इलेक्शन एनालिसिस / क्या प्रियंका की क्षमता पर कांग्रेस को भरोसा नहीं?



सुधीर चौधरी

सुधीर चौधरी

Jul 27, 2019, 11:36 PM IST

मोदी के बाद सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल यह है कि प्रियंका गांधी वाड्रा की एंट्री से कांग्रेस को यूपी में कितना फायदा होगा? कांग्रेस ने प्रियंका को महासचिव तो बनाया, लेकिन ज़िम्मेदारी सिर्फ आधे उत्तर प्रदेश की दी है। इससे यह साबित होता है कि खुद कांग्रेस नेतृत्व को ही प्रियंका गांधी वाड्रा की अखिल भारतीय क्षमताओं पर शक है।


प्रियंका का पहला असाइनमेंट मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है। 7.5 फीसदी वोटशेयर वाली कांग्रेस के लिए यूपी बंजर भूमि की तरह है। प्रियंका के सामने उजड़ी वोटों की फसल को फिर से हरा-भरा करने की चुनौती है। यूपी में ना तो कांग्रेस का काडर बचा है और ना राहुल गांधी का व्यक्तित्व कारगर है। यूपी में पिट चुके  गांधी परिवार के तरकश में आखिरी तीर प्रियंका गांधी ही थीं। यह चुनाव करो या मरो का है।


प्रियंका का व्यक्तित्व प्रभावशाली है। उनके अंदर लोगों से सीधे जुड़ने का हुनर है। उनकी संवाद शैली दादी इंदिरा गांधी की तरह है। राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के अलावा अभी एक भी चेहरा नहीं है। ऐसे में प्रियंका का नयापन वोटरों के लिए टीवी के नए सीरियल सा है। गांधी परिवार प्रियंका को राहुल गांधी से चार कदम पीछे भी रखना चाहता है। क्योंकि उसे कांग्रेस में सत्ता के दो केंद्र बनने का डर है। इसी कारण प्रियंका की देरी से एंट्री हुई है। प्रियंका पहले आतीं तो स्ट्राइक रेट और बेहतर होता।


गुजरात की कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में प्रियंका को चौथी पंक्ति में बैठाया गया। इस तस्वीर में बड़ा संदेश छिपा था। मेरा मानना है कि प्रियंका को यूपी जैसे मुश्किल राज्य में खपाने के बजाए अखिल भारतीय चेहरा बनाना चाहिए था। उनसे ऐसे राज्यों में प्रचार करवाना चाहिए, जहां उनके जादुई व्यक्तित्व से, पार्टी को जबरदस्त फायदा हो सके। राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में प्रियंका कांग्रेस की सीटें बढ़ा सकती थीं क्योंकि यहां का राजनैतिक माहौल उनकी स्वीकार्यता बढ़ाता है।


दक्षिण भारत में भी प्रियंका राहुल के मुकाबले ज्यादा भीड़ खींच सकती हैं। लेकिन कांग्रेस ने यूपी की 41 सीटों में प्रियंका को फंसा दिया है। पिछले 15 सालों से प्रियंका अमेठी और रायबरेली में राहुल और सोनिया गांधी का प्रचार कर रही हैं। लेकिन उनकी वजह से वोटों में बड़ी वृद्धि नहीं हुई।


पिछली बार राहुल गांधी की जीत का अंतर सिर्फ एक लाख सात हज़ार वोट था। रायबरेली में सोनिया गांधी का वोट प्रतिशत 2009 के 72.23% के मुकाबले 2014 में घटकर 63.79% पर आ गया था। यह प्रियंका के चुनाव प्रचार के बाद हुआ है। इस बार भी उनसे बड़े चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती। हां उनकी मौजूदगी से कांग्रेस को मीडिया में ज्यादा जगह मिल रही हैं। यानी जिस कांग्रेस की बात नहीं होती थी, वह खबरों में आ गई है।

 

प्रियंका के सामने दो और बड़ी समस्याएं हैं। पहली यह कि अखिलेश यादव और मायावती ने कांग्रेस को सपा-बसपा-रालोद गठबंधन में जगह नहीं दी है। इस गठबंधन और बीजेपी से, एक साथ लड़ना, कांग्रेस की ताकत से बाहर है। दूसरी समस्या यह है  कि उनके राजनीति प्रवेश के साथ ही पुलवामा और बालाकोट हो गया और उनका ठीक से प्रक्षेपण नहीं हो पाया। फिलहाल कांग्रेस ने प्रियंका को यूपी की मुश्किल जंग में  उतार तो  दिया है, लेकिन शस्त्रों की सप्लाई नहीं की।


राहुल की रैली-दौरे में पार्टी की मशीनरी पूरी ताकत लगाती है। लेकिन प्रियंका के दौरे में पार्टी पूरी ताकत नहीं झोंकती। ना मीडिया ना ही सोशल मीडिया पर उनका प्रचार होता है। प्रियंका अभी तक अलग टीम नहीं बना पाई हैं। इससे उन्हें नुकसान हो रहा है। प्रियंका की लॉन्चिंग के दिन राहुल गांधी ने इशारा किया था कि वो उन्हें यूपी की भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे हैं। इसका मतलब यह है कि पार्टी उन्हें यूपी तक सीमित रखना चाहती है ताकि वह लोकसभा के साथ 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का होमवर्क भी करें।


यह एक तरह से राजनीति का वीडियो गेम है जिसमें अलग-अलग एलिमिनेशन राउंड्स हैं और आखिरी राउंड की जीत के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी है। क्या प्रियंका यह राउंड पार कर पाएंगी? प्रियंका गांधी वाड्रा के पास एक विकल्प और भी है और वह है वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ना। वो भले ही जीत ना पाएं। लेकिन नरेंद्र मोदी को मुकाबले में उलझाकर जरूर रख सकती हैं। इस मुक़ाबले को इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक मुकाबला भी बना सकती हैं। राहुल गांधी यह नहीं कर पाए हैं।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जी न्यूज के एडिटर इन चीफ हैं। प्राइम टाइम शो डीएनए के लिए मशहूर हैं।)

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना