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बिहार के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट:जमुई के गांव में भागवत कथा सुनने पहुंचे लोगों से फैला कोरोना, रोहतास में सांसद के आदर्श ग्राम में 20 से ज्यादा मौतें

एक महीने पहले

बिहार के कुछ गांवों में लोगों की लापरवाही से कोरोना फैल रहा है। अगर कोरोना जैसे लक्षण दिख भी रहे हैं तो वहां टेस्ट कराने के लिए हेल्थ टीम नहीं पहुंच रही। भाजपा सांसद छेदीराम पासवान के आदर्श ग्राम की ये हालत है कि वहां 20 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। वहीं, बगहा में एक हेल्थ सेंटर तो ऐसा है, जहां कोई डॉक्टर नहीं आता। ऐसे ही गांवों के हालात जानने के लिए शुक्रवार को भास्कर टीम जमुई, रोहतास और बगहा पहुंची।

1. जमुई के सबसे संक्रमित गांव धोबघट से भास्कर की पड़ताल
- मुरली दीक्षित और प्रभांशु रंजन की रिपोर्ट

जमुई के गिद्दौर की कोल्हुआ पंचायत का गांव है धोबघट। यहां 13 मई को आई रिपोर्ट में 46 लोग कोरोना संक्रमित बताए गए। इसी गांव में बीते 7 दिनों में दो लोगों की मौत भी हुई है। जब भास्कर टीम में पहुंची तो इस संक्रमण के पीछे की कहानी सामने आई। यहां रहने वाले क्रुणाल ने बताया कि 6 अप्रैल को एक युवक भोपाल से यहां आया था। गांव आने के तीन-चार दिनों बाद उसे सर्दी-खांसी शुरू हुई। जांच में उसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई, लेकिन रिपोर्ट मिलने से पहले वह गांव के कई लोगों के साथ घूम चुका था।

इसी बीच, 8 से 14 अप्रैल के बीच गांव के ही काली मंदिर में छह दिन तक श्रीमद्भावत कथा का पाठ हुआ। इसमें रांची और अयोध्या से आए कथावाचक पॉजिटिव निकले। इसके बाद गांव में कोरोना का कहर इस कदर टूटा कि एक दिन में 46 लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। 48 साल के कोरोना संक्रमित भावेश सिंह की 13 मई को मौत हुई। भावेश भी इस धार्मिक आयोजन में शामिल थे। उनसे पहले राजेंद्र सिंह (78 वर्षीय) की मौत 7 मई को हुई।

8 से 14 अप्रैल के बीच गांव के काली मंदिर में श्रीमद्भावत कथा का पाठ हुआ। इसमें रांची और अयोध्या से आए कथावाचक पॉजिटिव निकले।
8 से 14 अप्रैल के बीच गांव के काली मंदिर में श्रीमद्भावत कथा का पाठ हुआ। इसमें रांची और अयोध्या से आए कथावाचक पॉजिटिव निकले।

भावेश की मौत के बारे में ग्रामीण मुरारी सिंह बताते हैं कि उन्हें समय पर इलाज मिलता तो शायद उनकी जान नहीं जाती। उनके यहां 14 दिन पहले ही शादी थी। इसमें कई रिश्तेदार शामिल हुए थे। देवघर से आए एक रिश्तेदार पहले से संक्रमित थे। महुली स्थित कोविड डेडिकेटेड सेंटर में भावेश का ऑक्सीजन लेवल लगातार गिरता जा रहा था, लेकिन अस्पताल में 67 ऑक्सीजन सिलेंडर खाली थे। हम लोग देवघर से 5 हजार रुपए में छोटा सिलेंडर लेकर आए, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।

गांव में 50 संक्रमित, फिर भी शुक्रवार को हुई तीन शादी
बीते दस दिनों में दो की मौत और 50 के करीब संक्रमित मिलने के बाद भी गांव में शुक्रवार को तीन शादियां और एक श्राद्ध हुआ। दोपहर करीब 2.30 बजे जब भास्कर टीम धोबघट गांव पहुंची तो गांव से बाहर स्थित सरकारी स्कूल में एक शादी का भोज हो रहा था। करीब छह फीट चौड़े स्कूल के बरामदे पर दोनों ओर से 50 के करीब महिलाएं, बच्चे भोजन कर रहे थे। वहीं, स्कूल परिसर में कुछ ग्रामीण पेड़ की छाया के नीचे बैठे मिले। बातचीत में उन लोगों ने गांव में फैले कोरोना की जानकारी दी। साथ ही सामने हो रहे भोज के बारे में बताया कि हम लोगों के कई बार मना करने के बाद भी गांव के कुछ लोग शादी नहीं टाल रहे हैं।

