लाेकतंत्र का मंदिर / 83 लाख में बनी थी संसद की गोलाकार इमारत, प्राचीन चौसठ यौगिनी मंदिर से लिया गया इसका डिजाइन



Everything You Need To Know About Parliament of India Sansad in AR
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Everything You Need To Know About Parliament of India Sansad in AR

  • इस बार संसद में 17वीं लोकसभा गठित हो रही है
  • 1952 में अस्तित्व में आई थी पहली निर्वाचित संसद
     

Dainik Bhaskar

Sep 02, 2019, 03:43 PM IST

न्यूज डेस्क. देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा-एनडीए सरकार की ऐतिहासिक जीत के साथ इस बार संसद की 17वीं लोकसभा होगी। संसद भारत का सर्वोच्च संस्था है। इसका भवन 91 वर्ष पुराना है और इसकी संरचना पूर्णत: गोलाकार है। कहा जाता है कि इस इमारत के निर्माता ब्रिटिश वास्तुविद सर एडविन लुटियंस ने मध्य प्रदेश के मुरैना के पास स्थित प्राचीन चौसठ योगिनी मंदिर से इस भवन का डिजाइन अपनाया था। इस मंदिर को गुर्जर प्रतिहार वंश के राजाओं ने बनाया था और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मंदिर को प्राचीन ऐतिहसिक स्मारक घोषित किया है।
 

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भारतीय संसद से जुड़े 10 रोचक तथ्य

 

1. संसद की संरचना संसद भवन की इमारत की संरचना को को सर एडविन लुटियंस औरसर हर्बर्ट बेकर ने बनाया था।

2. 83 लाख में बना था संसद भवन संसद भवन की नींव की पहली ईंट 12फरवरी 1921 में रखी गयी थी, इसके निर्माण में 6 साल और 83 लाख रुपए का खर्च आया था

3. सबसे सस्ती कैंटीन संसद की कैंटीन में महज 12 रुपए मे मिलता है खाना।

4. सेंट्रल हॉल की महत्ता 14-15 अगस्त 1947 से पहले इसी हॉल से यूके से भारत में सत्ता का हस्तांतरण इसी हॉल में होता था।

5. संसद की लाइब्रेरी भी है खास संसद की लाइब्रेरी देश की दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी है, पहली नेशनल लाइब्रेरी कोलकाता में है।

6. देश का सुप्रीम कोर्ट पहले संसद के सेंट्रल हॉल में था। आजादी के बाद नयी सुप्रीम कोर्ट की बिल्डिंग बनने तक सेंट्रल हॉल में ही देश का सुप्रीम कोर्ट चलता था।

7. हाथ से लिखा संविधान सुरक्षित है यहां संसद की लाइब्रेरी में भारत के संविधान की हिंदी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी प्रतिलिपि यहां नाइट्रोजन गैस से भरे चैंबर में सुरक्षित रखा गया है।

8. संसदी भवन की गोलाकर संरचना निरंतरता की प्रतीक है, यह संरचना यह दर्शाती है यह सत्ता बनी रहेगी और कभी खत्म नहीं होगी।

9. संसद की पहली मंजिल पर खासतौर पर 144 खंभे बनाए गए हैं।  

10. संसद के दोनों सदन घोड़े के पैर की संरचना पर बने हैं। लोकसभा और राज्यसभा हॉल का आकार घोड़े के पैर के आकार का है। 

 

 

भारतीय संसद में दो सदन (राज्य सभा) एवं लोक सभा होते हैं। राज्य सभा राज्यों की परिषद होती है तो वहीं लोक सभा यानी लोगों का सदन। 
 

भारतीय संसद के तीन अंग राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा होते हैं। भारतीय संसद का संचालन नईदिल्ली स्थित संसद भवन से होता है। राष्ट्रपति के पास दोनों में से किसी भी सदन को बुलाने, स्थगित करने और लोकसभा को भंग करने की शक्ति होती है। लोकसभा में देश की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि होते हैं। इनकी संख्या 545 है। वहीं राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसमें सदस्यों की संख्या 250 है। राज्यसभा के सदस्य 6 सालों के लिए चुने जाते हैं। राज्यसभा के एक तिहाई सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष में सेवानिवृत्त हो जाते हैं।

 

राज्यसभा

राज्यसभा भारतीय लोकतंत्र की ऊपरी प्रतिनिधि सभा है। लोकसभा निचली प्रतिनिधि सभा है। राज्यसभा में 250 सदस्य होते हैं। जिनमे 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति के द्वारा नामांकित होते हैं। इन्हें 'नामित सदस्य' कहा जाता है। अन्य सदस्यों का चुनाव होता है। राज्यसभा में सदस्य 6 साल के लिए चुने जाते हैं, जिनमे एक-तिहाई सदस्य हर २ साल में सेवा-निवृत होते हैं।  भारत के उपराष्ट्रपति (वर्तमान में मोहम्मद हामिद अंसारी) राज्यसभा के सभापति होते हैं। राज्यसभा का पहला सत्र 13 मई 1952 को हुआ था। 


