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भास्कर पड़ताल / अनाज मंडी में कई फैक्ट्रियां, इनमें बच्चों से भी काम लिया जाता है; सीढ़ियां इतनी संकरी कि दो लोग साथ नहीं निकल सकते

Delhi Fire | Delhi Factory Fire Bhaskar Investigation News Updates; Children Are working as a labour Where illegal Factory in north Delhi's Anaj Mandi
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  • अनाज मंडी की जिस फैक्ट्री में आग लगी, उससे 150 मीटर दूर इमारत में भास्कर ने पड़ताल की
  • एक कमरे में 8-10 मशीनें, 15-15 घंटे काम के बाद मजदूर वहीं खाते और वहीं सोते हैं

घटनास्थल से नीरज आर्या की रिपोर्ट

घटनास्थल से नीरज आर्या की रिपोर्ट

Dec 08, 2019, 09:53 PM IST

नई दिल्ली. अनाज मंडी की जिस इमारत में रविवार को आग लगने से 43 जिंदगियां खाक हो गईं, उसके आसपास कई बिल्डिंगों में लोग खतरनाक हालात में काम कर रहे हैं। जहां आग लगी, उससे करीब 150 मीटर दूर ऐसी ही एक इमारत में भास्कर ने पड़ताल की। हालात से जाहिर था कि छोटा सा हादसा भी यहां बड़े नुकसान की वजह बन सकता है। इन फैक्ट्रियों में काम करने वालों में बच्चे भी शामिल हैं।

परिवार पालने के लिए जान का जोखिम भी उठाते हैं मजदूर
भास्कर ने जब इमारत में काम करने वालों से बातचीत की, तो पता चला कि ज्यादातर ऐसे लोग हैं, जिनकी शिक्षा न के बराबर है। जो भी काम मिलता है, वे आजीविका चलाने के लिए उसे करते हैं। इमारतों में चल रही फैक्ट्रियों में सुरक्षा मानकों का कोई ध्यान नहीं रखा गया है। हालात इस कदर खतरनाक हैं, हादसे की स्थिति में जान दांव पर लगना तय है। लेकिन, यहां काम करने वाले परिवार पालने के लिए यह जोखिम उठाते हैं। 

एक कमरे में 6 लोग काम करते हैं, वहीं रहते भी हैं
इमारत की पहली मंजिल पर जाने के लिए संकरी सीढ़ियां थीं और इनसे दो आदमी एकसाथ नहीं गुजर सकते। यहां दिन में भी अंधेरा था। दूसरी मंजिल पर पहुंचे तो एक छोटा सा कमरा था। जिसकी खिड़की से सुदान (22) सामने सड़क पर जुटी भीड़ को देख रहा था। सुदान बिहार के मधुबनी का रहने वाला है। उसने बताया कि इस कमरे में 6 लोग ज्वेलरी शॉप पर इस्तेमाल होने वाले बैग बनाते हैं और सभी इसी कमरे में रहते, खाते और सोते हैं।

रोजाना 15 घंटे काम, एक बैग बनाने पर 5 रु. मिलते हैं
सुदान ने कहा कि वह एक बच्चे का पिता है। 8 साल से दिल्ली में रहकर काम कर रहा है। एक कमरे की फैक्ट्री में सुबह 9 बजे से रात 12 बजे तक काम होता है। आलम नाम का व्यक्ति इन लोगों से काम करवाता है और हर बैग के लिए 5 रुपए मजदूरी देता है। एक मजदूर दिनभर में 70-80 बैग बना लेता है यानी रोजाना करीब 400 रु. की कमाई।

मधुबनी के ही रहने वाले सद्दाम हुसैन (20) ने कहा कि काम नहीं करेंगे तो क्या खाएंगे, परिवार कैसे चलेगा? सद्दाम के परिवार में पिता, एक बहन और 5 भाई हैं। सबसे छोटा सद्दाम 2 साल से दिल्ली में रहकर काम कर रहा है और कमाई का ज्यादातर हिस्सा घर भेज देता है।

घनी आबादी वाले इलाकों में एक कमरे वाली दर्जनों फैक्ट्रियां
इसके बाद हम तीसरी मंजिल पर गए। यहां भी एक कमरे के भीतर 8-10 मशीनें लगी थीं। सद्दाम और सुदान ने बताया कि रविवार होने की वजह से छुट्टी है। काम यहां भी उसी तरह से होता है, जैसा दूसरी मंजिल पर स्थित कमरे में होता है। हम छत की ओर बढ़े, लेकिन वहां दरवाजे पर ताला लगा था। नीचे लौटे तो एक व्यक्ति ने हमें इमारत से बाहर जाने को कहा और हमारे जाते ही गेट बंद कर लिया। बाहर लोगों से पूछताछ की तो पता चला की इस घनी आबादी में दर्जनों इमारतें ऐसी हैं, जहां एक-एक कमरों में फैक्ट्रियां चलाई जा रही हैं।

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