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कोरोना इफैक्ट:बड़ी मुश्किल से घर को संभाला, लॉकडाउन में फिर से भूखे मरने की नौबत आई तो ऐसे लड़ रही है पहली स्कूटी कैब ड्राइवर

जालंधर(पंकज सिब्बल)6 दिन पहले
जालंधर में परांठा जंक्शन पर एक ग्राहक को खाना परोसती कांता चौहान।
  • 2006 में जालंधर के संत राम से हुई थी मोहाली से ताल्लुक रखती कांता चौहान की शादी, दो बच्चे हैं दंपति के
  • हादसे के बाद पति के इलाज पर सारी जमापूंजी खर्च हो गई तो हालात यहां तक हो गए कि घर में खाने तक को कुछ नहीं होता था
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कोरोना की महामारी ने सूबे में बहुत से लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि घर का गुजर कैसे चलाएं। इन्हीं में से एक जालंधर की कांता चौहान भी हैं, जिनके नाम शहर की पहली स्कूटी कैब ड्राइवर होने की उपलब्धि दर्ज है। हालांकि पति के एक हादसे में घायल होने के बाद जब हालात गड़बड़ाए तो कांता ने कैब सर्विस का काम शुरू करके घर को संभाल लिया था। अब कोरोना लॉकडाउन में कैब सर्विस बंद हो जाने के चलते फिर से एक बार वही भूखे मरने की नौबत आ गई, लेकिन इसे हौसला ही कहेंगे कि हार नहीं मानते हुए कांता ने रोटी, दाल-चावल, चाय और परांठे की रेहड़ी लगा ली।

सालभर पहले पति के एक्सीडेंट के बाद इस तरह संभाला था कांता ने घर को।

2006 में उस वक्त मूल रूप से मोहाली से ताल्लुक रखती कांता बेहद खुश थी, जब जालंधर के संत राम से शादी हुई। पति ऑटो रिक्शा चलाते थे, लेकिन परिवार सुखी था। एक दिन पति के एक्सीडेंट के बाद जिंदगी पटरी से उतर गई। सारी जमापूंजी इलाज में खर्च हो गई और हालात यहां तक हो गए कि घर में खाने तक को कुछ नहीं होता था। ऐसे में घर चलाने के लिए खुद कुछ करने की सोची। पति ने सलाह दी कि एक निजी कंपनी के लिए कैब (स्कूटर) ड्राइवर बन जाएं। इसके बाद कांता निजी कंपनी के साथ स्कूटर लेकर शहर की सड़कों पर निकलने लग गई। शहर की पहली स्कूटर कैब चालक कांता चौहान उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गई, जो हालात के आगे हथियार डाल देती हैं। पहले सिर्फ महिला सवारी तो अब कोई भी सवारी उठा रही थी

बकौल कांता चौहान, मैंने पहले काफी सोचा कि पति कुछ कर नहीं सकते हैं। दो बच्चें हैं उन्हें खाना क्या खिलाना है। किचन में राशन नहीं होता था। पति की दवाइयों का इंतजाम करना होता था। इलाज के पैसे जुटाने होते थे। यह सब कुछ 12वीं पास कांता के लिए पहाड़ चढ़ने से कम नहीं था, लेकिन पति की सलाह काम आई और एक अक्टूबर 2019 को स्कूटर का हैंडल थाम लिया। दरअसल, छोटी उम्र में ही पिता का साया सिर से उठ गया था। मां ने पालकर बड़ा किया। शायद यही वजह थी कि बचपन से ही शुरू हुआ संघर्ष आज तक जारी है। डर भी लगता था, जिसके चलते मैं केवल महिलाओं की ही सवारी लेती थी। अब पुरुषों को भी उनकी मंजिल तक पहुंचाने में कोई हिचक या भय महसूस नहीं होता था। घर भी चलने लगा था, पर अचानक कोरोना की महामारी ने मेरी तरह हजारों लोगों के आगे रोटी का संकट खड़ा कर दिया।

झूठी वाहवाही लूटने वाले इन लोगों को सोचना चाहिए
कांता के परिवार के ताजा हालात को लेकर एक बड़ा सवालिया निशान सरकारी राहत सामग्री वितरण पर भी उठ रहा है। पूरे प्रदेश से समय-समय पर पक्षपात और लापरवाही के आरोप लगते रहे हैं, वहीं कांता की मानें तो इनके परिवार को भी कोई मदद नहीं मिली। हैरानी की बात यह है कि यह परिवार इलाके के बेबाक नेता और मौजूदा विधायक परगट सिंह के बिलकुल पड़ोस में रहता है।

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