भास्कर पड़ताल / देश में बच्चों के डॉक्टर मात्र 25 हजार, जरूरत दो लाख से ज्यादा

प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
X
प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

  •  कोटा में एक माह में 110 बच्चों की मौत, क्यों मर रहे बच्चे?
  • हर वर्ष 5 साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों की मौत होती हैै
  • इनमेंं 25 फीसदी बच्चों की मौत निमोनिया और डायरिया से होती है

दैनिक भास्कर

Jan 05, 2020, 09:59 AM IST

दिल्ली/कोटा (पवन कुमार/ आशीष जैन). राजस्थान में कोटा के जेकेलोन अस्पताल में एक माह से भी कम समय में 110 बच्चों की मौत हो चुकी है। 2019 में यह आंकड़ा करीब 963 है।  अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक, मौत के अलग-अलग कारण हैं। ज्यादातर बच्चे प्री-मैच्योर डिलीवर हुए। विडंबना ये है कि किसी जिम्मेदार पर अभी तक कोई एक्शन नहीं हुआ है।

ऐसे में भास्कर ने देशभर से बड़े हादसों की जानकारी जुटाई और जाना कि आखिर देश में बच्चों की जान इतनी सस्ती क्यों हैं? पता चला कि देश में हर साल 5 वर्ष से कम उम्र के 10 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। इन बच्चों की मौत की दो सबसे बड़ी वजह निमोनिया और डायरिया जैसी घातक बीमारी है। करीब 25 फीसदी बच्चों की मौत की वजह ये दो बीमारी ही बनती है।

कई तरह के निमोनिया से बचाव के लिए भारत सरकार द्वारा टीका दिया जाता है, लेकिन निमोनिया होने के कई ऐसे कारण भी हैं, जिनके लिए अभी तक टीका बन ही नहीं पाया है। फिलहाल 12 तरह की बीमारियों से बचाव के लिए टीका दिया जा रहा है, लेकिन अभी भी 80 से 84 फीसदी बच्चों का ही पूरी तरह से टीकाकरण हो पा रहा है।

दूसरी तरफ विशेषज्ञ बताते हैं कि अभी देश को दो लाख से ज्यादा पीडियाट्रिक्स की जरूरत है, लेकिन करीब 25 हजार ही चिकित्सक मौजूद हैं। ये कमी पूरी कर ली जाए तो बच्चों की मौत की संख्या काफी हद तक कम हो सकती है। 31 दिसंबर 2018 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में करीब 1500 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) ऐसे हैं, जिसमें एक भी डॉक्टर तैनात नहीं है, जबकि करीब 15 हजार ऐसे पीएचसी हैं जिनमें सिर्फ एक डॉक्टर है।

इस मौसम में बच्चों की मौत की सबसे बड़ी वजह ठंड होती है, अधिक ठंड की वजह बच्चे हाइपोथर्मिया के शिकार होते हैं। ऐसी स्थिति में यदि बच्चों के शरीर के तापमान, शुगर और ऑक्सीजन मेंटेन कर लिया जाए तो जान बचाई जा सकती है। कम वजन वाले बच्चों में संक्रमण का खतरा रहता है ऐसे में यह मौत की बड़ी वजह बनती है।

5 बड़े हादसे, लेकिन सभी जिम्मेदार मुक्त

मध्यप्रदेश- इंदौर के अस्पताल में 5 माह में 78 बच्चों की मौत
क्या हुआ था- 2016 में जनवरी से मई तक एमवाय में 78 बच्चों ने दम तोड़ा। आईसीयू में भर्ती बच्चों की मौत की वजह वेंटीलेटर की कमी बताई गई। डॉक्टर्स ने गंभीर इनफेक्शन को मौत की वजह बताया, 
कार्रवाई क्या हुई?- संभागायुक्त और स्वास्थ्य संचालनालय भोपाल ने रिपोर्ट तलब की। शिशु रोग विभाग ने तर्क दिया था कि हर साल इतने बच्चों की मौत हो जाती है। सभी जगह यही स्थिति है।
 

