छठ विशेष / पाकिस्तान के मुलतान से लेकर ओडिशा के कोणार्क तक के 6 सूर्य मंदिरों से भास्कर की खास रिपोर्ट



मुल्तान का ऐतिहासिक आदित्य सूर्य मंदिर मुल्तान का ऐतिहासिक आदित्य सूर्य मंदिर
कोणार्क का सबसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिर कोणार्क का सबसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिर
उन्नाव बह्यन्य देव मंदिर उन्नाव बह्यन्य देव मंदिर
अहमदाबाद का मोढ़ेरा सूर्य मंदिर अहमदाबाद का मोढ़ेरा सूर्य मंदिर
लोहार्गल सूर्य मंदिर लोहार्गल सूर्य मंदिर
उत्तराखण्ड का कटारमल मंदिर उत्तराखण्ड का कटारमल मंदिर
X
मुल्तान का ऐतिहासिक आदित्य सूर्य मंदिरमुल्तान का ऐतिहासिक आदित्य सूर्य मंदिर
कोणार्क का सबसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिरकोणार्क का सबसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिर
उन्नाव बह्यन्य देव मंदिरउन्नाव बह्यन्य देव मंदिर
अहमदाबाद का मोढ़ेरा सूर्य मंदिरअहमदाबाद का मोढ़ेरा सूर्य मंदिर
लोहार्गल सूर्य मंदिरलोहार्गल सूर्य मंदिर
उत्तराखण्ड का कटारमल मंदिरउत्तराखण्ड का कटारमल मंदिर

Dainik Bhaskar

Nov 02, 2019, 08:34 AM IST

लोकपर्व छठ सूर्य के प्रति श्रद्धा और विनम्रता अर्पित करने का पर्व है। चाहे वह पाकिस्तान के मुल्तान में श्रीकृष्ण के पुत्र सांब के द्वारा बनाया गया आदित्य सूर्य मंदिर हो या ओडिशा का पुरी स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर। अहमदाबाद का मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर सोलंकियों ने अपने राज्य के वैभव को दर्शाने के लिए बनवाया। हर मंदिर की कहानी भारतीय इतिहास के पुरुषार्थ और शौर्य की कहानी है..

 

श्रीकृष्ण के पुत्र ने श्राप से मुक्त होकर बनवाया यह सूर्य मंदिर

पंजाब पाकिस्तान के मुल्तान में पड़ता है आदित्य सूर्य मंदिर। यह मंदिर मुल्तान के तांबे के बाज़ार में स्थित है। इस मंदिर में स्थापित 10 वीं सदी की प्रसिद्ध आदित्य मूर्ति को मुल्तान के शासकों के वंश द्वारा नष्ट कर दिया गया था। कहा जाता है कि महाभारत काल में जामवंत ने अपनी बेटी जामवंती की शादी कृष्ण से करवाई थी। जामवंती और कृष्ण के बेटे का नाम था- सांब। उन्हीं सांब ने इस मंदिर को बनाया। मान्यता है कि उन्होंने अपने कोढ़ी होने के श्राप से मुक्ति के लिए यह मंदिर बनवाया था। मुहम्मद बिन कासिम और मुहम्मद गजनी समेत कई मुस्लिम क्रूर शासकों ने मंदिर को कई बार लूटा। कहा जाता है कि ह्वेन त्सांग ने 641 ईस्वी में इस मंदिर का दौरा किया था क्योंकि यह सूर्य मंदिर प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण सूर्य मंदिरों मेंे से एक था। तब ह्वेन त्सांग ने मंदिर के लिए शुद्ध सोने की मूर्ति बनवाई थी। जिसकी आंखें बड़ी लाल माणिका से बनी थी। 


हालांकि बाद में मुस्लिम शासन के दौरान इस मंदिर को नष्ट किया गया था। मुल्तान के सूर्य मंदिर की प्रतिष्ठा, आस्था, स्वास्थ्य के साथ-साथ कृषि के चलते भी थी। पुराण के आख्यानों में वर्णन है कि कभी रावी नदी के बीच टापू की तरह था मुल्तान। अाज चिनाब नदी के तट पर है। मान्यता है कि इसके आसपास के हड़प्पा संस्कृति के शहरों का भरण-पोषण होता था, क्योंकि अन्न उत्पादन का यह प्रमुख केंद्र था। एक मान्यता यह भी है कि भरण-पोषण के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए उस समय के लोगों ने ही इस सूर्य मंदिर की स्थापना की होगी। कहते हैं कि स्थापत्य कला की दृष्टि से मुल्तान का मंदिर बेजोड़ है। रामायण में जामवंत का उल्लेख आता है जो भगवान श्रीराम की सेना में थे। परंतु महाभारत काल में भी जामवंत का जिक्र है। उनके पास एक दिव्य मणि थी। मणि के लिए कृष्ण और जामवंत में कई दिनों तक युद्ध  भी हुआ था। 

