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परदे के पीछे:दिलीप कुमार एक अनभिव्यक्त कविता रहे; पिता अभिनय को भांडगिरी मानते थे, नहीं चाहते थे बेटा यूसुफ ऐसा करे

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: जयप्रकाश चौकसे
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भारत और पाकिस्तान में कुछ ऐसा रिश्ता बना दिया गया है कि एक की खुशी दूसरे के लिए गम का कारण बन जाती है। परंतु दिलीप कुमार के निधन से भारत में गम छाया हुआ है तो पाकिस्तान में भी यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार के जाने का अफसोस किया जा रहा है। अपनी लंबी अभिनय यात्रा में दिलीप कुमार ने लगभग 60 फिल्मों में ही अभिनय किया। वे हर काम करने से पहले उस पर बहुत समय तक विचार करते थे।

अमृतलाल नागर को फिल्मकार महेश कौल ने मुंबई आमंत्रित किया। वे एक दूसरे से लंबे समय से परिचित थे। महेश कौल संत कवि तुलसीदास की बायोपिक बनाना चाहते थे। कुछ महीनों तक बातचीत होती रही। अमृतलाल नागर ने महेश कौल से कहा कि वे पटकथा लिखने के लिए अपने घर लखनऊ जाना चाहते हैं। लेखक ने पटकथा लिखना प्रारंभ किया। महेश कौल की मृत्यु हो गई। उन्हें हृदय रोग था। अमृतलाल नागर ने ‘मानस का हंस’ नामक उपन्यास लिखा, जिसे पढ़ते समय ही लगता है कि मानो आप कोई पटकथा पढ़ रहे हों। उन दिनों गुणवंत लाल शाह फिल्म उद्योग में बहुत धन निवेश करते थे। उन्होंने ‘धरमवीर’ नामक फिल्म का निर्माण भी किया था। खाकसार ने उन्हें ‘मानस का हंस’ का संक्षिप्त विवरण दिया। गुणवंतलाल शाह इसे भव्य बजट की फिल्म बनाना चाहते थे। बनारस के घाट पर शूटिंग करना था।

भव्य बजट की फिल्म में लोकप्रिय सितारे का होना जरूरी था। बड़ी लागत निकालने के लिए सितारे की आवश्यकता थी। गुणवंत लाल शाह चार्टर्ड एकाउन्टेंट होने के साथ आयकर विशेषज्ञ भी थे। वे दिलीप कुमार के आयकर मामलों में सलाहकार थे। उन्होंने खाकसार की मुलाकात दिलीप कुमार से कराई। प्रतिदिन शाम 5 बजे खाकसार दिलीप कुमार को ‘मानस का हंस’ सुनाने जाता था। उस समय दिलीप साहब पतंग उड़ाते थे। उन्होंने छत पर बने एक कमरे में अहमदाबाद और अन्य स्थानों से बुलाई गई पतंगें रखी थीं। कांच के कई जार थे जिनमें डोर सूतने के मसाले रखे थे। दिलीप कुमार हाथ में दास्ताने पहनकर मांजा सूतते थे। मांजे में पिसा हुआ कांच होता था।

बहरहाल ‘मानस का हंस’ सुनकर वे इतने प्रभावित हुए कि लंदन जाकर विग बनवाकर लाए। मानस बायोपिक के लिए सैरस के नक्शे बनाए गए। दुर्भाग्यवश गुणवंत लाल शाह की मृत्यु मात्र 41 साल की उम्र में हो गई। दिलीप कुमार ने खाकसार से कहा कि अब मानस अभिनीत करना संभव नहीं होगा, क्योंकि गुणवंत लाल शाह की याद आती रहेगी।

दिलीप कुमार के साथ जयप्रकाश चौकसे।
दिलीप कुमार के साथ जयप्रकाश चौकसे।

दिलीप कुमार आदमकद आइने के सामने खड़े रहकर एक ही संवाद 10 बार बोलते और हर बार उनका अंदाज अलग होना था। पेशावर से दिलीप के पिता अपने बड़े परिवार को लेकर मुंबई के निकट देवलाली नामक स्थान पर बस गए और मेवे का व्यवसाय करने लगे।