राजस्थान- बांसवाड़ा में 51 दिनों में 81 बच्चों की मौत
क्या हुआ था-
बांसवाड़ा में वर्ष 2017-18 में जुलाई और अगस्त माह में राजकीय महात्मा गांधी चिकित्सालय के एसएनसीयू वार्ड में 51 दिनों में 81 बच्चों की मौत हुई। यह मामला देशभर में चर्चाओं में रहा।
कार्रवाई क्या हुई?- हाईकोर्ट ने संज्ञान भी लिया। पीएमओ सहित 3 डॉक्टर निलंबित किए गए। दोषी नर्सिंगकर्मियों को भी निलंबित किया गया था। अब सब बहाल हो चुके हैं।

बिहार- सिर्फ मुजफ्फरपुर में हुई 111 बच्चों की मौत
क्या हुआ था-
बिहार में 2019 में सिर्फ गर्मी के करीब 5 माह में मुजफ्फरपुर जिले में ही 111 बच्चों की मौत हो गई। कारण बताया गया एक्यूट इंसेफेलाइटिकस सिंड्रोम (एईएस)। कारण जानने के लिए कई जांचें हुईं। कई अध्ययन हुए। मौतें इसलिए भी बढ़ीं क्योंकि शुरुआत में स्वास्थ्य विभाग ने बीमारी को नजरअंदाज किया था। 
कार्रवाई क्या हुई?- मुजफ्फरपुर में सबसे अधिक प्रभावित पांच प्रखंडों में 100 फीसदी टीकाकरण को लेकर अभियान शुरू हुआ। मृत बच्चों के अभिभावकों को 4 लाख रुपए की सहायता राशि भी दी गई, लेकिन अब तक चिकित्सकों में बीमारी के किसी एक कारण या इलाज पर सहमति नहीं है।

उत्तर प्रदेश- बहराइच में हुई थी 71 बच्चों की मौत
क्या हुआ था-
वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में 45 दिनों में 71 बच्चों की मौत  हुई थी। तत्कालीन बहराइच जिला अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डीके सिंह ने कहा था कि अस्पताल में 200 बेड़ हैं, जिन पर 450 मरीज भर्ती रहे, सीमित संसाधनों की वजह से अस्पताल प्रशासन को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। 
कार्रवाई क्या हुई?- इस मामले में किसी भी जिम्मेदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई थी। कहा गया था कि इन बच्चों की मौत विभिन्न बीमारियों के कारण हुई थी।

उत्तर प्रदेश- गोरखपुर में 5 दिनों में 64 मौतें
क्या हुआ था-
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 2017 के अगस्त महीने में महज 5 दिनों में 64 नैनिहालों की मौत हो गई थी। कारण ऑक्सीजन की कमी सामने आया था। 
कार्रवाई क्या हुई?- बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के मामले में प्राचार्य तथा डॉ. कफील समेत कई चिकित्सकों को जेल हुई। विभागीय स्तर पर इसकी जांच भी चल रही है। इस मामले में तत्कालीन प्राचार्य डा. राजीव मिश्रा, डा. सतीश कुमार, डा. कफील अहमद खान, डा. पूर्णिमा शुक्ला समेत नौ लोगों को जेल भेजा गया था। सभी आरोपियों को अब जमानत मिल चुकी है। विभागीय जांच में प्रिंसिपल सेकेट्री हिमांशु कुमार ने डॉ. कफील को क्लीन चिट दे थी। विभागीय जांच में आरोपी रहे फार्मेसी के गजानंद जायसवाल को भी क्लीन चिट मिल चुकी है। क्लर्क रहे उदय शर्मा, संजय त्रिपाठी और सुधीर पांडेय को सुप्रीम कोर्ट से तो जमानत मिल चुकी, लेकिन विभागीय जांच अभी भी शुरू नहीं हुई है।

इनपुट: नीता सिसौदिया, इंदौर। चिराग द्विवेदी, बांसवाड़ा। ललितांशु, मुजफ्फरपुर। आदित्य तिवारी, बहराइच।
एक्सपर्ट : डॉ.प्रदीप हलधर, सलाहकार, स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार। डॉ.अमन प्रताप सिंह, विभागाध्यक्ष, भगवान महावीर अस्पताल, दिल्ली।

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना