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इंटरव्यू / भारत सरकार की पूर्व स्वास्थ्य सचिव ने कहा- रिटायर्ड मेडिकल स्टाफ की सेवाएं लेनी चाहिए, ओपीडी बंद न कर उसका तरीका बदलें

पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव। (फाइल) पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव। (फाइल)
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पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव। (फाइल)पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव। (फाइल)

  • सुजाता राव ने कहा- कोरोना को रोकने के लिए सामाजिक दूरिया बनाकर ही सफलता पाई जा सकती है

  • बोलीं- इससे ज्यादा मुश्किल दौर देश ने कभी नहीं देखा, लॉकडाउन का पालन देश की जनता को करना ही होगा

दैनिक भास्कर

Mar 26, 2020, 08:21 AM IST

नई दिल्ली. कोरोना महामारी से निपटने के लिए भारत को क्या करना चाहिए और अब तक के प्रयास को केंद्र सरकार में काम कर चुकीं पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव किस रूप में देखती हैं, इस पर भास्कर के वरिष्ठ संवाददाता पवन कुमार ने उनसे विस्तार से बातचीत की। पेश है प्रमुख अंश...।

1. कितना मुश्किल दौर है देश के लिए और किस हद तक स्थिति खराब हो सकती है?
जवाब :
हमने इससे ज्यादा मुश्किल दौर कभी नहीं देखा। हालांकि, अब प्रधानमंत्री ने देश में लॉकडाउन की घोषणा की है, इसका पालन देश की जनता को करना ही होगा और यदि ऐसा होता है लोग सामाजिक दूरी बनाकर रहते हैं तो इसे फैलने से बहुत हद तक रोका जा सकता है। चुनौतियां हैं, तैयारी और करनी पड़ेगी। सरकार को भी इस लॉकडाउन की स्थिति को सेटल करने में तीन से चार दिन लगेंगे। इन परिस्थतियों में स्थानीय निकायों का काम बहुत बढ़ जाता है और बुनियादी सुविधाएं जनता तक पहुंचाना होगा। सख्ती के साथ-साथ हमदर्दी भी उतना ही जरूरी है।

2. इन परिस्थितियों से निपटने के लिए देश कितना तैयार है, हमारे पास कितने संसाधन हैं?
जवाब :
चुनौती बहुत बड़ी है। सबको अपना-अपना काम ईमानदारी से करना होगा। बड़े और टर्सरी केयर अस्पतालों के साथ-साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर, डिस्पेंसरी को भी अपनी इस समय अपनी उपयोगिता बढ़-चढ़ कर साबित करनी होगी। 108 और राज्यों की एंबुलेंस सेवा को 24 घंटों तैयार रहना होगा। निजी क्षेत्र के अस्पतालों को भी इसमें उतना ही काम करना है जितना सरकारी क्षेत्र को। राज्यों को हरसंभव मदद केन्द्र की ओर से मिलनी चाहिए, क्योंकि कई राज्य ऐसे हैं, जहां स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति अच्छी नहीं है।

3. यहां डॉक्टर, नर्सेज और पैरामेडिकल स्टाफ कहां से आएंगे?
जवाब :
सरकार को चाहिए कि अभी से सेवानिवृत डॉक्टर्स, नर्सेज और पैरामेडिकल स्टाफ को भी इंगेज करना चाहिए। जल्द से जल्द ट्रेनिंग देकर उन्हें भी इस महामारी से निपटने में मदद लेने के लिए तैयार रखना होगा।

4. सभी बड़े अस्पतालों में आपातकालीन सेवा के अलावा ओपीडी सेवा बंद कर दी गई है, इससे कितनी दिक्कत होगी?
जवाब : 
ओपीडी सेवा बंद नहीं करनी चाहिए। इसका तरीका बदला जा सकता है। किसी को कोई परेशानी होगी तो वह आपातकालीन विभाग में नहीं जा सकता और यदि जाएगा तो डॉक्टर उसका वहां इलाज भी नहीं करेंगे। जैसे भी ओपीडी चलाना चाहिए। जरुरत पड़े तो टेंट लगाकर या अस्पताल परिसर के किसी हिस्से में ओपीडी शुरू रखना चाहिए। यहां पीजी स्टूडेंट्स की ड्यूटी लगाई जा सकती है। ओपीडी सेवा बंद कर दी गई तो यह अलग से एक चुनौती हो जाएगी।

5. स्वास्थ्य क्षेत्र में कई राज्यों की स्थिति खराब है, महामारी की स्थिति किन राज्यों में सबसे ज्यादा दिक्कत आएगी?
जवाब :
उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी दिक्कते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों को केन्द्र सरकार से ज्यादा मदद की जरुरत होगी, क्योंकि इन राज्यों में जनसंख्या के अनुसार स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं।

6. प्रधानमंत्री ने 15 हजार करोड़ रुपए कोविड-19 के लिए आवंटित किए हैं, क्या यह पर्याप्त है?
जवाब :
इतने बड़े देश के लिए और जिस तरह की व्यवस्था अभी करनी है, उसके लिए यह राशि पर्याप्त नहीं है, लेकिन यह छोटी राशि भी नहीं है। अभी और पैसे की जरुरत पड़ेगी और  सरकार की ओर से और राशि आवंटित की जाएगी। यह रकम तो आईसीयू, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर, पीपीई, मास्क, गाउन, ग्लव्स, आइसोलेशन रूम, ट्रेनिंग और दूसरी बुनियादी सुविधाओं में ही उपयोग होगा।

7. वेंटिलेटर और आईसीयू की व्यवस्था इतनी जल्दी हो पाएगी?

जवाब : बहुत मुश्किल है,पर करना पड़ेगा कैसे करेंगे, कहना मुश्किल है। कोई विकल्प नहीं है।

8. कोरोना वायरस तेजी से फैल रहा है, ऐसे में मरीजों, मृतकों की संख्या कितनी हो सकती है?

जवाब : मरीजों व मृतकों की संख्या का अनुमान लगाना ठीक नहीं रहेगा, प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा, कितना बड़ा नुकसान हो सकता है, अंदाजा लगाना मुश्किल है। वायरस न फैले और लोगों को इससे बचाया जाए, इसीलिए लॉकडाउन का निर्णय लिया। गांवों की तुलना में शहरों में बीमारी फैलने का डर ज्यादा है, क्योंकि शहरों में छोटे-छोटे घरों में सामाजिक दूरी बनाए रखना मुश्किल काम है। शहरों में लोग स्लम में रह रहे हैं यह बड़ी चुनौती है।

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