भारत यात्रा ग्राउंड रिपोर्ट / भाजपा को मालवा में अपने दम पर और निमाड़ में कांग्रेस को जयस के बूते जीत की आस

Dainik Bhaskar

May 16, 2019, 03:05 AM IST



BJP in powerfull in malwa and congress in nimad
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BJP in powerfull in malwa and congress in nimad

  • आखिरी चरण में मप्र की 8 सीटों में से 6 पर मौजूदा सांसदों के टिकट कटे, यहां कर्जमाफी का असर दिखने की भी उम्मीद
  • इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, मंदसौर, धार, खरगोन व खंडवा सीट के लिए 19 मई को होगी वोटिंग

इंदौर देश की क्लीन सिटी है, जितना शहर साफ है, उतनी ही आठ बार यहां से सांसद रहीं ताई सुमित्रा महाजन की छवि है। इस सीट के निर्णायक डेढ़ लाख मराठी वोट हैं। ताई को टिकट नहीं मिलने... चुनाव नहीं लड़ने की मजबूरी वे समझते हैं। इसलिए भाजपा से नाराज तो हैं, परंतु कहते हैं ताई पर दाग नहीं लगे इसलिए वोट भाजपा को ही देंगे। यही वजह है कि भाजपा शंकर लालवानी के नए चेहरे के बावजूद यहां मजबूत है।

 

भाजपा का मुकाबला कांग्रेस के पुराने नेता पंकज संघवी से है जो यूं तो लालवानी की तरह पार्षद का ही चुनाव जीते हैं, लेकिन महापौर, विधानसभा व लोकसभा जैसे बड़े चुनाव हार चुके हैं। हर बड़े चुनाव में उनकी हार का मार्जिन बेहद नजदीकी रहा है। संघवी व्यक्तिगत तौर पर लालवानी पर भारी हैं और शहर जितनी पकड़ उनकी ग्रामीण वोटों पर भी है। पर परेशानी कांग्रेस की कर्जमाफी दिखा रही है। कजलाना गांव के भागीरथ मुकाती और मदन पटेल कहते हैं- हमें दो-दो लाख की कर्जमाफी नहीं चाहिए, फसल की खरीद बढ़े और उसका पूरा दाम मिल जाए। फसल का पूरा दाम ही दे दे तो लाखों कमा सकते हैं। कांग्रेस ने अब किसानों का भरोसा नहीं जीता तो उसे बड़ा झटका लग सकता है। 

 

देवास में इस बार दोनों दलों के चेहरे गैर राजनीतिक  हैं। भाजपा ने जज रहे महेंद्र सोलंकी और कांग्रेस ने पद्मश्री कबीर पंथी लोकगायक प्रहलाद टिपानिया को टिकट दिया है। दोनों बलाई समाज से  हैं जिनका मालवा-निमाड़ में बड़ा वोट बैंक है। टेकरी पर बने चामुंडा माता मंदिर की रोड पर माता के लिए फूलमालाएं बना रहा अखलाक कहता है- मोदी सरकार बच्चा होने पर पैसा देती है, फिर बच्चियों की शादी के लिए। गेहूं दे रही है, घर बना दिया और इलाज भी फ्री कर रही है। इससे ज्यादा क्या चाहिए? इसलिए वोट न धर्म पर, न जात पर, सिर्फ मोदी के नाम पर। देवास में मुकाबला बराबर का है। 

 

उज्जैन के मौजूदा सांसद चिंतामन मालवीय की जगह भाजपा ने अनिल फिरोजिया को उतारा है। उज्जैन भाजपा का गढ़ है, पिछले 11 चुनाव में वह 7 बार जीती है। लोकसभा की 8 विधानसभा सीटों में 3 पर भाजपा का ही कब्जा है। सामने कांग्रेस के बाबूलाल मालवीय हैं जो दिग्विजयसिंह के करीबी हैं। यहां की 5 विधानसभा सीटें जीतने के कारण कांग्रेस आत्मविश्वास में है।  

 

रतलाम की सीट पिछली बार मोदी लहर में भाजपा के दिलीपसिंह भूरिया के पास थी, परंतु उप चुनाव में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने छीन ली। कांतिलाल भूरिया फिर से मैदान में हैं, भाजपा ने उनके सामने जीएस डामोर को उतारा है जो झाबुआ से विधायक भी हंै। भाजपा सीट पर फिर से कब्जा चाहती है इसलिए उसने विधायकों को चुनाव नहीं लड़ाने के नियम को तोड़ा है। किसान आंदोलन वाली मंदसौर की जमीन एक बार फिर भाजपा के सांसद सुधीर गुप्ता और उनसे ही हारी मीनाक्षी नटराजन का मुकाबला देख रही है। गुप्ता को लेकर स्थानीय भाजपा में नाराज़ी थी परंतु उसे कंट्रोल कर लिया है। यह सीट भाजपा की सुरक्षित सीट मानी जाती है, यहां से उसे 8 बार जीत मिली है। 