 

जामवंती से कृष्ण के विवाह के बाद सांब का जन्म हुआ

जैसे ही जामवंत को पता चला कि कृष्ण स्वयं भगवान राम के ही अवतार हैं। उन्होंने अपनी पुत्री जामवंती का विवाह कृष्ण के साथ कर दिया। जामवंती से कृष्ण के पुत्र सांब का जन्म हुआ। एक दिन सांब ने स्त्री रूप धारण किया था। यह देख कृष्ण ने सांब को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया।     

 

12 वर्षों तक सूर्यदेव की तपस्या के बाद स्वस्थ हो गए थे सांब

जब सांब कोढ़ से पीड़ित हो गए तो वे महर्षि कटक के पास गए। महर्षि ने उन्हें सूर्यदेव की आराधना करने के लिए कहा। सांब ने चंद्रभागा नदी के किनारे 12 वर्षों तक सूर्यदेव की तपस्या की। वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए। बाद में सांब ने मुल्तान में सूर्यदेव को समर्पित यह मंदिर बनवाया। 

 

यहां कोई प्रतिमा नहीं, समय की गति को दर्शाता है कोणार्क मंदिर

कोणार्क का सूर्य मंदिर भारत के ओडिशा राज्य के पुरी जिले के कोणार्क नामक क़स्बे में स्थित है। सूर्य मंदिर अपने निर्माण के 750 साल बाद भी अपनी अद्वितीयता, विशालता व कलात्मक भव्यता से हर किसी को निरुत्तर कर देता है। वास्तव में जिसे हम कोणार्क के सूर्य मंदिर के रूप में पहचानते हैं, वह पार्श्व में बने उस सूर्य मंदिर का जगमोहन या महामंडप है, जो कि बहुत पहले ध्वस्त हो चुका है। सूर्य देवता को समर्पित रथ के आकार में बना ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर भारत की मध्यकालीन वास्तुकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। वैसे इस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है क्योंकि यहां की सूर्य प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रख दी गई है। ये सूर्य मंदिर समय की गति को भी दर्शाता है। पूर्व दिशा की ओर जुते 7 घोड़े सप्ताह के सातों दिनों के, 12 जोड़ी पहिये दिन के चौबीस घंटे के, और 8 ताड़ियां दिन के आठों प्रहर के प्रतीक हैं। वैसे पहियों के बारे में कहा जाता है कि 12 जोड़ी पहिये साल के बारह महीनों के बारे में संदेश देते हैं।  पुराविद व वास्तुकार मंदिर की संरचना, मूर्तिशिल्प व पत्थरों पर उकेरी आकृतियों को वैज्ञानिक, तकनीकी व तार्किक कसौटी पर कसने के बाद तथ्यों को दुनिया के सामने रखते रहे हैं और यह क्रम लगातार जारी है। 
बहरहाल इस महामण्डप या जगमोहन की विराटता व भग्न हो चुके मुख्य मंदिर के आधार पर उत्कीर्ण सज्जा से ही इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल की पहचान मिली है। भारत से ही नहीं बल्कि दुनिया भर से लाखों पर्यटक इसको देखने कोणार्क आते हैं। कोणार्क में बनी इस भव्य कृति को महज देखकर समझना कठिन है कि यह कैसे बनी होगी। इसे देखने का आनन्द तभी है जब इसके इतिहास की पृष्ठभूमि में जाकर इसे देखा जाए।  -पूरी से संदीप की रिपोर्ट

 

प्राचीन ओडिया स्थापत्य कला का यह मंदिर बेजोड़ उदाहरण

पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने सूर्य मंदिर को तेरहवीं शताब्दी में बनवाया था। प्राचीन ओडिया स्थापत्य कला का यह मंदिर बेजोड़ उदाहरण है। सूर्य मंदिर की रचना इस तरह से की गई है कि यह सभी को आकर्षित करती है। सूर्य को ऊर्जा, जीवन और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। 

 

