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नागपुर में कोरोना से हालात बेकाबू:बेड की तलाश में सड़कों पर मौत बनकर भटक रहे मरीज; सिविल सोसायटी और प्रशासन साथ आए, लेकिन कोशिश नाकाफी

नागपुर2 महीने पहलेलेखक: मनीषा भल्ला

महामारी के वक्त चुनावी राज्यों में भीड़ का असर अब दिखने लगा है। नतीजा, देश में पिछले 24 घंटे में ही करीब 2 लाख नए मरीज बढ़ गए। महाराष्ट्र में तो हालात पहले से ही खराब हैं। गुरुवार को राज्य में 61,695 नए मरीज मिले, जबकि 349 की मौत हो गई।

महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण का म्यूटेशन साबित हो गया है। पिछली बार की तुलना में यहां महामारी की गति काफी तेज है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने PM नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि राज्य में 30 अप्रैल तक एक्टिव केस 11.9 लाख हो सकते हैं। इसलिए मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत महीने के आखिर तक 2,000 मीट्रिक टन प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान है।

दैनिक भास्कर की टीम महाराष्ट्र में तेज संक्रमण की वजहों को समझने के लिए पिछले पांच दिनों से मुंबई, पुणे, नासिक, औरंगाबाद और नागपुर से ग्राउंड रिपोर्ट आप तक पहुंचा रही है। पेश है, कभी एशिया में सबसे ज्यादा अस्पतालों के लिए मशहूर रहे नागपुर शहर से दूसरी रिपोर्ट...

पति-पत्नी दोनों संक्रमित, बेड की तलाश में अस्पताल-अस्पताल भटक रहे

नागपुर मेडिकल कॉलेज के सामने आशा ठोकर अपने पति के साथ बैठी हैं। मैं भी (भास्कर रिपोर्टर) उनके पास जाकर बैठ गई। उनसे पूछा कि क्या हुआ है? कहने लगीं...मैं पॉजिटिव हूं, लेकिन मुझे एडमिट नहीं कर रहे हैं। आशा और उनके पति दोनों कोरोना संक्रमित हैं। पति पुलिस में हैं। वे शुगर और ब्लड-प्रेशर के भी मरीज हैं।

दोनों पति-पत्नी बीमार हालत में ही शहर में घूम-घूम कर बेड की तलाश कर रहे हैं। आशा रोते हुए कहती हैं, ‘सुबह से शाम हो गई है, लेकिन किसी भी अस्पताल में जगह नहीं मिल रही है।’ आशा की बात सुनकर धीरे-धीरे मेरे आसपास बैठे दूसरे लोग भी बोलने लगे, 'हम भी पॉजिटिव हैं..हम भी पॉजिटिव हैं..।' सभी को लोगों को लगा कि शायद बेड दिलवाने में हम उनकी मदद कर सकते हैं।

पति एक हफ्ते से अस्पताल में, नहीं दे रहे इंजेक्शन-दवाएं
नागपुर शहर की ही रहने वाली रेणु का तो रोना ही बंद नहीं हो रहा। वह हमें हाथ जोड़कर बोल रही हैं कि आप लोग मेरे पति को बचा लीजिए। वह बता रही हैं, 'सरकार ने इन्हें (अस्पताल वालों को) इंजेक्शन भेजे हैं, अपने-अपने लोगों को इंजेक्शन लगा रहे हैं, दवाएं दे रहे हैं। मेरे पति एक हफ्ते से अंदर एडमिट हैं, लेकिन उन्हें एक स्लाइन तक नहीं चढ़ाई गई है, मैं ही जाकर उन्हें खाना देती हूं, वह मर जाएंगे, मेरे पति को बचा लो।'

अस्पतालों में सुबह 6 बजे से ही लंबी कतारें, अब 3 दिन टेस्ट बंद
तीस लाख की आबादी वाले अस्पतालों के शहर नागपुर की सड़कों पर लोग अपनी-अपनी कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट लिए मौत बने घूम रहे हैं। हालात बेकाबू हैं। मेडिकल व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। अस्पतालों में एडमिट होने के लिए और मेडिकल लैब के टेस्ट के लिए सुबह 6 बजे से ही लंबी कतार लग रही है। लेकिन प्रशासन ने बोल दिया है कि तीन दिन तक अब टेस्ट नहीं किए जाएंगे। ऐसा लग रहा है कि यहां जिससे मिलो, वही कोरोना पॉजिटिव है।

कोरोना ने पिता की जान ले ली, एफडी तुड़वाकर बेटा संक्रमित मां के लिए बेड ढूंढ रहा
बेड की स्थिति यह है कि पांचपाओली पुलिस हेडक्वार्टर की एक बिल्डिंग में सिविल सोसाइटी द्वारा 78 बेड का अस्पताल चलाया जा रहा है। यहां बेड ढूंढ रहे स्वप्निल बताते हैं कि मैं अपनी 2 लाख रुपए की फ़िक्स डिपॉजिट (FD) तुड़वाकर अस्पताल में अपने पिता के लिए बेड लेने गया था, लेकिन मोहन भागवत को बेड मिल गया और हमें नहीं मिला।

