

2 . पंपोर में सीआरपीएफ पर हमला : 26 जून 2016 को दक्षिण कश्मीर के पंपोर शहर में आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया था। हमले में 8 जवान शहीद हो गए थे। जवाबी कार्रवाई में 2 आतंकी भी मारे गए। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा ने ली थी। सोमवार शाम 4 बजकर 40 मिनट पर हुई इस घटना के दिन सुबह सात बजे एक अलर्ट जारी हुआ था। इसमें कहा गया था कि सीआरपीएफ के वाहनों को आतंकी निशाना बना सकते हैं। चार दिन पहले उत्तरी कश्मीर से निकले लश्कर के एक आत्मघाती दस्ते को इस इलाके में वारदात को अंजाम देने का जिम्मा मिला था। यह जानकारियां सुरक्षा एजेंसियों के पास थीं।

 

3 . उरी में सेना के हेडक्वार्टर पर हमला : 18 सितंबर 2016 को जम्मू कश्मीर के उरी सेक्टर में लाइन अॉफ कंट्रोल के पास 4 आंतकियों ने आर्मी हेडक्वार्टर पर हमला किया था।  हमले में सेना के 19 जवान शहीद हो गए। सूत्रों का दावा है कि इससे तीन दिन पहले भी खुफिया एजेंसियों ने सेना को एक अलर्ट जारी किया था। एजेंसियों ने सेना को एलओसी के पास लश्कर के आठ आतंकी मौजूद होने और उरी को टारगेट करने से संबंधित इनपुट दिए थे। यह खुफिया अलर्ट सभी सुरक्षाबलों और सेना से साझा किया गया था। हमले के बाद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी माना कि उरी हमले में कहीं न कहीं चूक तो हुई थी।

 

4 . अमरनाथ यात्रियों पर हमला : 10 जुलाई 2017 को अमरनाथ दर्शन कर लौट रहे 60 यात्रियों की बस पर जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में आतंकियों ने हमला किया था। इसमें 7 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी। इससे करीब 15 दिन पहले चंडीगढ़ में जम्मू-कश्मीर पुलिस, सीआरपीएफ और आईबी के अधिकारियों की मल्टी-एजेंसी कोऑर्डिनेशन मीटिंग में अमरनाथ यात्रियों पर हमले का इनपुट साझा किया गया था। इन्हें अनंतनाग के एसएसपी की ओर से आतंकियों द्वारा 100 से 150 यात्रियों और तकरीबन 100 पुलिस अधिकारियों की हत्या की योजना का इनपुट मिला था।

 

5 . सुंजुवान मंे आर्मी कैंप पर हमला : 10 फरवरी 2018 की सुबह सेना की वर्दी में आए आतंकियों ने जम्मू शहर के सुंजवान स्थित सेना के शिविर पर हमला किया था। 24 घंटे से ज्यादा चली मुठभेड़ में 4 आतंकी मारे गए, लेकिन 11 सैनिकों को जान गंवानी पड़ी। इससे पहले खुफिया रिपोर्टों में कहा गया था कि संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की पांचवीं बरसी (9 फरवरी) पर आतंकवादी किसी बड़े हमले की साजिश रच रहे हैं। तब खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने बताया था कि संयोग से आर्मी और पैरामिलिट्री को सतर्कता बरतने के लिए निर्देश दिया गया था। इसलिए बड़ा हमला नाकाम हो गया।

 

हमारी खुफिया एजेंसियां इन तीन तरीकों से जुटा रही हैं सूचनाएं  : खुफिया ब्यूरो से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि ऐसी अनेक बड़ी घटनाएं हुईं हैं, जिनमें पहले से इंटेलीजेंस इनपुट तो अपार थे, लेकिन उनका गलत विश्लेषण हुआ। इसलिए इनका फॉलोअप नहीं हो सका। फिलहाल सेना को तीन तरह से इनपुट मिल रहे हैं। ह्यूमिंट- यह गुप्तचरों से मिलता है, टेकइंट- यह टेक्नोलॉजी डिवाइस से मिलता है, जिनमें सीसीटीवी कैमरों से लेकर अन्य भौतिक उपकरण शामिल होते हैं। तीसरा ओएसइंट- यह ओपन सोर्स इंटेलिजेंस इनपुट को कहते हैंं।

 