लोक सभा

लोक सभा, भारतीय संसद का निचला सदन है। भारतीय संसद का ऊपरी सदन राज्य सभा है। लोक सभा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर लोगों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों से गठित होती है। भारतीय संविधान के अनुसार सदन में सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 तक हो सकती है, जिसमें से 530 सदस्य विभिन्न राज्यों का और 20 सदस्य तक केन्द्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। सदन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने की स्थिति में भारत का राष्ट्रपति यदि चाहे तो आंग्ल-भारतीय समुदाय के दो प्रतिनिधियों को लोकसभा के लिए मनोनीत कर सकता है। लोकसभा की कार्यावधि 5 वर्ष है परंतु इसे समय से पूर्व भंग किया जा सकता है। प्रथम लोक सभा 1952 पहले आम चुनाव होने के बाद देश को अपनी पहली लोक सभा मिली। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 245 सीटों के साथ जीत हासिल करके सत्ता में पहुँची। इसके साथ ही जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने।


निर्वाचन

लोकसभा के सदस्य भारत के उन नागरिकों द्वारा चुने जाते हैं, जो कि वयस्क हो गये हैं। 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1989 के पूर्व उन नागरिकों को वयस्क माना जाता था, जो कि 21 वर्ष की आयु पूरी कर लेते थे, लेकिन इस संशोधन के द्वारा यह व्यवस्था कर दी गई कि 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाला नागरिक लोकसभा या राज्य विधानसभा के सदस्यों को चुनने के लिए वयस्क माना जाएगा। लोकसभा के सदस्यों का चुनाव वयस्क मतदान के आधार पर होता है। भारत में 1952 से लेकर अब तक की अवधि में 15 लोकसभा चुनाव हुए हैं। 15 लोकसभा चुनाव हुए हैं। 


अवधि

लोकसभा का गठन अपने प्रथम अधिवेशन की तिथि से पांच वर्ष के लिए होता है, लेकिन प्रधानमंत्री की सलाह पर लोकसभा का विघटन राष्ट्रपति द्वारा 5 वर्ष के पहले भी किया जा सकता है। प्रधानमंत्री की सलाह पर लोकसभा का विघटन जब कर दिया जाता है, तब लोकसभा का मध्यावधि चुनाव होता है, क्योंकि संविधान के अनुसार लोकसभा विघटन की स्थिति में 6 मास से अधिक नहीं रह सकती। ऐसा इसीलिए भी आवश्यक है, क्योंकि लोकसभा के दो बैठकों के बीच का समयान्तराल 6 मास से अधिक नहीं होना चाहिए। अब तक लोकसभा का उसके गठन के बाद 5 वर्ष के भीतर चार बार अर्थात् 1970 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर, 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चरण सिंह की सलाह पर, 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की सलाह पर, 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल की सलाह पर और 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर विघटन हुआ और इस प्रकार मध्यावधि चुनाव कराये गये।

 

संसद का कार्यक्रम और प्रक्रिया
संसदीय कार्य दो मुख्‍य शीर्षों में बांटा जा सकता है। सरकारी कार्य और गैर-सरकारी कार्य। सरकारी कार्य को फिर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है, ऐसे कार्य जिनकी शुरूआत सरकार द्वारा की जाती है, ऐसे कार्य जिनकी शुरूआत गैर-सरकारी सदस्‍यों द्वारा की जाती है परंतु जिन्‍हें सरकारी कार्य के समय में लिया जाता है जैसे प्रश्‍न, स्‍थगन प्रस्‍ताव, अविलंबनीय लोक महत्‍व के मामलों की ओर ध्‍यान दिलाना, विशेषाधिकार के प्रश्‍न, अविलंबनीय लोक महत्‍व के मामलों पर चर्चा, मंत्रिपरिषद में अविश्‍वास का प्रस्‍ताव, प्रश्‍नों के उत्तरों से उत्‍पन्‍न होने वाले मामलों पर आधे घंटे की चर्चाएं इत्‍यादि। गैर-सरकारी सदस्‍यों के कार्य, अर्थात विधेयकों और संकल्‍पों पर प्रत्‍येक शुक्रवार के दिन या किसी ऐसे दिन जो अध्‍यक्ष निर्धारित करे ढाई घंटे तक चर्चा की जाती है। सदन में किए जाने वाले विभिन्‍न कार्यों के लिए समय की सिफारिश सामान्‍यतः कार्य मंत्रणा समिति द्वारा की जाती है। प्राय: हर सप्‍ताह एक बैठक होती है। 


