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भास्कर सरोकार; सरकारें नियम क्यों नहीं बदलतीं?:अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली सरकारी नौकरियों में बेटियों को बेटों की तरह हक क्यों नहीं?

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: पवन कुमार
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उत्तर प्रदेश को छोड़ दें तो देश के सभी राज्यों में अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी का पहला हक बेटे का है, बेटी का नहीं। अगर किसी व्यक्ति की सिर्फ एक बेटी हो, उसकी शादी हो चुकी हो तो सरकारें नियमों का हवाला देकर उसे अनुकंपा नौकरी के लिए अयोग्य ठहरा देती हैं। इनमें से चंद महिलाएं ही हिम्मत जुटाकर अदालतों तक पहुंच पाती हैं, जीतती हैं...और नौकरी पा लेती हैं।

लेकिन, सभी महिलाओं को हक नहीं मिलता। देशभर की अदालतें बार-बार पुराने नियम बदलने की नसीहतें दे रही हैं। पिछले 5 साल में ऐसे दर्जनों आदेश जारी हो चुके हैं। अदालतें कहती हैं कि जब पिता की संपत्ति पर बेटे-बेटी का हक बराबर है, बुजुर्ग होने पर माता-पिता की देखरेख का जिम्मा भी दोनों का बराबर है तो फिर अनुकंपा नौकरी के लिए बेटी के साथ भेदभाव क्यों हो रहा है। भेदभाव रोकने के लिए महिला-पुरुष के लिए एक समान नियम बनने चाहिए।

अनुकंपा के आधार पर बेटियों को नौकरी देने के लिए ये 3 मामले नजीर हैं

केस 1 : उत्तर प्रदेश
बेटी को पिता के परिवार से बाहर मानना असंवैधानिक

प्रयागराज की मंजुल ने पिता के निधन के बाद अनुकंपा नौकरी के लिए आवेदन किया था। प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी ने जून 2020 में आवेदन यह कहते हुए ठुकरा दिया कि मंजुल का विवाह हो चुका है। मंजुल इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचीं। हाईकोर्ट ने 14 जनवरी 2021 को फैसला सुनाया कि बेटी को पिता के परिवार से बाहर मानना असंवैधानिक है। तब जाकर मंजुल को नौकरी मिल सकी।

केस 2 : कर्नाटक
जैसा हक विवाहित बेटे का, वैसा ही विवाहित बेटी का

बेंगलुरु की भुवनेश्वरी के पिता कृषि विभाग में थे। उनके निधन के बाद भुवनेश्वरी ने अनुकंपा नौकरी का आवेदन किया, मगर विभाग ने ठुकरा दिया। भुवनेश्वरी कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचीं। कोर्ट ने फरवरी 2021 में फैसला सुनाते हुए कहा कि जब अनुकंपा के आधार पर नौकरी देते समय बेटों से वैवाहिक स्टेटस नहीं पूछा जाता तो बेटियों से क्यों पूछा जाता है? ये नियम बदलने चाहिए।

केस 3 : राजस्थान
बेटी की जिम्मेदारियां नहीं बदलीं, तो हक क्यों बदले

शोभा के पिता जोधपुर विद्युत वितरण निगम में कार्यरत थे। उनके निधन के बाद शोभा ने नौकरी के लिए आवेदन किया। निगम ने 6 जून 2017 को आवेदन खारिज कर दिया। शोभा हाईकोर्ट पहुंचीं। कोर्ट ने 12 जनवरी 2022 को उनके हक में फैसला सुनाया। कहा कि- शादी के बाद भी माता-पिता के प्रति बेटी के जिम्मेदारी नहीं बदलतीं, तो फिर अनुकंपा नौकरी का हक क्यों नहीं हो सकता।

उत्तरप्रदेश इकलौता राज्य, जहां विवाहित बेटियों को अनुकंपा नौकरी का नियम बना
उत्तर प्रदेश सरकार ने दो महीने पहले 11 नवंबर 2021 को नया नियम बनाया। इसके तहत विवाहित बेटी को अनुकंपा के आधार पर पिता की नौकरी मिल सकती है। राज्य सरकार ने इसके लिए मृत सरकारी कर्मियों के आश्रितों की भर्ती नियमावली 2021 में 12वां संशोधन किया है।

एक्सपर्ट व्यू- बीएस चौहान, (जस्टिस सुप्रीम कोर्ट (रिटा.) पूर्व चेयरमैन, लॉ कमीशन)

अनुकंपा तुरंत राहत के लिए है, कोर्ट में केस लंबे चलते हैं, इससे उद्देश्य ही खत्म हो रहा
अनुकंपा के आधार पर नौकरी को कानूनी अधिकार के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह सरकारों द्वारा बनाई गई एक नीतिगत प्रक्रिया है, जो मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल राहत देने के लिए होती है। इसका मकसद बहुत साफ है कि कर्मचारी के निधन के बाद उसके परिवार पर आर्थिक संकट न आए, इसलिए उस परिवार के किसी एक सदस्य को संबंधित विभाग में नौकरी दी जाती है। बेटों को नौकरी मिलने में अड़चन नहीं आती। चाहे वो विवाहित हो या अविवाहित।

लेकिन, विवाहित बेटियों को कोर्ट जाना पड़ता है। वहां केस लंबा चलता है। ऐसे में अनुकंपा नौकरी का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। ऐसा न हो, इसके लिए केंद्र सरकार तो कोई नियम नहीं बना सकती, जबकि राज्य सरकारें नियम बना सकती हैं, जैसा कि यूपी ने बनाया है। क्योंकि, अभी तक जो नियम हैं, उनके मुताबिक विवाहित बेटी को उसके पति के परिवार का मान लिया जाता है। इसलिए उन्हें कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। ऐसे दर्जनों मामले कोर्ट में लंबित हैं।

एक्सपर्ट व्यू- विराग गुप्ता, (कानून विशेषज्ञ, वरिष्ठ वकील, सुप्रीम कोर्ट)

पुराने नियमों ने काफी हद तक सामंती पारिवारिक ढांचे को ही कायम रखा है, बदलाव जरूरी
bआजादी के बाद बना संविधान, कानूनी धाराएं और सरकारी नियम काफी हद तक सामंती पारिवारिक ढांचे को ही बरकरार रखने का काम कर रहे हैं। लेकिन, 72 साल में धीरे-धीरे न केवल ऐसे कानूनों को चुनौती मिली है, बल्कि बहुत से कानून आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार बदले भी गए हैं। कोर्ट के फैसले आधुनिक परिदृश्य के अनुसार होते हैं। समलैंगिकता और लिवइन रिलेशनशिप तक को कानूनी अनुमति मिल चुकी है, जबकि ये बातें पहले कानून में नहीं थीं।

ये उदाहरण बताते हैं कि समय के साथ कानूनों में बदलाव जरूरी है। कई बार हम देखते हैं कि कोर्ट के प्रगतिशील फैसलों के अनुसार सरकारें नियम-कानून नहीं बदलतीं। इसलिए पीड़ित को कोर्ट पहुंचना पड़ता है। हर बार अपने हक के लिए कोर्ट पहुंचना दर्शाता है कि कानून को वक्त के साथ संशोधित करना चाहिए। विवाहित महिलाओं को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के लिए सरकारों को नियम बनाने ही चाहिए, ताकि उन्हें बराबरी का हक मिल सके।