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  • Every 6th Child Dies In India, 3500 Children Die Every Day, Most Of The Time Here

दुनिया में मरने वाला हर छठा बच्चा भारत का हर रोज 3500 बच्चों की मौत, सबसे ज्यादा यहीं

एक वर्ष पहले
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  • मुजफ्फरपुर में सैकड़ों बच्चों की मौत से लचर स्वास्थ्य व्यवस्था फिर चर्चा में
  • चीन की जनसंख्या ज्यादा, लेकिन भारत से 81% तक कम मरते हैं बच्चे

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक्यूट एंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) की वजह से अब तक 135 से ज्यादा बच्चों की मौत ने देश को हिलाकर रख दिया है। इतनी संख्या में बच्चों की मौत ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। बच्चों की मृत्यु के मामले में भारत की स्थिति हमेशा से ही खराब रही है। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि देश में 2017 में 14 वर्ष की उम्र तक के 12.63 लाख बच्चों की अलग-अलग कारणों से मौत हुई। यानी दुनिया में मरने वाले कुल बच्चों का 18.37 फीसदी।

 

जहां डायरिया और न्यूमोनिया बच्चों की मौत के सबसे बड़े कारण हैं, वहीं बिहार के घटनाक्रमों से चर्चा में आई एंसेफेलाइटिस पिछले चार दशक में 25 हजार से ज्यादा बच्चों की जान ले चुकी है। देश में एईएस का पहला मामला 1956 में मद्रास प्रेंसीडेंसी में सामने आया था। 1978 में यह बीमारी यूपी में फैली और 2005 में यह तब चर्चा में आई जब इसकी वजह से यूपी में करीब 1300 बच्चों की जान गई। 


देश में बच्चों की मृत्यु दर में पिछले कुछ दशकों में कमी आई है। लेकिन फिर भी आंकड़े बताते हैं कि 1953 से लगातार भारत इस मामले में सबसे आगे बना हुआ है। बच्चों की ज्यादा मौत के लिए जनसंख्या का तर्क भी निराधार है क्योंकि हमसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश चीन में 2017 में 5 से 14 वर्ष की उम्र के करीब 65 हजार और पांच वर्ष से कम उम्र के 1.7 लाख बच्चों की मौत हुई। यानी हमसे 81 फीसदी कम। इन डराने वाले आंकड़ों के पीछे कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था है जो बच्चों से लेकर बड़ों तक को प्रभावित करती है।

 

कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और बच्चों की मौत के पीछे तीन बड़े कारण

 

बजट की कमी, 10 सालों से स्वास्थ्य के लिए जीडीपी का 1.5% से भी कम मिल रहा है : देश के कुल बजट का करीब 1.2-1.3 फीसदी ही स्वास्थ्य के हिस्से में जाता है। स्वास्थ्य खर्चे की जीडीपी में हिस्सेदारी पिछले 10 सालों से 1.5 फीसदी से नीचे ही बनी हुई है। 2014-15 में तो यह एक फीसदी से भी कम (0.98%) थी। 2017-18 के लिए भी बजट इस्टीमेट जीडीपी का 1.28% ही रहा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने इसे बढ़ाकर 2.5% करने की बात कही है। इस बढ़त के बावजूद यह रक्षा बजट से 75 फीसदी कम ही होगा। अंतरिम बजट में सरकार ने रक्षा बजट जीडीपी का 10.6 फीसदी करने की बात कही थी। दूसरे देशों से तुलना करें तो अमेरिका स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का 18% और ब्रिटेन करीब 10% खर्च करता है। वहीं भारत सरकार द्वारा जारी नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के मुताबिक सरकार 2015-16 तक प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य पर औसतन 1112 रुपए खर्च करती आई है। इसे कई एक्सपर्ट नाकाफी मानते हैं। 

 

बीमा की कमी, महंगी दवाएं और इलाज, बाकी देशों की तुलना में 30% तक महंगी हैं दवाएं : देश में मरीजों को करीब 63% खर्च अपनी जेब से ही करना होता है। इसके पीछे बड़ा कारण स्वास्थ्य बीमा करवाने वालों की कम संख्या भी है। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 के मुताबिक 2016-17 में केवल 34 फीसदी लोगों का स्वास्थ्य बीमा था। सरकार ने 2017 में आयुष्मान भारत योजना शुरू की जो कि एक तरह की स्वास्थ्य बीमा योजना ही है। इसके तहत 50 करोड़ लोगों को फायदा देने की योजना है और 70 करोड़ लोग फिलहाल योजना सेे बाहर ही रहेंगे। वहीं दूसरी तरफ दवाओं की ज्यादा कीमतें भी समस्या है। सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट की हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत जैसे विकासशील देशों में जेनेरिक दवाओं की कीमतें बाकी देशों की तुलना में 20 से 30 गुना तक महंगी हैं। जरूरी टीके भी सभी बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2016 के अनुसार दो वर्ष तक के 38% बच्चों को बीसीजी, खसरा आदि के टीके नहीं लगे। 

 

