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  • Even If Someone In The Room Is Infected, You Can Survive For 8 Hours... Provided The Room Is Well Ventilated, Everyone Is Wearing A Mask.

शोध में दावा:अगर कमरे में कोई संक्रमित है तो भी आप 8 घंटे तक संक्रमण से बचे रह सकते हैं... बशर्ते वह कमरा हवादार हो, वहां सभी ने मास्क पहन रखा हो

2 महीने पहले
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इस उदाहरण से समझिए- जहां खिड़कियां बंद थीं, सिर्फ उसी हिस्से में डेढ़ घंटे तक बैठे 10 लोग संक्रमित पाए गए...बाकी सभी बच गए। - Dainik Bhaskar
इस उदाहरण से समझिए- जहां खिड़कियां बंद थीं, सिर्फ उसी हिस्से में डेढ़ घंटे तक बैठे 10 लोग संक्रमित पाए गए...बाकी सभी बच गए।
  • आज से कुछ राज्य अनलॉक हो रहे हैं, ऐसे समय में यह शोध नई उम्मीद जगाता है...

भारत में आज से कई राज्य अनलॉक होने जा रहे हैं। लोग कामधंधे पर लौटेंगे, जाहिर है अब ज्यादा सतर्कता जरूरी है। ऐसे में संक्रमण फैलने की वजहों पर किया गया यह शोध आपके काम का हो सकता है। इसे चीन और अमेरिका की दो घटनाओं से समझते हैं। पहली- 24 जनवरी 2020 को चीन के गुआंगझोउ में एक रेस्तरां में तीन परिवारों के 21 लोग पहुंचे।

उसी शाम एक व्यक्ति को बुखार हुआ। अगले दिन कोरोना पॉजिटिव आया और दो सप्ताह में 21 में से 10 संक्रमित हो गए। वीडियो फुटेज से पता चला कि लंच के दौरान इनका आपस में कोई संपर्क नहीं हुआ। दूसरी घटना- मार्च 2020 में वाॅशिंगटन के स्केगिट वैली में एक म्यूजिक ग्रुप की ढाई घंटे की बैठक हुई। इसमें 61 लोग थे। बाद में इनमें से 53 संक्रमित हो गए। यह इंडोर स्पेस पर पहली बार दर्ज ‘सुपरस्प्रेडिंग’ घटना थी।

सुपरस्प्रेडिंग की पहेली सुलझाने के दौरान अमेरिका और चीन के शोधकर्ताओं ने पाया कि 2020 के अंत तक दर्ज सुपरस्प्रेडिंग घटनाएं इंडोर स्पेस पर ही हुई हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह थी- पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं होना। ये घटनाएं बताती हैं कि महामारी के अगले चरण के प्रबंधन में दुनिया को वेंटिलेशन पर फोकस करना होगा, क्योंकि दुनिया अनलॉक हो चुकी है।

जुलाई 2020 में ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी की भौतिक विज्ञानी डॉ. लिडिया मोरावस्का ने 36 विशेषज्ञों का एक समूह बनाया। उनके शोध के नतीजे अब आए हैं। उनका दावा है कि जिस हॉल में प्राकृतिक या मेकेनिकल वेंटिलेशन हों, सोशल डिस्टेंसिंग हो और सभी ने मास्क पहना हो तो 8 घंटे तक वहां रहने पर भी संक्रमण नहीं फैलेगा।

कमरे में हवा कितनी सुरक्षित ऐसे जांचिए

डॉ. मोरावस्का का मानना है कि कमरे में कार्बन डाइऑक्साइड मीटर से हवा को जांचते रहना जरूरी है। बाहरी वातावरण में 400 पीपीएम कार्बन डाइऑक्साइड होती है। जबकि, दूसरी ओर स्वस्थ व्यक्ति जब सांस छोड़ता है तो उसमें 40,000 पीपीएम कार्बन डाइऑक्साइड होती है। यदि कमरे में पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं है तो कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ने लगता है।

एयर क्वाॅलिटी एक्सपर्ट का मानना है कि कमरे में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 500 पीपीएम से कम है तो समझ लीजिए कि वेंटिलेशन अच्छा है। 800 पीपीएम का मतलब है कि जो लोग सांस ले रहे हैं, वे 1% हवा ऐसी है, जो किसी के सांस से निकली है। 4,400 पीपीएम पर यह बढ़कर 10% हो जाती है। इसका मतलब है कि कमरा बेहद खतरनाक है। ऐसी स्थिति कम हवादार कमरों की होती है। कोरोना का जोखिम कम करने के लिए कमरे में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 700 पीपीएम से नीचे रखना बेहद जरूरी है।

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