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बिहार में यूं ही नहीं हैं बदलाव की अटकलें:सुगंध चारों ओर फैल रही है, नीतीश कुमार के चौके में कुछ पक रहा है

2 महीने पहले
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राजनीति में कभी भी संभव को असंभव और असंभव को संभव में बदला जा सकता है। मौसम बारिश का है और बिहार वाले नीतीश कुमार को राजनीतिक मौसम का सफल वैज्ञानिक माना जाता है। वे हैं भी। महाराष्ट्र के घटनाक्रम से उद्धव ठाकरे ने कोई सीख ली हो या नहीं, लेकिन नीतीश कुमार दोगुने सचेत हो गए, ऐसा लगता है।

एक बार अटलजी की सरकार के खिलाफ विपक्ष वोटिंग करने वाला था। देर रात तक बहस चल रही थी। जब नीतीश कुमार के बोलने की बारी आई। विपक्षी सांसद चिल्ला रहे थे- क्या बिहारी प्रधानमंत्री बनेगा? नीतीश ने अपने भाषण का अंत इस वाक्य से किया था कि प्रधानमंत्री तो बिहारी ही बनेगा। नाम होगा अटल बिहारी।

ये वही नीतीश कुमार हैं। लगभग 17 साल बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। जब भी कोई सहयोगी दल अपनी चलाने लगता है, नीतीश दूसरे का पल्ला पकड़ लेते हैं। खैर राजनीति यही होती है।

मामला यह है कि जैसे खेत की मेढ पर खड़े बड़े पेड़ की छाया जहां तक भी जाती है, उस हिस्से में कोई भी फसल पनपती नहीं है, वैसे ही आज कल भारतीय जनता पार्टी राजनीति के खेत की मेढ पर खड़ा वही बड़ा पेड़ है। इसके संपर्क में या साथ में आया कोई भी छोटा दल पनप नहीं पाता है। अन्नाद्रमुक, अकाली और शिवसेना सहित कई दल हैं जो या तो बिखर गए, विफल हो गए या भाजपा में ही मिल गए।

गलती भाजपा की भी नहीं है। जब आपको चतुर्दिक राज करना हो, चक्रवर्ती बनना हो तो अश्वमेध यज्ञ करना ही होता है। विजय का घोड़ा छोड़ना पड़ता है। जो घोड़े को पकड़ेगा उससे युद्ध करना आवश्यक है। जब अश्व महाराष्ट्र में घूमा तो नीतीश कुमार ने भांप लिया कि इसे बिहार आने में ज्यादा वक्त नहीं लगने वाला है। नीतीश उस अश्व को पकड़ना चाहते हैं, जैसे राम के विजय अश्व को दो नन्हे बालकों लव और कुश ने पकड़ लिया था।

नीतीश कुमार कितने सफल होंगे यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन लालू का राजद साथ आता है, जो कि एक पैर पर साथ आने को खड़ा ही है, तो गणित पूरी तरह नीतीश के साथ है। लगता है तमाम गणित फिट हो चुके हैं। बहुत पहले तय हो चुका है नीतीश का भाजपा से अलग होना। नीतीश की भाजपा से नाराजगी की कई वजह हैं। भाजपा उन्हें बगल कर अपने विस्तार में जुटी है, यह वे साफ देख पा रहे हैं। लगातार उनके हर काम में अड़ंगा लगाया जा रहा है यह वे महसूस कर रहे हैं। इसी कारण उन्होंने भी भाजपा से दूरी बनानी शुरु कर दी। वे पूर्व राष्ट्रपति कोविंद के विदाई समारोह में नहीं गए। वे नए राष्ट्रपति के स्वागत समारोह में नहीं गए। वे गृहमंत्री अमित शाह की तिरंगा बैठक में नहीं गए। वे नीति आयोग की बैठक में भी नहीं गए।

कहते हैं कि नीतीश के ही दल के पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को भाजपा बिहार का एकनाथ शिंदे बनाने की फिराक में थी। नीतीश को भनक लग गई और उन्होंने सिंह का राज्यसभा का टिकट काट दिया। सिंह को केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। यहीं से जदयू के कान खड़े हो गए। … और भरोसे की भाजपा पर उन्हीं नीतीश को रत्ती भर विश्वास नहीं रहा जो पांच साल पहले लालू का साथ छोड़कर भाजपा से जीवन भर का याराना कर बैठे थे।

हालांकि, बिहार में चुनाव को अभी तीन साल बाकी हैं। जातीय गणित में जदयू और राजद का साथ फिट बैठता है। भाजपा अकेले चुनाव लड़ सकती है, लेकिन कम से कम बिहार का गणित तो अकेली भाजपा पर फिट नहीं बैठता। कोई तो स्थानीय ताकत उसे चाहिए ही चाहिए। बिना स्थानीय ताकत के कल्याण नहीं होने वाला।