ह्यूमिंट और टेकइंट इस बात पर निर्भर होते हैं कि दुश्मन के खेमे में आपकी कितनी पैठ है। इन तीनों तरह के इनपुट्स से खुफिया सूचनाओं की बाढ़ आ जाती है। इनमें से 90% इनपुट ओपन सोर्स से मिल जाता है। मगर इसका सही प्रमाण तभी मिलता है, जब ह्यूमिंट और टेकइंट की सूचनाओं की कड़ियों को जोड़ते हुए पूरी कहानी तैयार हो। कड़ियों को जोड़ने का यह काम इंटेलीजेंस एजेंसी की एनालिसिस डेस्क करती है।

 

सूचनाएं ज्यादा, इसलिए गंभीर मामले पहचानना मुश्किल : यहां हजारों की संख्या में मिली रिपोर्ट्स छनकर कम होती चली जाती हैं। सभी मानकों के आधार पर इस बात का फैसला लिया जाता है कि किस इनपुट को कितना महत्व दिया जाए। इसे सेनिटी चेक कहते हैं। इसमें कई संभावनाओं पर गौर किया जाता है। फिर खुफिया सूचना को कार्रवाई के लिए आगे बढ़ाया जाता है। इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडी एंड एनालिसिस के अनुसार इनपुट्स की अधिकता के कारण इनका विश्लेषण करने वालों पर दबाव बढ़ गया है।

 

यदि उनके पास कोई सूचना है और उसे कार्रवाई के लिए इसलिए आगे नहीं भेजते कि उस पर पूरा यकीन नहीं है, तो डर बना रहता है। इसे इंटेलीजेंस एजेंसियों की भाषा में 'क्राई वुल्फ सिन्ड्रोम' कहा जाता है। यही वजह है कि खुफिया एजेंसी कई बार कम गंभीर मामलों में भी अलर्ट जारी कर देती हैं। एेसे में गंभीर मामलों को भी सामान्य समझ लेने का डर बना रहता है।

 

ऐसे ले रहे हैं शहादत का बदला 

 

एक जवान के बदले दो आतंकी मार रहे हैं हम : गृह मंत्रालय के अनुसार साल 2014 से 2018 के बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमलों में शहीद होने वाले जवानों की संख्या में 93 फीसदी का इजाफा हुआ है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक इन तकरीबन पांच साल में हर एक जवान के बदले हम 2 से ज्यादा आतंकी मार रहे हैं। हालांकि मनमोहन सरकार के 10 साल में हर जवान के बदले 3 से ज्यादा आतंकी मार दिए गए थे।

 

मोदी के 5 साल 390 जवान शहीद : भाजपा के पूर्ण बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी मई 2014 से प्रधानमंत्री हैं। तब से 14 फरवरी 2019 तक सुरक्षा बलों के 390 जवान शहीद हो गए। मगर सेना ने 878 आतंकियों को मार गिराने में सफलता हासिल की। 200 आम नागरिक भी आतंकी घटनाओं का शिकार बने।

 

मनमोहन के 10 साल 1097 जवान शहीद : इनका प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल मई 2004 से मई 2014 तक रहा। इस दौर के आंकड़े देखें तो 1097 जवान शहीद हुए। 3957 आतंकी मारे गए। 1632 आम लोगों की जान भी चली गई। 2005 में सर्वाधिक 1000 आतंकी मारे गए, लेकिन 218 सैनिक भी शहीद हुए।

 

अटल के 6 साल 3020 जवान शहीद : अटल सरकार का कार्यकाल मार्च 1998 से मई 2004 तक रहा। इस बीच सुरक्षा बलों के 3020 जवान शहीद हुए। मगर 10460 आतंकी मार दिए गए। वहीं मारे गए आम नागरिकों की संख्या 5255 रही। 1999 में कारगिल युद्ध हुआ था इसलिए ज्यादा जवान शहीद हुए।

 

कारगिल युद्ध के बाद लगातार तीन साल हमने ज्यादा जवान गंवाए : 1999 में खत्म हुए कारगिल युद्ध के बाद सन 2000 में भारतीय सुरक्षा बलों के 638 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद 2001 में 590 तथा 2002 में 469 जवानों ने जान गंवाई। कारगिल युद्ध के बाद से अब तक के आंकड़ों में ये सबसे ज्यादा है। वहीं सबसे कम जवान 2012 में शहीद हुए थे। तब हमें 17 जवान खोने पड़े थे। इसके अलावा 2011 में 30 और 2015 में 41 जवान हमने खोए हैं।

 

 

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