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अयोध्या / सुप्रीम कोर्ट ने परंपरा तोड़ी, 1045 पन्नों के फैसले में इसे लिखने वाले जज का नाम नहीं



प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

  • आमतौर पर बेंच की तरफ से कोई एक जज फैसला लिखता है, डॉक्युमेंट में उसके नाम का जिक्र होता है
  • अयोध्या को राम की जन्मभूमि बताने के तर्कों और विवरण वाली 116 पन्ने की परिशिष्ट अलग से जोड़ी गई

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 08:36 PM IST

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के विवादित स्थल पर शनिवार को फैसला सुना दिया। 5 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया। साथ ही मस्जिद के लिए अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने के लिए कहा गया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच ने 1045 पन्नों में अपना फैसला सुनाया है। हालांकि, यह फैसला किसने लिखा है, इसका खुलासा नहीं किया गया। 

 

आमतौर पर किसी भी फैसले में बेंच की तरफ से उसे लिखने वाले जज के नाम का जिक्र होता है। लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट ने परंपरा तोड़ते हुए फैसला लिखने वाले जज का नाम नहीं दिया। आमतौर पर ऐसा नहीं होता। अयोध्या मामले की सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ ने किया। इसमें चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। 

 

इससे पहले मौजूदा समय के फैसलों में ऐसा कोई वाकया नहीं रहा, जब सुप्रीम कोर्ट के किसी भी फैसले में जजमेंट के लेखक का नाम न दिया हो। सोशल मीडिया पर भी लोग इस पर आश्चर्य जता रहे हैं। 

 

अडेंडम के लिए बेंच के जज ने अलग से तथ्यों की जांच की

फैसले की एक बड़ी बात यह है कि इसमें 929 पन्नों के आगे 116 पन्ने अडेंडम (परिशिष्ट) में जोड़े गए हैं। इनमें विवादित स्थल के भगवान राम के जन्मस्थान होने से जुड़े तर्क और विवरण दिए गए है। इस परिशिष्ट के लेखक का नाम भी नहीं दिया गया है। पेज 929 के आखिरी पैराग्राफ में लिखा है, “हम में से एक जज ने ऊपर दिए गए तर्कों और निर्देशों से सहमति जताने के बाद भी इस बात पर अलग से तर्क खंगाला है- क्या विवादित ढांचा हिंदू आस्था और विश्वास के आधार पर भगवान राम का जन्मस्थान है? इससे जुड़े तर्क अडेंडम में रखे गए हैं।

 

धार्मिक ग्रंथों से विवादित स्थल के राम जन्मभूमि होने की पुष्टि: अडेंडम

116 पन्नों की परिशिष्ट को लिखने वाले जज ने अलग-अलग प्राचीन लेख और धर्मग्रंथों के हवाले से कहा, “1528 से पहले की अवधि में पर्याप्त धार्मिक ग्रंथ मौजूद थे, जिनकी वजह से हिंदू राम जन्मभूमि के वर्तमान स्थल को भगवान राम का जन्मस्थान मानते थे।”

 

फैसले के अंत में लिखा गया, “इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि मस्जिद के निर्माण के पहले हो या बाद में हिंदुओं की आस्था और विश्वास हमेशा से रहा है कि वही स्थल राम का जन्मस्थान है, जहां बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ। यह आस्था और विश्वास की डॉक्युमेंट्री और मौखिक सबूतों से सिद्ध होता है।” 

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