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भास्कर ओपिनियनराजनीतिक कयास:छोटे राज्यों को विशेष दर्जा, नीतीश कुमार ने अभी से प्रधानमंत्री स्तर के वादे करना शुरू कर दिए

15 दिन पहले
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नीतीश कुमार का प्रधानमंत्री पद का मोह फिर उठ खड़ा हुआ है। वे कहते हैं हम प्रधानमंत्री पद की होड़ में नहीं हैं। हम तो बिखरे विपक्ष को एक करने में अपनी ताकत झोंक रहे हैं। दूसरी तरफ ताजातम बयान में उन्होंने कहा कि 2024 के चुनाव में विपक्षी दलों की सरकार बनती है और हमारा गठबंधन भी अच्छी सीटें जीतता है तो छोटे तमाम राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा जरूर देंगे।

इसका मतलब सीधा-सा यह है कि प्रधानमंत्री बनने की उनकी इच्छा फिर बलवती हो रही है। अंकुर तो बहुत पहले फूट चुके थे, अब फसल लहलहाने का दौर चल रहा है। 2024 के करीब आते- आते पद प्रेम अपने चरम पर पहुँच चुका होगा। हालाँकि, उनके रास्ते में अभी कई काँटे हैं।

केजरीवाल की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। हो सकता है कल को उनकी आप पार्टी तीन या चार राज्यों में सरकार बना ले तो भाजपा के बाद पहला दावा उनका बन जाएगा। उधर राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकल पड़े हैं और उन्हें अच्छा- ख़ासा समर्थन भी मिल रहा है। ऐसे में नीतीश कुमार कहाँ आएँगे यह तो भविष्य ही बताएगा। हालांकि, जहां तक उम्मीद है, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों के बाद तस्वीर बहुत कुछ साफ हो ही जाएगी।

जहां तक कम्युनिस्टों का सवाल है, वे इस होड़ में कहीं भी नहीं आते। हरकिशन सिंह सुरजीत के बाद कम्युनिस्टों में सीताराम येचुरी ही कहीं-कहीं दिखाई या सुनाई देते हैं। उनके अलावा कोई नहीं। कहाँ एक दौर था जब देशभर में 55 से 65 के बीच लोकसभा सीटें कम्युनिस्टों के पास हुआ करती थीं और वे जिसकी चाहें सरकार बनवाने और जिसकी चाहें सरकार गिरवाने की स्थिति में होते थे। आज कहीं भी नहीं हैं। हालाँकि, इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं।

भारतीय राजनीति में वामपंथ के सोवियत संघ (अब पूर्व) और चीन के प्रति झुकाव ने कई कड़वे अनुभव भी खड़े किए। पहले हिटलर के सोवियत पर हमले ने कड़े अनुभव दिए और बाद में 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान “पितृभूमि खतरे में” का हल्ला खड़ा कर भारतीय कम्युनिस्टों ने कहा जाता है कि अंग्रेज शासकों से दोस्ती गाँठी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को झटका देने से भी नहीं चूके थे।

इसके बाद कहा जाता है कि आत्मनिर्भर के अधिकार संबंधी स्टालिन की अवधारणा के तहत वे मुस्लिम लीग की धर्मांध माँग को भी तर्कसंगत बताते रहे। 1962 के चीनी आक्रमण के समय भी बीजिंग का समर्थन कर उन्होंने राष्ट्रवादी भावनाओं को कहीं न कहीं झकझोरा था।

हालाँकि, अब दौर बदल चुका है। …और कम्युनिस्टों में अब इतनी भी ताक़त नहीं बची कि वे किसी पक्ष में होकर उसे फायदा पहुँचा सकें। बहरहाल, नीतीश कुमार, येचुरी को भी साथ लेकर चल रहे हैं। आखिर गिरते को तिनके का सहारा। चार-पाँच सीटों की मदद भी कम थोड़े ही होती है।