कहानी / कॉलेज की लड़की ने शुरू किया कांग्रेस रेडियो, बंदिशों के दौर में देता था आजादी का संदेश



ऊषा ने अंडरग्राउंड सीक्रेट रेडियो स्टेशन बना लिया था। शिकागो रेडियो के मालिक ने उन्हें साजो-सामान और टेक्नीशियन उपलब्ध कराए थे। ऊषा ने अंडरग्राउंड सीक्रेट रेडियो स्टेशन बना लिया था। शिकागो रेडियो के मालिक ने उन्हें साजो-सामान और टेक्नीशियन उपलब्ध कराए थे।
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ऊषा ने अंडरग्राउंड सीक्रेट रेडियो स्टेशन बना लिया था। शिकागो रेडियो के मालिक ने उन्हें साजो-सामान और टेक्नीशियन उपलब्ध कराए थे।ऊषा ने अंडरग्राउंड सीक्रेट रेडियो स्टेशन बना लिया था। शिकागो रेडियो के मालिक ने उन्हें साजो-सामान और टेक्नीशियन उपलब्ध कराए थे।

  • भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सफल रहा था प्रयोग

Dainik Bhaskar

Aug 24, 2019, 04:35 PM IST

जंग-ए-आजादी के एक रेडियो चैनल भी था, जो आंदोलनकारियों की आवाज बना था। यह रेडियो स्टेशन तीन बार में कुल 88 दिन चला। इसे मुंबई की एक लड़की ने अपने दम पर शुरू किया और अंग्रेजों की नींद हराम कर दी। स्वतंत्रता संग्राम के लड़ाकों की मदद से उन्होंने अंडरग्राउंड रेडियो स्टेशन तैयार कर लिया था, जो कभी लगातार एक जगह पर नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग जगहों से ब्राॅडकास्टिंग करता था। 

 

अंग्रेजों के खिलाफ रेडियो के जरिए आजादी की मशाल जलाने वाली यह लड़की ऊषा मेहता थीं, जिन्हें उस वक्त ऊषाबेन के नाम से भी जाना जाता था। 25 मार्च 1920 को सूरत (गुजरात) के सरस इलाके में जन्मी ऊषा बचपन से ही महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रेरित थी। ऊषा बेन के पिता ब्रिटिश राज में जज थे, जिसके चलते ऊषा को स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने में काफी दिक्कतें आती थीं।

 

जब उनके पिता 1930 में रिटायर हो गए और परिवार बॉम्बे शिफ्ट हो गया, तब युवा ऊषा ने चंदरमजी हाई स्कूल ज्वाइन किया। यहां उनके लिए बुलेटिन और आजादी से जुड़ी सामग्री का वितरण और उसका प्रचार-प्रसार आसान हो गया। वह तब स्वतंत्रता संग्राम में गिरफ्तार अपने साथियों से भी जेल जाकर मिलती थीं और उन्हें संदेश पहुंचाती थीं। 


9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हो गई। ऊषा बेन स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल हो गईं। तकरीबन 15 दिनों तक उनके ठिकाने का किसी को पता नहीं था।

 

ऐसा लग रहा था कि भारत छोड़ो आंदोलन, जिसमें ब्रिटिश हुकूमत ने आवाज दबाने के लिए 1 लाख से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, ऊषा भी उन्हीं में थीं। इस निराशा भरे माहौल के बीच एक दिन अचानक देश में किसी अनजान स्थान से एक आवाज़ रेडियो पर गूंजी- ‘यह कांग्रेस रेडियो है’। फ्रीक्वेंसी थी-42.34। यह आवाज ऊषा मेहता उर्फ ऊषाबेन की थी। 


ऊषा ने अंडरग्राउंड सीक्रेट रेडियो स्टेशन बना लिया था। अपने साथियों विट्ठलभाई झवेरी, चंद्रकांत झवेरी, बाबूभाई ठक्कर और ननका मोटवानी (शिकागो रेडियो के मालिक, जिन्होंने ऊषा को साजो-सामान और टेक्नीशियन उपलब्ध कराए थे) के साथ ऊषा रेडियो पर गांधी और दूसरे बड़े नेताओं के संदेश प्रसारित करने लगीं। इसके अलावा रेडियो से डॉ राम मनोहर लोहिया, अच्युतराव पटवर्धन और पुरुषोत्तम त्रिकमदास के भाषण प्रसारित होते थे।

 

अंग्रेज सरकार के चलते ऊषाबेन और उनके साथी हर दिन स्टेशन की लोकेशन बदलते थे। गोपनीयता के साथ कांग्रेस रेडियो महज 88 दिन तक चला, वो भी तीन हिस्सों में। पहला प्रसारण 27 अगस्त 1942, दूसरा फरवरी-मार्च 1943 और जनवरी 1944 में तकरीबन 1 हफ्ते चला। इस तरह तीन बार में कुल 88 दिन तक कांग्रेस रेडियो से प्रसारण जारी रहा। 

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