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भास्कर ओपिनियनमहारानी एलिजाबेथ:अब भी 14 देशों की राष्ट्र प्रमुख ब्रिटिश राजशाही और भारत का उदार मन

3 महीने पहले
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ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ सत्तर साल राज करने के बाद आखिर दुनिया से विदा हो गईं। ब्रिटिश राजशाही अब भी 14 अलग-अलग देशों पर राज करती हैं। भले ही सांकेतिक रूप से ही सही, पर ब्रिटेन के अलाव इन चौदह देशों की राष्ट्र प्रमुख महारानी ही थीं। अब उनकी जगह उनके बेटे चार्ल्स लेंगे।

राष्ट्र प्रमुख वैसे ही जैसे हमारे देश में राष्ट्रपति होते हैं। क्यों होते हैं, पता नहीं लेकिन भारत में राष्ट्रपति भी सांकेतिक रूप से ही राष्ट्र प्रमुख होते हैं। उन्हें सारे सरकारी कामकाज प्रधानमंत्री की सलाह पर ही करने होते हैं। तमाम विधेयक राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद ही पास होते हैं या कानून बनते हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश बाध्यकारी होते हैं।

अपने पहले भारत दौरे पर आईं एलिजाबेथ-II काशी भी पहुंची थीं। उन्होंने काशी नरेश विभूति नारायण सिंह के साथ शाही हाथी की सवारी की थी।
अपने पहले भारत दौरे पर आईं एलिजाबेथ-II काशी भी पहुंची थीं। उन्होंने काशी नरेश विभूति नारायण सिंह के साथ शाही हाथी की सवारी की थी।

फर्क है तो सिर्फ इतना कि भारत के राष्ट्रपति को चुने हुए सांसद और विधायकों द्वारा चुना जाता है, जबकि ब्रिटेन में राष्ट्र प्रमुख का पद राजा या रानी के बड़े बेटे या बेटी को ही मिलता है। कभी-कभी संवैधानिक संकट की स्थिति में जरूर राष्ट्रपति की भूमिका अहम होती है। जैसे ब्रिटिश महारानी या महाराजा की।

ब्रिटिश महारानी के कार्यकाल में एक बार ही ऐसी स्थिति बनी थी। 1975 में ऑस्ट्रेलिया में संवैधानिक संकट पैदा हो गया था तब महारानी द्वारा नियुक्त गवर्नर जनरल ने वहां के चुने हुए प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दिया था।

हालांकि, महारानी जब से शासन प्रमुख बनीं, उसके पांच साल पहले ही भारत एक आजाद गणतंत्र घोषित हो चुका था, लेकिन उनके पिता जॉर्ज छठे के वक्त भारत पर अंग्रेजी हुकूमत ने खूब कहर ढाया। राजशाही और लोकतंत्र में यही फर्क होता है।

दिवंगत महारानी एलिजाबेथ 14 अक्टूबर 1997 को तीसरी बार भारत आईं। वे नंगे पैर जलियांवाला बाग गईं और वहां उन्हीं के जनरल डायर द्वारा मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी।
दिवंगत महारानी एलिजाबेथ 14 अक्टूबर 1997 को तीसरी बार भारत आईं। वे नंगे पैर जलियांवाला बाग गईं और वहां उन्हीं के जनरल डायर द्वारा मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी।

एक तरफ ब्रिटेन आज के युग में भी चौदह देशों पर किसी न किसी रूप में कुंडली मारे बैठा है और दूसरी तरफ ढाई सौ साल हमें गुलाम बनाए रखने के बावजूद हम महारानी के निधन पर 11 सितंबर को एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित कर रहे हैं।

दुनिया का कोई भी देश कितना भी शक्तिशाली हो जाए, भारत जैसी यह उदारता कहां से लाएगा? कोई क्या कर लेता अगर भारत यह शोक घोषित नहीं करता? लेकिन यह हमारी महान उदारता का परिचायक है जो निश्चित ही हमें दुनिया का महान लोकतंत्र बनाती है। जो कि हम हैं और हमेशा रहेंगे भी।

भारतीय संवेदनाओं के हिसाब से दिवंगत महारानी एलिजाबेथ का एक ही काम ठीक था और वो यह कि जब वे 14 अक्टूबर 1997 को तीसरी बार भारत आईं तो अमृतसर भी गईं और तय कार्यक्रम के अनुसार पहले गोल्डन टेम्पल पहुंचने की बजाय वे नंगे पैर जलियांवाला बाग पहुंच गईं और वहां उन्हीं के जनरल डायर द्वारा मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी।

बहरहाल जिन 14 देशों पर आज भी ब्रिटिश राजशाही का हाथ है वे हैं- ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, एंटीगुआ एंड बरबुडा, सेंट किट्स, पपुआ न्यू गिनी, सेंट लूसिया, बेलीज, बहामास, ग्रेनेडा, जमैका, तुवालू, सोलोमन द्वीप और सेंटविंसेंट एंड ग्रेनेडीन्स।