भास्कर ओपिनियनहिजाब का विरोध:बाबुल मोहे लोहार के घर दे दीजो, जो मेरी ज़ंजीरें पिघलाए…

2 महीने पहले
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एक तरफ इस्लामिक देश ईरान में महिलाएँ, बच्चियाँ हिजाब के खिलाफ लड़ रही हैं। लाख बंदिशों के बावजूद सड़कों पर उतरकर हिजाब को जला रही हैं। विरोध में चोटियाँ काट- काटकर फेंक रही हैं और दूसरी तरफ़ भारत में हिजाब पहनने के लिए संघर्ष हो रहा है। ईरान की बात समझ आती है कि वहाँ बच्चियों को आज़ादी चाहिए।

… निश्चित ही भारतीय बच्चियाँ भी आजादी ही चाहती हैं। हिजाब के पक्ष में उनका आंदोलन हो सकता है उनकी मर्जी से हो रहा हो, लेकिन बच्चियों को आजादी तो हर हाल में चाहिए ही। आजादी यह भी हो सकती है कि उनकी मर्जी हो तो वे हिजाब पहनें, मर्जी न हो तो न पहनें। यह हर हाल में उनका अपना निर्णय होना चाहिए।

ईरान में प्रदर्शन कर रहीं महिलाओं की मांग है कि हिजाब को अनिवार्य की जगह वैकल्पिक किया जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो ईरानी महिलाएं चाहती हैं कि हिजाब उन पर थोपा न जाए, बल्कि वे अपनी मर्जी के हिसाब से ही इसे पहनें या न पहनें।
ईरान में प्रदर्शन कर रहीं महिलाओं की मांग है कि हिजाब को अनिवार्य की जगह वैकल्पिक किया जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो ईरानी महिलाएं चाहती हैं कि हिजाब उन पर थोपा न जाए, बल्कि वे अपनी मर्जी के हिसाब से ही इसे पहनें या न पहनें।

उधर ईरान की बच्चियाँ खुलकर कह रही हैं- हिजाब का विरोध युवाओं की बगावत है। बूढ़े मौलवियों को यह बात समझ में नहीं आएगी। एक ईरानी बच्ची ने कहा- हिजाब पहनकर मुझे लगता था- मैं दोयम दर्जे की जिन्दगी जी रही हूँ। हिजाब उतार फेंका। अब ताकत का एहसास हो रहा है। एक और बच्ची ने कहा- हिजाब मेरे लिए एक बंधन था। निरा बंदिश। मैंने हिजाब हटाकर खुद को पा लिया है।

बच्चियों को कई बंधनों से मुक्ति चाहिए। जो ज्यादातर स्थानों, शहरों, कस्बों, गाँवों और घरों में भी मिल नहीं पाती या दी नहीं जाती। असल लड़ाई इन बंधनों से मुक्ति की ही है। नाम चाहे हिजाब का हो, बे वक्त की टोका-टोकी का हो, पहनावे- बोल-चाल या रंग-ढंग का ही क्यों न हो।

बच्चियों के लिए समाज, शहर, देश में, इर्द- गिर्द और दूर- पास की हवा तक में इतनी मनाहियां, इतने इनकार और इतने विरोध होते हैं कि साँसें सुलग उठती हैं, लेकिन कोई सुनने- समझने को तैयार नहीं होता। न पिता, न पति, न काका, न बाबा, न भाई, न छोटा, न बड़ा। यही वजह है कि भारत में बच्चियों की आजादी के लिए तरह- तरह के, सुंदर और रुला देने वाले गीत लिखे गए। ये गीत अपने आप में महज गीत नहीं, तीव्र आंदोलन भी हैं। प्रसून जोशी ने लिखा-

बाबुल जिया मोरा घबराए… बिन बोले रहा न जाए… बाबुल जिया मोरा घबराए। बाबुल मोरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे सुनार के घर ना दीजो, मोहे जेवर कभी ना भाए… बाबुल जिया मोरा घबराए। बाबुल मोरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे राजा घर ना दीजो मोहे राज न करना आए.. बाबुल जिया मोरा घबराए। बाबुल मोरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे लोहार के घर दे दीजो जो मेरी जंजीरें पिघलाए… बाबुल जिया मोरा घबराए।

ईरानी महिलाओं ने 20 सितंबर को देश में एंटी हिजाब कैंपेन चलाया और बिना हिजाब वाले वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए। इसके बाद दूसरे देशों में रह रही ईरानी महिलाओं ने भी अपने-अपने स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।
ईरानी महिलाओं ने 20 सितंबर को देश में एंटी हिजाब कैंपेन चलाया और बिना हिजाब वाले वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए। इसके बाद दूसरे देशों में रह रही ईरानी महिलाओं ने भी अपने-अपने स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।

इन्हीं बंदिशों, बंधनों और जंजीरों के खिलाफ जब अमृता प्रीतम ने कलम उठाई तो कागज पर कुछ इस तरह के मोती बिखरे…

आज मैंने अपने घर का नंबर मिटाया है, गली के सिरे पर लगा गली का बोर्ड हटाया है, और शहर की हर दिशा का नाम पोंछ दिया है, पर अगर तुम्हें मुझसे जरूर मिलना है, तो हर देश के हर शहर की हर गली का हर दरवाज़ा खटखटाओ, और जिस जगह स्वतंत्र रूह की झलक पड़े, समझना वो मेरा घर है।।