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18 साल में 200 से ज्यादा लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके गोपालगंज के नवीन

2 वर्ष पहले
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लावारिस शव का अंतिम संस्कार करते नवीन। - Dainik Bhaskar
लावारिस शव का अंतिम संस्कार करते नवीन।
  • नवीन श्रीवास्तव 2001 में सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए प्रयागराज गए थे, तभी कुंभ में मौसेरा भाई डूब गया
  • 32 दिन तक भाई का शव गंगा नदी में ढूंढते रहे, एक नाविक की सीख से करने लगे लावारिस शवों का अंतिम संस्कार

पटना. बिहार के गोपालगंज जिले के नवीन श्रीवास्तव 18 साल से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। अब तक वह 200 से ज्यादा शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। उन्हें इसकी प्रेरणा भाई की मौत के बाद एक मल्लाह से मिली। नवीन कहते हैं कि इस काम के चलते परिवार ने मुझे छोड़ दिया। लोग शादियों में नहीं बुलाते हैं, लेकिन धीरे-धीरे समाज में बदलाव आ रहा है। 
 
नवीन के मुताबिक, मैं सिविल सर्विसेज की तैयारी करने प्रयागराज गया था। बात 2001 की है। कुंभ का मेला लगा था। मेरा मौसेरा भाई मेला देखने आया था। 14 जनवरी को वह गंगा घाट पर स्नान करते वक्त डूब गया। मुझे उसका शव नहीं मिला। मैं रोज गंगा तट पर जाता और घाटों की खाक छानता। नदी में बहते शव को रोकता, उन्हें पलटकर देखता कि कहीं यह मेरे भाई का शव तो नहीं। ऐसा 32 दिनों तक करता रहा।
 

नाविक की बात से मिला जीवन का मिशन
नवीन बताते हैं- नदी में जब शव बहते हैं तो उसकी पीठ आसमान की तरफ होती है। मैंने एक दिन ऐसे ही बह रहे शव को रोका और पलटकर देखा। वह भी भाई का शव नहीं था तो उसे वापस नदी में बहाने लगा। इसी दौरान नाविक ने कहा कि अगर यह आपके भाई का शव होता तो क्या करते? यह सुनकर मैं सन्न रह गया। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। वह मेरा भाई न सही किसी न किसी का भाई तो था। मैं उस शव को ले गया और नदी के बीच बने टापू पर उसका अंतिम संस्कार किया। 
 

2001 से कर रहे हैं लावारिस शवों का संस्कार 
बकौल नवीन, ‘‘इसके बाद मैं नदी में जाता, लावारिस शव को खोजता और उसका अंतिम संस्कार करता। कोई बोरे में बंधा मिलता तो कोई क्षत विक्षत। किसी को मछलियां और जानवर नोंच चुके होते तो किसी का सिर नहीं होता। ऐसे शव को मैं घाट पर ले जाता और अन्य दाह संस्कारों के बाद बची लकड़ियों को जमाकर उसका अंतिम संस्कार करता।’’
 

\'कई लोग मुझसे अछूता व्यवहार करते हैं\'
‘‘परिवार और समाज के लोगों को जब जानकारी मिली कि मैं लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करता हूं तो लोग इसे स्वीकार न कर सके। कहने लगे यह तो डोम का काम है। तुम क्यों करते हो? अनजान लाश को क्यों छूते हो? इस दौरान घर में एक के बाद एक कई हादसे हुए। सबने मान लिया कि मेरी वजह से यह सब हो रहा है। मेरा जुनून तब भी नहीं छूटा। आखिरकार लोगों ने ही मुझे छोड़ दिया। आज भी बहुत से लोग मुझसे अछूत जैसा व्यवहार करते हैं। शादी-ब्याह में नहीं बुलाते। हालांकि धीरे-धीरे समाज का मेरे प्रति व्यवहार बदल रहा है। लोग अब यह समझने लगे हैं कि मैं जो भी कर रहा हूं वह गलत नहीं है। लावारिस शवों का भी विधि-विधान से अंतिम संस्कार जरूरी है।’’
 

‘जो जिस धर्म का, उसी अनुसार अंतिम संस्कार’
नवीन के मुताबिक- 2005 के बाद मैं गोपालगंज में रहने लगा। यहां सदर अस्पताल में शव रखने का कोई इंतजाम नहीं था। शव को एक नाले के पास फेंक दिया जाता था। शव की बू से आसपास के लोग परेशान रहते थे। मैंने ऐसा होने से रोकने के लिए एक संस्था बनाई और शव को उठाने लगा। लावारिस शव को 72 घंटे बाद ही अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा सकता है। हॉस्पिटल में शव रखने का इंतजाम नहीं है, जिसके चलते अधिकतर शव खराब हो जाते हैं। मेरी कोशिश होती है कि मृतक जिस धर्म का है, उसका अंतिम संस्कार उसी अनुसार हो।
 
‘‘जब किसी शव को लेकर आता था तो गांव के लोग कहते थे कि कहां के आदमी के शव को हमारे कब्रिस्तान में लेकर आए हो। विरोध के चलते मैं शव का अंतिम संस्कार अपनी जमीन पर करता था। लोग भले विरोध कर रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि यह काम पवित्र है। अब लोग विरोध की जगह समर्थन करते हैं।’’
 


 

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