संसद में प्रश्‍न पूछना 

सरकार अपनी प्रत्‍येक भूल चूक के लिए संसद के प्रति और संसद के द्वारा लोगों के प्र‍ति उत्तरदायी होती है। सदन के सदस्‍य इस अधिकार का प्रयोग, अन्‍य बातों के साथ साथ, संसदीय प्रश्‍नों के माध्‍यम से करते हैं। संसद सदस्‍यों को लोक महत्‍व के मामलों पर सरकार के मंत्रियों से जानकारी प्राप्‍त करने के लिए पूछने का अधिकार होता है। जानकारी प्राप्‍त करना प्रत्‍येक गैर-सरकारी सदस्‍य का संसदीय अधिकार है। संसद सदस्‍य के लिए लोगों के प्रतिनिधि के रूप में यह आवश्‍यक होता है कि उसे अपनी जिम्‍मेदारियों के पालन के लिए सरकार के क्रियाकलापों के बारे में जानकारी हो। प्रश्‍न पूछने का मूल उद्देश्‍य लोक महत्‍व के किसी मामले पर जानकारी प्राप्‍त करना और तथ्‍य जानना है। दोनों सदनों में प्रत्‍येक बैठक के प्रारंभ में एक घंटे तक प्रश्‍न किए जाते हैं। और उनके उत्तर दिए जाते हैं। इसे ‘प्रश्‍नकाल’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्‍त, खोजी और अनुपूरक प्रश्‍न पूछने से मंत्रियों का भी परीक्षण होता है कि वे अपने विभागों के कार्यकरण को कितना समझते हैं। 

 

शून्‍यकाल (जीरो आवर)

संसद के दोनों सदनों में प्रश्‍नकाल के ठीक बाद का समय आमतौर पर ‘शून्‍यकाल’ अथवा जीरो आवर के नाम से जाना जाने लगा है। यह एक से अधिक अर्थों में शून्‍यकाल होता है। 12 बजे दोपहर का समय न तो मध्‍याह्न पूर्व का समय होता है और न ही मध्‍याह्न पश्‍चात का समय। ‘शून्‍यकाल’ 12 बजे प्रारंभ होने के कारण इस नाम से जाना जाता है इसे ‘आवर’ भी कहा गया क्‍योंकि पहले ‘शून्‍यकाल’ पूरे घंटे तक चलता था, अर्थात 1 बजे दिन में सदन का दिन के भोजन के लिए अवकाश होने तक। यह कोई नहीं कह सकता कि इस काल के दौरान कौन-सा मामला उठ खड़ा हो या सरकार पर किस तरह का आक्रमण कर दिया जाए। नियमों में ‘शून्‍यकाल’ का कहीं भी कोई उल्‍लेख नहीं है। 


संसद में बजट

सरकार को शासन, सुरक्षा और जन कल्‍याण के बहुत से काम करने होते हैं। इन सबके लिए बहुत साधन चाहिए। ये आएं कहाँ से? सरकार जनता से कर वसूलती है। जरूरत पड़ने पर कर्जे भी लेती है। क्‍योंकि हम संसदीय व्‍यवस्‍था में रहते हैं, सरकार के लिए यह जरूरी है कि कोई भी कर लगाने या कोई भी खर्चा करने से पहले वह संसद की मंजूरी ले। इस मंजूरी को लेने के लिए ही हर वर्ष सरकार एक बजट यानी पूरे साल की आमदनी और खर्चे का लेखा जोखा संसद में पेश करती है।

रेल बजट और सामान्‍य बजट अलग अलग पेश किए जाते हैं। सामान्‍य बजट प्रायः फरवरी के अंतिम कार्य दिवस पर लाया जाता है। रेल बजट उससे कुछ दिन पहले आ जाता है। वित्तीय वर्ष इस समय प्रत्‍येक साल की पहली अप्रैल से आरंभ होता है। बजट में इस आशय का प्रस्‍ताव होता है कि आने वाले साल के दौरान किस मद पर कितना धन खर्च किया जाना है। उसमें कितना धन किस तरीके से आएगा या कहाँ से जुटाया जाएगा। बजट के आगामी वर्ष के लिए अनुदान दिए जाते हैं। सरकार को अपनी वित्तीय और आर्थिक नीतियों तथा कार्यक्रमों और उनकी व्‍याख्‍या करने का अवसर मिलता है। साथ ही, संसद को उन पर विचार करने और उनकी आलोचना करने का भी अवसर मिलता है।


 

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