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ठंडा पड़ता जा रहा किसान आंदोलन:आज भारत बंद, लेकिन वैसी चर्चा नहीं जैसी जनवरी में थी; किसान नेताओं ने बदली रणनीति

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

चार महीने से आंदोलन कर रहे किसानों ने आज भारत बंद का ऐलान किया है। लेकिन जिस तरह जनवरी या फरवरी की शुरुआत तक किसानों के मुद्दे को लेकर लोगों की रुचि थी वैसी अब कहीं नजर नहीं आ रही है। जाहिर है मीडिया का फोकस भी अब पर किसान नहीं हैं।

बीते चार महीने में सरकार और किसानों के बीच 11 दौर की बात हो चुकी है। सरकार की तरफ से आखिरी प्रस्ताव डेढ़ साल तक तीनों कृषि कानूनों को होल्ड करने का दिया गया था। लेकिन किसान इन्हें पूरी तरह से खत्म करने पर अड़े हुए हैं।

भारतीय किसान यूनियन (BKU) के प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं, 'आंदोलन ठंडा बिल्कुल नहीं पड़ा है। सत्तासीन भाजपा ऐसा प्रचार कर रही है। मीडिया ने भी अब आंदोलन को थोड़ा कम दिखाना शुरू कर दिया है, लेकिन आंदोलन जैसे शुरू हुआ था उतने ही जोश से आगे बढ़ रहा है। और जब तक कृषि कानून वापस नहीं होते तब तक हम आंदोलन खत्म नहीं करेंगे।'

BKU के किसान नेता धर्मेंद्र मलिक बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, 'जो लोग यह सोच रहे हैं कि आंदोलन केवल बॉर्डर पर चल रहा है तो वे गलत हैं। अब यह आंदोलन हर राज्य में जिलावार स्तर पर चल रहा है। ताकि किसानों की खेती का भी नुकसान न हो और आंदोलन भी आगे बढ़ता रहे।' किसान कहते हैं कि आंदोलन अब नई रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। तो क्या है किसान आंदोलन को आगे बढ़ाने का नया फार्मूला?

बॉर्डर पर जमे किसानों के लिए लंगर की व्यवस्था की गई है। देश के कई इलाकों से किसान यहां मदद पहुंचा रहे हैं।
बॉर्डर पर जमे किसानों के लिए लंगर की व्यवस्था की गई है। देश के कई इलाकों से किसान यहां मदद पहुंचा रहे हैं।

किसान आंदोलन की नई रणनीति
किसान नेता राकेश टिकैत आज देहरादून के हरबसपुर में हैं। वहां वे स्थानीय किसानों के साथ अपनी मांगों और आंदोलन की आगे की रणनीति साझा करेंगे। बीकेयू के नेता धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, 'किसान आंदोलन का अब विकेंद्रीकरण कर दिया गया। गन्ने की कटाई और गेहूं की बुआई के लिए किसानों को अपने गांव में भी रहना है तो दूसरी तरफ आंदोलन भी चलाना है। इसलिए वरिष्ठ किसान नेता जिलावार ढंग से जाकर बैठकें कर रहे हैं।'

जिले में भी नीचे गांवों तक किसान संगठन के कार्यकर्ता बैठकों के लिए पहुंच रहे हैं। उत्तराखंड किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष भोपाल सिंह बताते हैं कि गांवों में चौपाल लगाकर हम किसानों तक पहुंच रहे हैं। उन्हें रोटेशन प्रक्रिया के तहत बॉर्डर आने की रणनीति के बारे में समझा रहे हैं। ताकि खेती का भी नुकसान न हो और आंदोलन भी ठंडा न पड़े।'

आंदोलन स्थल पर खाने-पीने और नाश्ते की पूरी व्यवस्था की गई है।
आंदोलन स्थल पर खाने-पीने और नाश्ते की पूरी व्यवस्था की गई है।

क्या है आंदोलन का 'रोटेशन' फार्मूला?
गाजीपुर बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर और सिंघु बॉर्डर में आंदोलनरत किसानों की संख्या कम होने के बाद नई रणनीति बनाई गई। किसान नेता गांवों में चौपाल कर रहे हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में अब तक दर्जनों बैठकें हो चुकी हैं। इन बैठकों में गांव के स्तर पर 10-30 के समूह में किसानों के अलग-अलग दल बनाए जा रहे हैं। एक दल बॉर्डर पर जाता है तो दूसरा दल गांव में रहता है। ताकि आंदोलन और खेती साथ-साथ चलती रहे।

लोग घरों के स्तर पर भी आंदोलन में रोटेशन की प्रक्रिया के तहत शामिल हो रहे हैं। अमृतसर से आए बलजीत सिंह 13 मार्च को अपने गांव लौट गए। वह गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलन में 3 फरवरी से सक्रिय थे। जिस दिन बलजीत सिंह घर लौटे उसी दिन उनके बेटे तेजेंदर इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं। तेजेंदर 28 मार्च को यहां से घर लौटेंगे तो 1 अप्रैल को बलजीत सिंह फिर आंदोलन के लिए बॉर्डर पर आ आएंगे।