बेड न मिलने से स्वप्निल के पिता की मौत हो चुकी है और मां घर में कोरोना से लड़ रही हैं। अब दो लाख रुपए हाथ में लिए स्वप्निल अपनी मां लिए बेड ढूंढ रहे हैं। नए अस्पताल खोलने के दावे करने वाले नागपुर में न तो ऑक्सीजन है और न वेंटिलेटर। RT-PCR टेस्ट करवाने के लिए सुबह छह बजे से लोग लाइन में लगे हैं, लेकिन टेस्ट चार दिन के लिए बंद हो चुके हैं।

हालात ऐसे कि सिविल सोसायटी के प्रयास भी कम पड़ रहे
म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर जमान-ए-इस्लामी संस्था अस्पताल चला रही है। डॉक्टर अनवर सिद्दीकी बताते हैं, '78 बेड का यह अस्पताल प्रशासन के साथ मिलकर पुलिस हेडक्वार्टर की बिल्डिंग में चलाया जा रहा है। कुछ स्टाफ नागपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के हैं तो कुछ संस्था का है।' डॉ. अनवर के मुताबिक प्रशासन के पास ऐसी तीन-चार बिल्डिंग और हैं जिसे हम चलाने के लिए तैयार हैं।

हमने अंदर तक इस कोविड आईसीयू में घूमकर देखा कि एक-एक मरीज को कैसे फौरन इलाज दिया जा रहा है। साफ-सफाई की भी मुस्तैद व्यवस्था है। समाज और प्रशासन के सहयोग की यह एक अच्छी पहल और मिसाल है। लेकिन नागपुर के हालात ऐसे हैं कि एक दिन में 7,000 तक नए मरीज आ रहे हैं, सो ऐसे प्रयास बहुत कम पड़ रहे हैं।

सिंधु युवा फोर्स के नौजवान पिछले एक महीने से प्लाज्मा डोनेट कर रहे हैं, ताकि जितना हो सके मरीजों को बचाया जा सके। जितेंद्र लाला बताते हैं कि हर दिन संस्था की ओर से 10-12 लोग प्लाज्मा डोनेट करने आ रहे हैं और आते रहेंगे।

ऑक्सीजन सिलेंडर भी सिविल सोसायटी की ओर से दिए जा रहे हैं। 5 हजार रुपए सिक्योरिटी रखकर घर-घर में सिलेंडर दिए जा रहे हैं। मरीजों से सिर्फ फिलिंग चार्ज लिए जा रहे हैं। जैसे ही उन्हें बेड मिल जाता है, वह सिलेंडर वापस करके अस्पताल में एडमिट हो जाते हैं।

अब अकेले प्रशासन के बूते की बात नहीं
नागपुर के मेयर दयाशंकर तिवारी खुद भी कोरोना पॉजिटिव हैं। वह बताते हैं कि बीते साल हमने 378 संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया था और हमारा दावा है कि बिना लोगों की मदद के हम अकेले इस काम को नहीं कर सकते हैं।
तिवारी के अनुसार नागपुर के हालात ऐसे हैं कि ऐसी और संस्थाओं को आगे आने की जरूरत है। नगरपालिका लगातार इन संस्थाओं को सहयोग कर रही है क्योंकि अब अकेले प्रशासन के बलबूते की बात नहीं रही।

दस बाई दस के कमरों में चल रहे अस्पताल
नागपुर में प्रशासन और डॉक्टर कोरोना से लड़ते-लड़ते थक गए हैं। नागपुर में हालात खराब होने की एक और वजह यह है कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के 400 किलोमीटर के इलाके के मरीज इलाज के लिए नागपुर में ही आते हैं। इसे मरीजों का किरकिस्तान भी कहते हैं।
नीति गौरव जैसे कॉम्प्लेक्स में केबिन में अस्पताल इस तरह से बने हैं जैसे दस बाई दस के कमरों में दुकानें चलती हैं। एक जमाने में यहां एशिया में सबसे ज्यादा अस्पताल थे, यहां के धंतौली इलाके में तो जहां देखो वहां अस्पताल का बोर्ड है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश से आने वाले लोग यहां टेस्ट करवाने आते हैं।
तीन-चार दिन में कोरोना की रिपोर्ट आती है और तब तक वह शहर में ही घूमते रहते हैं। वैसे भी यहां अस्पताल पंसारी की दुकान की तरह खुले हुए हैं जहां इतनी भीड़ है कि संक्रमण का फैलना आम बात है।

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