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पत्नी-पति का मिलन सब कुछ नहीं:संतान के जन्म के लिए अनुशासन, संस्कार और तपस्या जरूरी, तभी होगी सुयोग्य

4 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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कहानी - ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना करना चाहते थे यानी मनुष्यों को जन्म देना था। ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र महर्षि अत्रि से कहा, 'अब ये दायित्व आपका है।'

ब्रह्मा जी बात सुनकर महर्षि अत्रि अपनी पत्नी अनसूया के साथ ऋष्य नाम के पर्वत पर तपस्या करने पहुंचे। ब्रह्मा जी ने अत्रि से कहा था कि आप संतान को जन्म दें, लेकिन इससे पहले अत्रि और अनसूया ने तपस्या करना शुरू कर दी। प्राणायाम से अपने मन को नियंत्रित करके घोर तप किया। वे प्रार्थना कर रहे थे कि इस जगत का जो भी ईश्वर है, मैं उनकी शरण में हूं। वे ईश्वर अपनी ही संतान या अपने जैसी संतान मुझे प्रदान करें।

तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी अत्रि मुनि के सामने प्रकट हुए। तीनों देवताओं ने कहा, 'अत्रि जी हम आपकी तपस्या से प्रसन्न हैं।'

अत्रि जी ने पूछा, 'आप लोग कौन हैं?'

तीनों देवताओं ने परिचय दिया तो अत्रि जी बोले, 'मैंने तो एक ही ईश्वर को याद किया था। आप तो तीनों चले आए हैं।'

देवताओं ने कहा, 'आपने इस संसार के जगदीश्वर को याद किया है, हम तीनों ही इस संसार का निर्माण, पालन और संहार करते हैं। इस वजह से हम तीनों को आना पड़ा।' तीनों ने आशीर्वाद दिया कि हम तीनों तुम्हारे यहां संतान के रूप में जन्म लेंगे।

अत्रि और अनसूया के यहां ब्रह्मा जी के अंश से चंद्रमा, विष्णु जी के अंश से दत्तात्रेय और शिव जी के अंश से दुर्वासा मुनि का जन्म हुआ।

सीख - संतान का जन्म होना सिर्फ पति-पत्नी के मिलन की घटना नहीं होनी चाहिए। पति-पत्नी को अनुशासन, संस्कार और तपस्या का भी ध्यान रखना चाहिए। इन सभी बातों का ध्यान रखने के बाद जो संतान पैदा होगी, वह सुयोग्य होगी।