हेल्थ टीम खानापूर्ति कर लौटी
यहां के रहने वाले दिवेश बताते हैं गुरुवार को स्कूल में कोरोना जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग की एक टीम आई थी, लेकिन सूचना किसी को नहीं थी। टीम में शामिल लोग बिना मास्क और सिविल ड्रेस में थे। ऐसे में जांच कराने कोई भी ग्रामीण नहीं पहुंचा। टीम गांव में महज अपनी ड्यूटी पूरी करने आई और दो-तीन घंटे रहकर वापस चली गई। गांव के कई मोहल्लों में दोपहर में सड़कों पर तो सन्नाटा दिखा लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर पेड़ की छांव के किनारे दर्जनों लोग बिना मास्क लगाए एक साथ बैठे दिखे।

2. सांसद के आदर्श गांव में महिला बोली- शहर में एसी में रहे वला के कोरोना होएला
- रोहतास से कमल किशोर विनीत और अभिषेक मिश्र की रिपोर्ट

‘वन में रहे वला के कोरोना ना होएला, शहर में एसी में रहे वला के कोरोना होएला...’ चेनारी की मल्हीपुर पंचायत के बादलगढ़ गांव की कुम्हली देवी ने जब गांव में गाड़ी और कैमरा के साथ बाहर से आए लोगों को देखा तो यही कहा। इसी गांव के दिवाकर चेरो ने बताया कि हम लोगों में कोरोना के लक्षण नहीं हैं, तो फिर क्यों जांच कराएं? हां कभी-कभार सर्दी-खांसी हो जाती है, लेकिन पहाड़ों में रहने वालों के लिए यह स्वाभाविक बात है। शायद इसीलिए गांव के बाहर बने शेड में वृद्धजन आराम से बैठे-लेटे दिखे।

मल्हीपुर गांव की साढ़े सात हजार की आबादी की अब तक एक बार भी कोरोना की जांच नहीं की गई है।
मल्हीपुर गांव की साढ़े सात हजार की आबादी की अब तक एक बार भी कोरोना की जांच नहीं की गई है।

भाजपा सांसद छेदी पासवान के इस आदर्श गांव मल्हीपुर की स्थिति कोरोना को लेकर ठीक नहीं है। गांव की साढ़े सात हजार की आबादी की अब तक एक बार भी कोरोना की जांच नहीं की गई। इसी गांव में अब तक 20 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई है। जान गंवाने वालों में ज्यादातर बुजुर्ग थे। मल्हीपुर पंचायत में नौ गांव हैं। मुखिया मित्रा देवी कहती हैं कि सांसद के गोद लिए गांव में बाकी सुविधाएं तो हैं, लेकिन कोरोना के दौर में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही दिख रही है। यहां के लोगों में भी जांच कराने के प्रति जागरुकता की कमी है।

इस बारे में चेनारी के BDO सुनील कुमार गौतम कहते हैं कि पंचायतों में स्वास्थ्य विभाग जांच कराता है। रोस्टरवार कैंप लगाकर जांच कराई जा रही है। मल्हीपुर पंचायत का अभी नंबर नहीं आया है, इसलिए वहां कैंप लगाकर जांच नहीं कराई जा रही है। जिन्हें लक्षण है वो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराते हैं।

गांव से सात किलोमीटर दूर है सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
मल्हीपुर पंचायत से नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र की दूरी सात किलोमीटर दूर चेनारी में है। यहां के लोग जब बीमार होते हैं तो चेनारी के प्राइवेट क्लिनिक या अस्पताल जाते हैं या फिर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की ओर रुख करते हैं। इस एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर पूरे प्रखंड की डेढ़ लाख आबादी का भार है। शायद यही कारण है कि लोग कोरोना की जांच के प्रति जागरूक नहीं हैं।

टीकाकरण की रफ्तार भी सुस्त
मल्हीपुर पंचायत के सभी गांवों में टीकाकरण भी नहीं के बराबर हो रहा है। 14,500 लोगों की आबादी वाली इस पंचायत में अब तक महज 200 लोगों ने कोरोना का टीका लिया है। इनमें एक सौ लोग केवल मल्हीपुर गांव के हैं, जबकि इतने ही टीके अन्य आठ गांव के लोगों ने लिए हैं। गांव के जोधन यादव का कहना है कि कैंप नहीं लगने के कारण हमलोग टीका नहीं लगवा पा रहे हैं। अस्पताल बहुत दूर है। जाने में परेशानी होती है, इसलिए वहां नहीं जाते हैं।

इस बारे में CHC के डॉक्टर राकेश कुमार गुप्ता बताते हैं कि प्रखंड में अब तक 8,500 से ज्यादा लोगों का टीकाकरण किया जा चुका है। मल्हीपुर पंचायत में जल्द जांच कैंप लगवाया जाएगा। अभी संविदा स्वास्थ्यकर्मियों के हड़ताल पर चले जाने से जांच प्रभावित हुआ है।

3. हर घर में हैं सर्दी-जुकाम और बुखार के मरीज, स्वास्थ्य केंद्र में खिड़की-गेट गायब
- बगहा से रितेश कुमार और वरूण कुमार की रिपोर्ट

पश्चिम चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया से 95 किमी दूर बगहा का नौरंगिया पंचायत स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। प्रखंड मुख्यालय को छोड़ दें तो यहां की पंचायतों के लोग बीमारियों से उबरने के लिए भगवान भराेसे हैं। सर्दी-जुकाम या बुखार आने पर ये लोग आज भी यह मानते हैं कि उन्हें टाइफाइड है। नौरंगिया पंचायत के नौ गांवों में लोग घर-घर खांसी, सर्दी, जुकाम और बुखार से जूझ रहे हैं। 13 दिनों के अंदर 12 लोग दम तोड़ चुके हैं। प्रशासन को भी सही आंकड़ा मालूम नहीं है।

यहां महेश्वर काजी की दवा दुकान है। वे कहते हैं कि उनके यहां सिर्फ सर्दी जुकाम और बुखार की दवा की बिक रही है। लोग कोरोना नहीं जान रहे हैं, वे सर्दी खांसी, जुकाम को टायफाइड मानते हैं। इसी वजह से पंचायत में 12 मौतें हो चुकी हैं। बेरई के दीपक के पड़ोसी 32 साल के राजेश की मौत 9 मई को तेज बुखार से हुई है। दरअसल, इन्हें कोविड की जानकारी ही नहीं है। यहां न तो जांच की पहल की गई और न ही लोगों को इससे बचाव की जानकारी दी जा रही है। अभी भी राजेश के घर के आसपास लोग झुंड बनाकर बैठते हैं और गप्पे मारते हैं।

गंभीर स्थिति हुई तो 18-20 किमी दूर निजी क्लिनिक जाते हैं लोग
मौत का कारण क्या है, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। स्थानीय इलाके में एक भी सरकारी या निजी डॉक्टर नहीं बैठते। दवा दुकानदार जो दवा देता है, लोग खा लेते हैं। ज्यादा तबीयत खराब होने पर लोग 18 से 20 किमी दूर बाल्मीकि नगर, हरनाटांड या बगहा जाते हैं। ऐसा नहीं है कि गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। यहां एक उप स्वास्थ्य केंद्र भी है, जिसकी खिड़की-गेट सब गायब हैं। यह इसलिए कि उसमें सरकार या प्रशासन ने किसी को तैनात ही नहीं किया है। इमारत भी जर्जर हो चुकी है। पोलियो की खुराक पिलाने के लिए एक नर्स आती है।

इस बारे में बगहा 2 PHC के प्रभारी मेडिकल ऑफिसर राजेश सिंह नीरज ने बताया कि उप स्वास्थ्य केंद्र हमें हैंडओवर नहीं किया गया है। वहीं, DM कुंदन कुमार से जब हमने पूछा तो उन्होंने बताया कि अगर इलाके में लोगों को जागरूक नहीं किया गया है, तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, उप स्वास्थ्य केंद्र में तैनात कर्मियों की सूची निकालकर जांच की जाएगी। लापरवाही बरतने वाले कर्मियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पिछले साल लगा था कैंप, इस बार कोई पूछने वाला भी नहीं
पांच दिन पहले कोविड का लक्षण झेल चुके सुरेश महतो कहते हैं कि यहां का कोई भी ऐसा घर नहीं बचा जिसके सदस्य सर्दी-जुकाम या बुखार से ग्रसित नहीं हुए हैं। हम लोग दवा दुकानदार को ही भगवान मान लेते हैं, वे जो भी दवा देते हैं उसे खा लेते हैं। सुधार होना हुआ तो ठीक, नहीं तो अपने हाल पर छोड़ देते हैं। कोविड के संबंध में ग्रामीणों ने कहा कि पिछले वर्ष एक कैम्प चौक पर लगा था। इस साल तो एक बार भी स्वास्थ्य विभाग के लोग आए ही नहीं हैं।

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