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आजाद हिंद फौज / बहादुर सिंघाडा सिंह ने भूखे पेट 1100 मील चलकर लड़ा सबसे भयानक युद्ध



Bahadur Singhda Singh fought the most terrible war by walking 1100 miles on a hungry stomach.
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Bahadur Singhda Singh fought the most terrible war by walking 1100 miles on a hungry stomach.

  • सुभाषचंद्र बोस ने अपने इस कमांडर को दिया था सरदार-ए-जंग सम्मान

Dainik Bhaskar

Aug 24, 2019, 04:34 PM IST

प्रो कपिल कुमार | दिल्ली. आजाद हिंद फौज के इस बहादुर अफसर पर भी लाल किले में राजा के खिलाफ युद्ध अपराधों को लेकर मुकदमा चलाया गया था। सिंघाडा सिंह ने इम्फाल के युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। इम्फाल की लड़ाई को दूसरे विश्वयुद्ध की सबसे भयानक लड़ाइयों में से एक  माना जाता है और इसलिए अंग्रेज चुन-चुनकर आजाद हिंद फौज के उन अफसरों पर मुकदमे चला रहे थे, जिन्होंने वहां उनके दांत खट्टे किए थे। लेकिन ये अफसर न तो विचलित हुए और न ही अंग्रेजों के सैनिक न्यायालयों में टूटे।

 

इतिहास के पन्नों में भुला दिए गए ऐसे ही एक बहादुर थे मेजर सिंघाडा सिंह मान, जिन्हें उनकी वीरता के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सरदार-ए-जंग, जो कि आजाद हिंद सेना के सैनिकों की वीरता का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान था, से नवाज़ा। इसके साथ-साथ उन्हें वीर-ए-हिंद का पदक भी रंगून में दिया गया। 

 

सिंघाडा सिंह, कर्नल गुलजार सिंह की ब्रिगेड में कम्पनी कमांडर थे। इनकी कम्पनी लगभग 1100 मील पैदल चलकर असम के इम्फाल युद्धक्षेत्र पहुंची थी। लगभग 15 दिन तक कंपनी को पूरा खाना भी नहीं मिला था। लेकिन  इसके बावजूद सिंघाडा सिंह और उनकी कम्पनी ने अंग्रेजों से भयंकर युद्ध लड़ा। जब सिंघाडा सिंह पर मुकदमा शुरू हुआ तो अपना पक्ष रखते हुए इस वीर ने कहा था- ‘मेरा अपराध मेरी देशभक्ति है, इसलिए मुझे कोर्ट के निर्णय पर कोई ताज्जुब नहीं है। मैं तो अपने देश और अपने देशवासियों के निर्णय के लिए हूं, केवल एक सिख रहने की जगह मैंने देशभक्त भारतीय बनना पसंद किया। हम केवल भारतीय हैं प्रारंभ से अंत तक।’ 

 

इसी दौरान कैप्टन फतेह खान के साथ एक संयुक्त पत्र में उन्होंने लिखा- ‘जो भी कुछ हमने किया वह अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य के रूप में किया और इसके लिए कोर्ट जो भी सजा मुझे देगा, वह मुझे खुशी-खुशी स्वीकार है। हमें इस बात की प्रसन्नता है कि हमारे देश ने हमारी सेवाओं को मान्यता दी। हमारी आशा है कि अब वह समय ज्यादा दूर नहीं है जब यह अंग्रेजी सरकार हमारी पवित्र भूमि से जड़ समेत उखाड़ कर फेंक दी जाएगी।’

 

बंटवारे के बाद भारत आकर झेलीं कई मुश्किलें
मेजर सिंघाडा सिंह के मुकदमे को दिल्ली छावनी स्थित सैनिक अदालत में भेज दिया गया था, जहां सुनवाई के बाद उन्हें 14 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। बाद में सिंघाडा सिंह को मुल्तान की जेल में रखा गया था लेकिन भारतीय जनता के दबाव के चलते आजादी के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। दुर्भाग्यवश इस वीर को विभाजन के कारण पंजाब में अपना गांव छोड़कर भारत आना पड़ा। अपने जीवनयापन के लिए कठिनाइयों को झेलते हुए 1959 में वह बड़ौदा आ गए थे, जहां पर 2001 में उनकी मृत्यु हो गई।

 

हवलदार रणजीत सिंह, जिन्हें बोस ने कहाः शहीद-ए-भारत 
नेताजी के आह्वान पर अंग्रेज फौज में जो भारतीय सिपाही थे, उनमें से कई आजाद हिंद फौज में आ गए थे। आजाद हिंद फौज के हवलदार रणजीत सिंह को यह कार्य सौंपा गया था कि वह अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों को साथ लाने का प्रयास करें। रणजीत सिंह, झकौली गांव, रुद्रप्रयाग, गढ़वाल के रहने वाले थे और इनके पिता का नाम गौड़ सिंह था। आजाद हिंद फौज में आने से पहले रणजीत सिंह स्वयं भारतीय अंग्रेजी सेना में राइफल मैन थे। बर्मा के युद्ध में वे हाका से फालमम की ओर पहुंचे। लेकिन किसी गद्दार ने अंग्रेजी कमांडर को सूचना दे दी और रणजीत सिंह को अंग्रेज सिपाहियों ने घेर कर आत्मसमर्पण करने को कहा।

 

यह रणजीत सिंह की अग्नि परीक्षा थी। वह अकेले थे और दूसरी तरफ 26 अंग्रेज सिपाही। जवाब में रणजीत सिंह ने ठहाका लगाया और अपनी टोमी गन से उन पर गोलियां बरसा दी। अधिकांश को रणजीत सिंह ने मार गिराया लेकिन जवाब में उन्हें भी गोलियां लगीं। इस वीर को मृत्यु उपरांत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ‘शहीदे-ए-भारत’ और ‘तमगा-ए-शत्रुनाश प्रथम श्रेणी’ से सम्मानित किया। आजाद हिंद सरकार के प्रमुख प्रशासक केसर जी. ज्ञानीजी ने जनवरी 1947 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में इस वीर का जिक्र भी किया था।

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