आंदोलन का किया जा रहा विकेंद्रीकरण
राकेश टिकैत कहते हैं, 'हमने महीनों नहीं बल्कि सालों का प्रोग्राम बनाया है तो रणनीति भी उसी के हिसाब से बनानी होगी। बॉर्डर खाली न हों, इसके लिए रोटेशन के साथ ही आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए विकेंद्रीकरण यानी डिसेंट्रलाइज्ड प्रक्रिया भी अपनाई जा रही है।'

अब तक सैकड़ों महापंचायत कम से कम 10 राज्यों में की जा चुकी हैं। आगे भी महापंचायत जारी रहेंगी। अब तक मध्यप्रदेश और उत्तराखंड में 4-4, उत्तर प्रदेश में 12, पंजाब में 20 से ज्यादा, हरियाणा में 3-31, राजस्थान में 10 कर्नाटक में 3, बिहार में 2 उड़ीसा में एक, बंगाल में तीन दिन के दौरान दर्जनों महापंचायत की गईं। बीकेयू के किसान नेता धर्मेंद्र मलिक कहते हैं कि देश के हर राज्य में आगे भी इसी तरह से महापंचायत होती रहेगी।

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए भी इंतजाम किए गए हैं, ताकि उनकी शिक्षा का नुकसान न हो।
बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए भी इंतजाम किए गए हैं, ताकि उनकी शिक्षा का नुकसान न हो।

किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी ने बताया कि वे पंजाब में अलग-अलग जिलों में अब तक दर्जनों बैठकें कर चुके हैं। चढ़ूनी कहते हैं, 'आंदोलन में लोग कम नहीं हो रहे बल्कि एक रणनीति के तहत हम कुछ लोगों को गांव में और कुछ को बॉर्डर में रहने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। ताकि लोगों का काम-धंधा भी ठप न हो और आंदोलन भी चलता रहे।'

महापंचायत और चौपाल स्तर पर किसानों को आगे बड़े आंदोलन के लिए तैयार किया जा रहा है। जरूरत पड़ी तो इस बार 26 जनवरी से भी ज्यादा तादाद में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक के किसान दिल्ली में डेरा डालेंगे। किसान मंच के भोपाल सिंह कहते हैं, ' इस बार हजारों की तादाद में नहीं लाखों की तादाद में ट्रैक्टर दिल्ली में घुसेंगे।'

संसद तो बंद अब किसे घेरेंगे किसान?
राकेश टिकैत ने हाल ही में किसानों से कहा था, 'अगर उन्हें फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिले तो वे संसद में आकर अपनी फसलें बेचें। क्योंकि सरकार कहती है कि जहां चाहें वहां फसलें बेच सकते हैं।' लेकिन अब संसद ठप है तो फिर किसान संसद में कैसे फसलें बेचेंगे या उसे कैसे घेरेंगे? इस पर धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, 'संसद बंद है तो क्या हुआ, संसद में बैठने वालों के घरों के आसपास किसान डेरा डालेंगे। किसान नेताओं के घरों के बाहर अनाज से भरे ट्रैक्टर लेकर पहुंचेंगे।'

टेंट में बड़े-बुजुर्ग डेरा डाले हुए हैं। वहां उनके काम की हर चीज उपलब्ध कराई जा रही है।
टेंट में बड़े-बुजुर्ग डेरा डाले हुए हैं। वहां उनके काम की हर चीज उपलब्ध कराई जा रही है।

बॉर्डर पर चल रहा आंदोलन पड़ रहा फीका, घट रहे किसान?
किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी कहते हैं, ‘किसान आंदोलन न फीका पड़ रहा है और न किसानों की संख्या घट रही है। 10 किसान अगर वापस जाते हैं तो 20 किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए आते हैं। सिंघु बॉर्डर पर इस वक्त भी 40 हजार से ज्यादा किसान आंदोलनरत हैं। इनमें से कुछ लोग दिनभर रहते हैं और रात में चले जाते हैं।’ धर्मेंद्र मलिक भी कहते हैं, ‘आंदोलनरत लोगों की एक सटीक संख्या नहीं बताई जा सकती, क्योंकि किसान लगातार आ-जा रहे हैं। ऐसा कोई रजिस्टर नहीं बनाया है, लेकिन गाजीपुर बॉर्डर में कम से कम 10 हजार तो सिंघु और टीकरी बॉर्डर में 30-30 हजार किसान अभी स्थायी तौर पर हैं।’

आंदोलन में मतभेद
पश्चिम बंगाल में किसान नेताओं के भाजपा के खिलाफ प्रचार करने से कई किसान नेता सहमत नहीं हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य और किसान नेता दर्शनपाल कहते हैं, ' हमे भाजपा के खिलाफ प्रचार करने की जगह किसान आंदोलन और किसानों की मांगों के बारे में बात करनी चाहिए, क्योंकि चुनाव के नतीजे जो भी हों इसका असर आंदोलन पर नहीं पड़ना चाहिए। दूसरी तरफ दर्शनपाल सिंह कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम आंदोलन को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं है। भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां भी चुनाव वाले राज्यों में किसी पार्टी के पक्ष या फिर विपक्ष में चुनाव प्रचार के पक्ष में नहीं हैं। उनका तर्क है कि 'हमारा संगठन ये नहीं कह सकता कि किसे वोट देना चाहिए या किसे नहीं। हम वोट की राजनीति से बचते हैं।'

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