युवा दिलीप कॉलेज की पढ़ाई के लिए प्रतिदिन मुंबई आते थे। उनकी 7 बहनें और एक भाई था। अतः परिवार के लिए वे कोई नौकरी की तलाश में थे। बॉम्बे टॉकीज की देविका रानी ने यूसुफ खान को दिलीप कुमार का नाम देकर फिल्म ‘ज्वारभाटा’ का निर्माण किया। एक दिन दिलीप के पिता ने अपने पुत्र की तस्वीर फिल्म पोस्टर में देखी। उन्हें सख्त अफसोस हुआ कि पठान युवा अभिनय कर रहा है। वे पेशावर में अपने पड़ोसी रहे पृथ्वीराज कपूर को ताना मारते कि पठान भांडगिरी कर रहा है। अब उनका पुत्र भी इस क्षेत्र में प्रवेश कर गया।

तत्कालीन कांग्रेस नेता अबुल कलाम आजाद मुंबई आए हुए थे। दिलीप के पिता अपने पुत्र के साथ उनसे मिलने गए। उन्होंने आजाद साहब को बताया कि उनके पुत्र यूसुफ को समझाएं कि पठान को भांडगिरी नहीं करना चाहिए।

आजाद साहब ने दिलीप से कहा कि जो भी काम करो, उसे इबादत समझकर करना। दिलीप साहब ने अभिनय को इबादत की तरह ही किया। इंडिया टुडे पत्रिका के साहित्य वार्षिकी अंक में जावेद अख्तर द्वारा दिलीप कुमार से लिया हुआ साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था। बात वर्षों पूर्व की है। एक बार दिलीप कुमार ने राजकपूर से कहा कि पंडित नेहरू मुंबई आ रहे हैं। एक सभा आयोजित की है। सही समय पर पहुंच जाना। बहरहाल, यथा समय कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। पंडित जी ने भाषण शुरू किया। उसी समय सभागृह का दरवाजा खुला और राजकपूर दौड़ते हुए आए। मंच के पास पहुंच कर राजकपूर ने कहा कि दिलीप अपने आप को मछलेवाल का बेटा समझता है।

एक दौर में मछलेवाल पेशावर का बड़ा गुंडा माना जाता था। राजकपूर त्रिवेंद्रम में शूटिंग कर रहे थे। बड़ी कठिनाई से सभागृह तक पहुंच गए। मंच के पास सीढ़ियों पर बैठे राजकपूर दौड़ने के कारण हांफ रहे थे। दिलीप कुमार ने लंबे समय तक त्रासदी फिल्मों में काम किया। इस कारण उन्हें नैराश्य ने घेर लिया। डॉक्टर ने परामर्श दिया कि अब उन्हें हास्य फिल्म में अभिनय करना चाहिए। अभिनय को प्रार्थना की तरह गंभीरता से लेने वाले दिलीप को नैराश्य से बाहर निकलने के लिए हास्य फिल्म करनी थी। इसलिए ‘राम और श्याम’ बनी। ‘आजाद’ और ‘कोहिनूर’ में उन्होंने तलवारबाजी की। ‘कोहिनूर’ के एक सीन में उन्हें वीणा बजानी थी। दिलीप ने बकायदा गुरु से वीणा बजाना सीखा। उनकी मनपसंद किताब एमेलिया ब्रान्टे द्वारा लिखी ‘वुदरिंग हाइट्स’ है, जिससे प्रेरित फिल्म ‘दिल लिया, दर्द दिया’ बनाई गई। इस फिल्म की शूटिंग मांडू में दो सप्ताह तक की गई।

विगत कुछ वर्षों से दिलीप कुमार की स्मृति चली गई थी। उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता था। कल्पना करें इस दौर में कोई उन्हें मधुबाला की तस्वीर दिखाए और मधुबाला की बात करे तो उनकी खोई हुई स्मृति कुछ क्षणों के लिए ही सही लौट सकती है। विगत समय से सायरा बानो उनकी सेवा करते हुए स्वयं बीमार पड़ गई हैं। बहरहाल दिलीप कुमार लंबे समय तक जीते हुए भी एक उस कविता की तरह रहे जो अधूरी ही रह गई।

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