चुम्बकीय प्रभाव से दोलित होती थी गर्भगृह की मूर्ति

मुख्य मंदिर की संरचना के बारे में कहा जाता है कि उसके गर्भगृह में सूर्यदेव की मूर्ति ऊपर व नीचे चुम्बकीय प्रभाव के कारण हवा में दोलित होती थी। प्रात: सूर्य की किरणें रंगशाला से होते हुए वर्तमान में मौजूद गर्भगृह के सामने के हिस्से से होते हुए कुछ देर के लिए गर्भगृह में स्थित मूर्ति पर पड़ती थीं। 

 

 

चढ़ावे का घी रखने के लिए बनाने पड़े नौ कुएं 

मध्यप्रदेश के दतिया से 17 किलोमीटर दूर उन्नाव में बाला जी सूर्य मंदिर स्थापित है जिसे बह्यन्य देव के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां कुएं पानी से नहीं बल्कि घी से भरे हैं, वो भी एक दो नहीं बल्कि पूरे नौ कुएं। पिछले 50 वर्षों में यहां आने वाले श्रद्धालुओं के द्वारा यहां इतना घी चढ़ाया जा चुका है कि इस चढ़ावे को रखने के लिए एक नहीं, दो नहीं बल्कि पूरे नौ कुओं का निर्माण करवाना पड़ा। कहते हैं कि इस मंदिर में घी चढ़ाने की परंपरा करीब 400 वर्ष पहले शुरू हुई थी। यहां मकर संक्रांति, बंसत पंचमी, रंग पंचमी और डोल ग्यारस पर ही काफी मात्रा में शुद्ध घी चढ़ावे में आ जाता है। कई मौके पर भक्त 10 क्विंटल से ज्यादा घी चढ़ाते हैं।

 

सोलंकी ने वैभव वापसी के लिए बनवाए मंदिर

अहमदाबाद से सौ किमी दूर पुष्पावती नदी के तट पर है मोढ़ेरा का विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर। इस मंदिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम (ईसा पूर्व 1022-1063 में) ने करवाया था। गजनी के आक्रमण के बाद सोलंकी साम्राज्य की राजधानी कही जाने वाली ‘अहिलवाड़ पाटण’ अपनी महिमा, गौरव और वैभव को खोती जा रही थी। राज्या के वैभव को पुन: बहाल करने के लिए सोलंकी राज परिवार और व्यापारी एकजुट हुए और उन्होंने संयुक्त रूप से भव्य मंदिरों के निर्माण के लिए अपना योगदान देना शुरू किया। सोलंकी सूर्यवंशी थे, और वे सूर्य को कुलदेवता के रूप में पूजते थे। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण में कहीं भी चूने का उपयोग नहीं किया गया है।

 

युद्ध के बाद पांडवों ने यहां किया प्रायश्चित

लोहार्गल राजस्थान के शेखावटी इलाके में झुंझुनू से 70 किमी दूर आड़ावल पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे के पास है। लोहार्गल का अर्थ होता है वह स्थान जहां लोहा भी गल जाए। इस स्थान के बारे में सबसे प्रचलित कथा है कि महाभारत की समाप्ति के बाद पाण्डव जब अपने भाई बंधुओं और अन्य स्वजनों की हत्या करने के पाप से अत्यंत दुःखी थे, तब भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर वे पापमुक्ति के लिए विभिन्न तीर्थ स्थलों के दर्शन करने गए। श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जाए वहीं तुम्हारे पापमुक्ति का मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आ पहुंचे तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्यकुण्ड में स्नान किया, उनके सारे हथियार गल गए। 

 

बड़ की लकड़ी से बनी मूर्ति की होती है पूजा

कटारमल सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा के ‘कटारमल’ नामक स्थान पर स्थित है। यह सूर्य मंदिर न सिर्फ़ समूचे कुमाऊं मंडल का सबसे विशाल, ऊंचा और अनूठा मंदिर है, बल्कि ओडिशा के ‘कोणार्क सूर्य मंदिर’ के बाद एकमात्र प्राचीन सूर्य मंदिर भी है। ‘भारतीय पुरातत्त्व विभाग’ द्वारा इस मंदिर को संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है। मंदिर नौवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित हुआ माना जाता है। इस सूर्य मंदिर को ‘बड़ आदित्य सूर्य मंदिर’ भी कहा जाता है। इस मंदिर में भगवान आदित्य की मूर्ति किसी पत्थर अथवा धातु की नहीं अपितु बरगद की लकड़ी से बनी है। मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार भी नक्काशी की हुई लकड़ी का ही था, जो इस समय दिल्ली के ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ की दीर्घा में रखा हुआ है।

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना