भास्कर 360° / आरटीआई के 14 साल बाद सीजेआई दफ्तर दायरे में आया, जानिए इससे बदलेगा क्या

Bhaskar 360 °: CJI came under the purview of RTI
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  • सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के खिलाफ ही फैसला, जजों की संपत्ति सहित प्रशासनिक फैसलों की सूचना पा सकेंगे लोग
  • पैतृक संपत्ति के झगड़े से शुरू हुए विवाद ने सीजेआई दफ्तर को भी आरटीआई दायरे में ला दिया, पढ़िए भास्कर की रिपोर्ट

दैनिक भास्कर

Nov 17, 2019, 08:30 AM IST

नई दिल्ली. फैसलों की ताकत और उनके असर को देखा जाए, तो निश्चित ही बीता हफ्ता देश के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। अयोध्या फैसले के ठीक चार दिन बाद, पांच जजों की  संविधान पीठ ने एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का दफ्तर भी अब सूचना के अधिकार के दायरे में आएगा। फैसला सुनाते हुए संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे सीजेआई रंजन गोगाेई ने सीजेआई दफ्तर को सार्वजनिक संस्था माना।

 

गौरतलब है कि देश में सूचना का अधिकार लागू होने के 14 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से सवाल पूछने का हक मिला है। हालांकि सीजेआई कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाने का आदेश देते वक्त संविधान पीठ ने कहा कि निजता और गोपनीयता का अधिकार एक अहम चीज है। चीफ जस्टिस के दफ्तर से सूचना देते वक्त वह संतुलित होनी चाहिए। बेंच में शामिल जस्टिस रमन्ना ने अलग से अपने मत में कहा कि आरटीआई को न्यायाधीशों की निगरानी के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।


इस ऐतिहासिक फैसले को भास्कर ने आरटीआई कानून बनाने में सहयोग करने वाले एक्टिविस्ट निखिल डे और इस पूरे मामले की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले सुभाष चंद्र अग्रवाल से समझा। आज इन्हीं दोनों से जानिए क्या था सुप्रीम कोर्ट से जुड़ा आरटीआई विवाद।

 

चार बिंदुओं के आधार पर समझिए फैसला

1. अब सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी किस तरह की जानकारियां मिल पाएंगी?
जजों की संपत्तियों का ब्योरा, कॉलेजियम के निर्णय और प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी मिल पाएगी। लेकिन इन्हें आरटीआई के प्रावधानों के तहत ही दिया जाएगा। न्याय से जुड़े मामले, उनके पीछे के तर्क-वितर्क शामिल नहीं होंगे।


2. सुप्रीम कोर्ट इसके दायरे में है, तो क्या हाईकोर्ट और निचली अदालतें भी इसके दायरे में आएंगी?
बिल्कुल आएंगी। सुप्रीम कोर्ट के अधीनस्थ सभी प्रकार की अदालतें अब स्वत: ही आरटीआई के दायरे में आ गई हैं। हालांकि, यहां भी उपरोक्त शर्तें शामिल हैं।

 
3. अब देश में ऐसे कौन-कौन से दफ्तर हैं, जो आरटीआई से बाहर हैं?
राजनीतिक दल अभी आरटीआई से बाहर हैं। इंटेलीजेंस और सिक्योरिटी से जुड़ी एजेंसियां भी इसके दायरे में नही हैं। राष्ट्रपति भवन और पीएमओ आते हैं।


4. क्या सुप्रीम कोर्ट दफ्तर पर भी सूचना न देने  पर जुर्माना लगेगा?
सूचना ना देने पर अफसरों पर जुर्माने का जो प्रावधान है, वहीं सीजेआई के दफ्तर पर भी लागू होगा।

 

इस विवाद की पूरी कहानी

 

सीजेआई दफ्तर को आरटीआई के दायरे में लाने वाला शख्स
आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाषचंद्र अग्रवाल ने यह लड़ाई लड़ी। अग्रवाल वही चेहरा हैं, जो 2015 तक छह हजार से ज्यादा बार आरटीआई आवेदन लगा चुके थे। इसके जरिए इन्होंने कई घोटालों को उजागर किया। जैसे- किस तरह योजना आयोग ने सिर्फ दो टॉयलेट्स के रेनोवेशन पर 35 लाख रुपए खर्च कर दिए।

 

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2010 में हाईकोर्ट का आदेश- सीजेआई दफ्तर भी आरटीआई में
वर्ष 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का कार्यालय भी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आता है। ऐसे में इससे संबंधित व्यक्तियों की सूचना भी आरटीआई के तहत देनी होगी। इस आदेश के विरुद्ध सेक्रेटरी जनरल ऑफ सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल पब्लिक इंफोर्समेंट ऑिफसर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। वर्ष 2010 में दो जजों की बेंच के जज (अब सेवानिवृत्त) सुदर्शन रेड्‌डी ने पाया कि इसमें संविधान के महत्व का प्रश्न उठाया गया है। उन्होंने  इसे तीन सदस्यीय बेंच के पास भेज दिया। संविधान के आर्टिकल 145(3) के तहत यहां से यह मामला पांच सदस्यीय बेंच तक पहुंच गया। जहां से संविधान बेंच ने हाल ही में यह फैसला दिया है।

 

जजों की संपत्ति से जुड़ी आरटीआई लगाई, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
दिल्ली के चांदनी चौक में कपड़ा व्यापारी सुभाषचंद्र अग्रवाल ने जजों की संपत्ति की जानकारी से जुडे़ रिजाॅल्यूशन और उनके द्वारा प्रदान किए जा रहे ब्योरे को लेकर वर्ष 2007 में उच्चतम न्यायालय में आरटीआई लगाई थी। जानकारी नही मिलने पर अग्रवाल ने सेंट्रल इंफाॅर्मेशन कमीशन (सीआईसी) में एप्रोच की। जिसमें सीआईसी ने सर्वोच्च न्यायालय को निर्देशित करते हुए कहा कि वह भी आरटीआई के दायरे में है।

 

आरटीआई की यह लड़ाई संपत्ति के पैतृक विवाद से शुरू हुई थी
1991 में सुभाषचंद्र अग्रवाल के चाचा ने दिल्ली में संपत्ति को लेकर उनके पिता पर झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया था। चाचा के दामाद, िदल्ली हाईकोर्ट में जज थे। आरोप है कि उन्होंने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए सुभाषचंद्र के परिवार को प्रताड़ित कराया। 3 जनवरी, 2005 को सुभाषचंद्र अग्रवाल ने तत्कालीन सीजेआई से संबंधित जज के खिलाफ शिकायत की, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। हालात इतने खराब थे कि सुभाष ने आत्महत्या तक की कोशिश की। इसके बाद 2005 में आरटीआई कानून आया। तब इन्होंने आरटीआई को अपना हथियार बनाया।


अक्टूबर 2005 में सुभाष ने सुप्रीम कोर्ट में आरटीआई लगाई। पूछा- जिस जज के विरुद्ध उन्होंने शिकायत की थी उस पर क्या कार्रवाई की गई। यहां से कोई जवाब नही मिला। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के साथ ही  राष्ट्रपति कार्यालय को भी शिकायत भेजी थी। राष्ट्रपति कार्यालय से  शिकायत सुप्रीम कोर्ट रेफर कर दी गई। इस शिकायत को कोर्ट द्वारा संज्ञान में लिया गया। इसके बाद कोर्ट ने पहली बार माना कि सुभाष का मामला आरटीआई के तहत आता है। मामला मीडिया की सुर्खियां बना। इससे दबाव में आए सुभाष के चाचा ने उनके परिवार से समझौता कर लिया।

 

यह है सूचना का अधिकार, 2005 में हो सका लागू

यूपीए-1 के समय राइट टू इन्फॉर्मेशन यानी सूचना का अधिकार अस्तित्व में आया। दिसंबर 2003 में एनडीए सरकार के दौरान संसद ने सूचना स्वतंत्रता अधिनयम 2002 पारित किया, लेकिन यह अधिसूचित नही हो सका। दिसंबर 2004 में यूपीए सरकार ने सूचना का अधिकार प्रस्तुत किया गया जो 2005 में पारित हुआ। इसे ही सूचना का अधिकार अधिनयम 2005 कहा गया।

 

सूचनाएं मांगने की शक्ति दी
इसके तहत किसी भी सरकारी कार्यालय से सूचनाएं मांगी जा सकती हैं। संबंधित कार्यालय को 30 दिन में जवाब देना होता है। हालांकि स्वतंत्रता और जीवन के मामले में जानकारी 48 घंटे में देनी होगी। सूचना नहीं  मिलने या प्राप्त जानकारी से संतुष्ट नहीं होने पर 30 दिनों के भीतर उसी दफ्तर में बहाल प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास अपील कर सकते हैं। यहां भी संतुष्ट ना हों, तो 90 दिन में राज्य या केन्द्रीय सूचना आयोग में शिकायत की जा सकती है। सूचना आयुक्तों को अपीलों का निपटारा 45 दिन के भीतर करना होगा। जानकारी ना देने पर 25000 रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।


मोदी सरकार में बदलाव
मोदी सरकार ने हाल ही में आरटीआई के कुछ प्रावधानों में संशोधन किया है।  ये  प्रावधान आरटीआई आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल और उनका दर्ज़ा निर्धारित करते हैं। नए संशोधन के तहत केंद्रीय और राज्य स्तरीय सूचना आयुक्तों की सेवा शर्तें अब केंद्र सरकार तय करेगी। साथ ही सूचना आयुक्तों का सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर का दर्जा भी खत्म हो जाएगा।

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