डॉक्टरों की कमी, बिहार में 10 हजार लोगों पर केवल तीन डॉक्टर, होने चाहिए 10 : मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक 2017 के अंत तक देश में करीब 10 लाख रजिस्टर्ड एलोपैथिक डॉक्टर थे। इनमें से 8 लाख सक्रिय हैं। यानी लगभग 1300 लोगों पर एक डॉक्टर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। यानी संख्या के मामले में स्थिति ठीक ही है, लेकिन डॉक्टरों की उपलब्धता देशभर में समान नहीं है। उदाहरण के लिए ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में 10 हजार लोगों पर केवल 3 डॉक्टर हैं। जो डॉक्टर हैं भी उनमें योग्य डॉक्टरों की संख्या कम है। नेशनल सैंपल सर्वे 2016 के मुताबिक करीब 25% एलोपैथिक डॉक्टरों के पास आवश्यक योग्यता नहीं है। अस्पताल भी कम हैं। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2018 के अनुसार देश में 23,582 सरकारी अस्पताल हैं। यानी करीब 56 हजार लोगों पर एक सरकारी अस्पताल, जहां लोग सस्ते इलाज की उम्मीद में जाते हैं।

 

पिछले 15 सालों में इन पांच मामलों में लापरवाही ने ली मासूम बच्चों की जान

 

2017, गोरखपुर ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं थे, 60 बच्चों की मौत हुई  : गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी की वजह से करीब 60 बच्चों की मृत्यु हो गई थी। इनमें से ज्यादातर नवजात थे। ऐसा आरोप लगा था कि वेंडर को पैसे न देने की वजह से ऑक्सीजन सप्लाई नहीं हुई थी। 


क्या हुआ: अगस्त 2018 तक 9 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। इनमें से 5 लोगों को रिहा कर दिया गया है, जबकि बाकी जेल में हैं।

 

2014, बिहार दिमागी बुखार से 379 बच्चों ने गंवाई थी जान  : बिहार में पहले भी एंसेफेलाइटिस से बच्चों की मौत हो चुकी है। 2014 में 379 बच्चे महीनेभर के अंदर इस बीमारी से अपनी जान गंवा बैठे थे। इसी बीमारी से ही 2015 में 90, 2016 में 103, 2017 में 54 और 2018 में 33 बच्चों की मृत्यु हुई थी। 


क्या हुआ: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्ष वर्धन ने 100 बेड वाला अस्पताल बनाने की घोषणा की थी, जो अब तक शुरू नहीं हुआ।

 

2013, सारण मिड-डे मील में जहर, 23 बच्चों की जान गई : बिहार के सारण जिले में जुलाई 2013 में जहरीला खाना खाने से 23 बच्चों की जान चली गई थी। मिड-डे मील में दिए गए खाने में कीटनाशक पाए गए थे। कुल 48 बच्चे खाने से बीमार हुए थे। घटना के बाद देशभर में हंगामा हुआ।


क्या हुआ: हादसे के लिए जिम्मेदार स्कूल की प्रिंसिपल मीना कुमारी को 17 साल की जेल हुई। उसके पति को रिहा कर दिया गया।

 

2013, कोलकाता हॉस्पिटल में एक महीने में 122 बच्चों की मौत : अगस्त 2013 में कोलकाता के आस-पास के क्षेत्रों के कुल 890 बच्चे कोलकाता के बी. सी. रॉय चिल्ड्रन हॉस्पिटल में भर्ती किए गए, जिनमें से 122 की मौत हो गई। 2016 में भी अगस्त में ही 110 बच्चों की मौत हुई थी।


क्या हुआ : पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों की कमी के चलते बड़ी संख्या में बच्चे इस अस्पताल में पहुंचते हैं।

 

2004, कुंभकोणम स्कूल में जिंदा जल गए थे 94 बच्चे : तमिलनाडु के कुंभकोणम के 16 जुलाई 2004 को एक स्कूल में आग लग गई, जिससे 94 बच्चों की जलकर मौत हो गई। सरकार ने पीड़ितों को मुआवजा दिया, जिसे लेकर पीड़ितों ने अपने वकील पर घोटाले का आरोप लगाया।


क्या हुआ: स्कूल संस्थापक को उम्रकैद देने में 10 साल लगे। सुप्रीम कोर्ट ने घोटाला करने वाले वकील पर 50 लाख का जुर्माना लगाया।

 

मृत्यु और बीमारी भारत हर मामले में आगे
 

  • दुनिया में बच्चों की मृत्यु की संख्या
  •  58.46 लाख पांच वर्ष से कम
  •  10.29 लाख 5 से 14 वर्ष
  • 68.76 लाख  कुल मृत्यु

भारत में बच्चों की मृत्यु की संख्या

 

  • 10.92 लाख पांच वर्ष से कम
  • 10.92 लाख पांच वर्ष से कम
  • 1.70 लाख 5 से 14 वर्ष
  • 12.63 लाख  कुल मृत्यु

43.35 लाख नवजात बच्चों की मृत्यु हुई दुनियाभर में 2017 में

8.75 लाख नवजात बच्चों की मृत्यु हुई भारत में वर्ष 2017 में

 

यह संख्या हर साल कम हो रही है। 2016 की तुलना में 2018 में इस संख्या में 4 फीसदी की कमी दर्ज की गई। पिछले 10 सालों में करीब 60 फीसदी की गिरावट आई है।

20 प्रतिशत नवजात बच्चे भारत के थे, दुनिया में हुई नवजात बच्चों की मृत्यु में
 

बच्चों की मृत्यु के कारण: डायरिया और न्यूमोनिया सबसे बड़े हत्यारे

 

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  • भारत में इस स्थिति में पिछले 18 सालों में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। 
  • न्यूमोनिया और डायरिया से होने वाली मौतों में केवल 3 फीसदी की कमी आई है।
  • 194 देशों में से 135 देशों में किसी भी बच्चे की मृत्यु मलेरिया से नहीं हुई।

स्रोत: यूनिसेफ की फरवरी 2019 में अपडेट की गई रिपोर्ट। रिपोर्ट में सभी आंकड़े 2017 तक के हैं।

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