 

धार में अभी भाजपा की सावित्री ठाकुर सांसद है, ठाकुर का टिकट कट चुका है, उनकी जगह पूर्व सांसद छतरसिंह दरबार मैदान में हैं। कांग्रेस ने दिनेश ग्रेवाल को उतारा है, उन्हें दूसरे दावेदार गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी की नाराज़गी झेलनी पड़ी है। यहां का बड़ा फैक्टर आदिवासी संगठन जयस है जो कांग्रेस के साथ है। गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की तरह बीते बरसों में जयस के हीरालाल अलावा भी उभरे हैं। कांग्रेस ने खरगोन से जयस के डा. गोविंद को टिकट देकर धार की सीट पर भी उनका साथ मुकम्मल कर लिया इसलिए कांग्रेस मजबूत दिख रही है। 

 

खरगोन में भी भाजपा ने सांसद सुभाष पटेल को बदल कर गजेंद्रसिंह पटेल को पार्टी का नया चेहरा बनाया है। जिनका मुकाबला कांग्रेस के डा. गोविंद मुजाल्दा से है जिनके साथ मजबूत आदिवासी वोट बैंक खड़ा है। विधानसभा में खरगोन की सभी सीटें कांग्रेस ने जीती थीं मगर लोकसभा में खंडवा व बडवानी की भी सीटें शामिल हैं इसलिए भाजपा-कांग्रेस के पास चार-चार सीटें हैं। भाजपा लगातार दो बार जीतती रही है, कांग्रेस जयस की गुगली से हैट्रिक रोकने का प्रयास कर रही है। 

 

खंडवा सीट हॉटसीट बनी हुई है। भाजपा ने मौजूदा सांसद नंदकुमार सिंह चौहान पर फिर भरोसा जताया है। चौहान छह माह पहले तक प्रदेशाध्यक्ष थे और कांग्रेस ने उनके मुकाबले में अरूण यादव को उतारा है वे भी छह माह पहले तक प्रदेशाध्यक्ष थे। दोनों परंपरागत प्रतिद्वंदी है, यह उनका तीसरा मुकाबला है। 2009 में अरूण यादव सांसद थे, 2014 में चौहान जीते, अब 2019 में कौन होगा? यह कांग्रेस के यादव-गुर्जर नेताओं की गुटबाजी खत्म होने पर निर्भर करेगा। सचिन बिरला गुर्जर नेता व विधायक है, लोग कहते हैं उनकी पटरी यादव से कम बैठती है। यादव के भाई सचिन यादव कांग्रेस सरकार में मंत्री है, भाई का लोकसभा चुनाव वहीं हैंडल कर रहे हैं। उधर गुटबाजी के खतरे में भाजपा सांसद चौहान भी है, प्रदेश की भाजपा सरकार में 5 साल मंत्री रही अर्चना चिटनीस  का गुट उनसे नाराज चल रहा है। बहरहाल मुकाबला कड़ा है और कांग्रेस की उम्मीद ज्यादा बड़ी दिख रही है क्योंकि लोकसभा की 4 विधानसभा सीटों पर उसका पलड़ा भारी है, भाजपा के पास 3 और 1 सीट पर निर्दलीय विधायक है।


असरदार : किसानों की नाराजगी बड़ा फैक्टर

  • मुद्दे : कर्जमाफी मुद्दा है, मगर माफ नहीं होने का। कांग्रेस का भरोसा टूट रहा है। समर्थन मूल्य भी मुद्दा है। फसल की पूरी कीमत देने में दोनों ही दल नाकाम रहे हैं। पीने के पानी के संकट और बिजली कटौती की चर्चा है। राष्ट्रवाद के साथ सपाक्स भी नजर आ रहा है। 
  • जाति समीकरण : इंदौर व उज्जैन की शहरी सीटों पर ब्राह्मण वोटर ज्यादा है जो भाजपा के साथ है। पांच लाख सवर्ण बंटे हुए हैं। 2 लाख मुस्लिम वो भी असरदार हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बलाई, यादव, गुर्जर व खाती समाज प्रभावी है। बलाई वर्ग दोनों दलों के साथ दिखता है।
  • प्रभावी : कांग्रेस का जयस से गठबंधन है जिसका फायदा मिल रहा है। मालवा-निमाड़ में संघ-भाजपा की जमीन मजबूत है। गुजरात व राजस्थान की पड़ोसी सीटें होने के कारण भाजपा के बड़े नेताओं ने यहां डेरा डाल दिया है। खरगोन, रतलाम व धार में पाटीदार फैक्टर भी है।
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