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भास्कर ओपिनियनचुनाव में लोभ-लालच का चक्रव्यूह:वोटरों को लुभाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के वादों पर अंकुश की तैयारी

4 महीने पहले
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चुनाव भी एक अजीब चीज है। पैसे बांटने पर प्रतिबंध है, लेकिन कर्जमाफी के वादों पर कोई रोक नहीं। नौकरी देने के वादे, बेरोजगारों को पैसा देने के वादे, ये सब क्या? आखिर वोटरों को लुभाने की ही तरकीबें तो हैं। इन पर बंदिशें क्यों नहीं लगतीं? सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मुफ्त के वादों पर अंकुश लगाने के लिए तुरंत एक विशेषज्ञ समिति बनाने को कहा है। साथ ही चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और सभी दलों से भी सुझाव मांगे गए हैं।

पिछली सुनवाई जब अप्रैल में हुई थी तो चुनाव आयोग ने कहा था कि पार्टियों को वादों से रोकना उसका काम नहीं है। उन वादों पर यकीन करना, न करना, उन्हें सही या गलत मानना जनता के विवेक पर निर्भर है। अब जनता ही यह सब समझती तो फिर ये मुफ्त की रेवड़ियां बांटने वाले जीतते ही क्यों?

समझ से मतलब यहां यह है कि लोभ-लालच से कौन बचा है भला? जो पार्टियां मुफ्त के वादे करती फिरती हैं, वे भी तो यह सब वोट के लालच के वशीभूत होकर ही कर रही होती हैं। फिर जनता का क्या दोष?

कोई किसानों का कर्ज माफ करने का वादा करता है। कोई बेरोजगारों को बाकायदा दो या तीन हजार रु. वेतन देने का वादा करता है, तो कोई चुनाव जीतने पर मुफ्त के लैपटॉप, मोबाइल फोन देता है। आखिर यह सब चुनाव को प्रभावित करने का तरीका नहीं तो और क्या है? ऐसे में चुनाव आयोग यह कहकर कैसे बच सकता है कि ये उसका काम नहीं है?

खैर, आप पार्टी के केजरीवाल हाल में गुजरात जाकर बेरोजगारों को रोजगार की गारंटी और तीन हजार रुपए देने का वादा कर आए थे। अक्टूबर-नवंबर में गुजरात और हिमाचल में चुनाव हैं। इन वादों के चक्कर में लोग आ ही जाते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट अगर कोई व्यवस्था दे सके या केंद्र सरकार संसद में कोई कानून लाकर कोई कायदा बना सके तो निष्पक्ष और पवित्र चुनाव का कोई रास्ता जरूर निकल सकता है।

फिर अकेले केजरीवाल ही क्यों, मुफ्त की चीजें आखिर किसने नहीं बांटी? क्या कांग्रेस, क्या भाजपा! और क्षेत्रीय दलों ने तो हद ही कर दी थी। मुफ्त में दाल-चावल और अन्य अनाज देने के वादे तक किए गए। निभाए भी, लेकिन क्या ऐसे वादों के माहौल में होने वाले चुनावों को निष्पक्ष कहा जा सकता है? फिर ये मुफ्त की रेवड़ियां बांटने वाली पार्टियां, जब सत्ता में आती हैं तो वादे पूरे करने में पैसा किसका लगता है? सरकार का।

यानी सरकारी खजाना खाली। यानी राज्य या केंद्र की अर्थ व्यवस्था पर सीधी चोट। कर्ज लेकर मुफ्त की रेवड़ियां बांटना राज्यों का परम कर्तव्य हो जाता है। पिसता है मध्यम वर्ग। जो अपने वेतन का मोटा हिस्सा कई तरह के टैक्स के रूप में सरकार को हर महीने या हर साल देता है। उसका क्या कसूर है?

अगर आपको लोगों की सच्ची सेवा करना ही है तो उस सेवा के जरिए सत्ता में आइये। आपका स्वागत है। लोभ-लालच के चक्रव्यूह में भोली जनता को फंसाकर आखिर आप अपने सिवाय किसका भला कर रहे हैं और क्यों?

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