भास्कर ओपिनियनकिताबों की बात:फ़ेसबुक और वॉट्सएप के अलावा भी कुछ पढ़ लीजिए, कुछ सुन लीजिए

9 दिन पहले
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आज साहित्य की बात करते हैं। कहानियों की चर्चा करते हैं। कहानियाँ दरअसल लिखी या कही नहीं जातीं। ये घटती हैं। …और चैतन्य रूप से हमारे भीतर या बाहर जो कुछ घटता है, वही कहीं न कहीं, कभी न कभी, किसी न किसी कलम के ज़रिए कहानी का रूप लेती हैं।

वास्तव में, ज़िन्दगी के कई ऐसे पल होते हैं जो वक्त की कोख से जन्मते हैं और वक्त की कोख में ही गिर जाते हैं, कभी-कभी ये ही पल हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। हम सोचते हैं वक्त की ये क़ब्रें कैसे खुल गईं? और ये पल जीते-जागते क़ब्रों से कैसे निकल आए? यह क़यामत का दिन या रात तो नहीं? हम ऐसी घटनाओं को यादें भी कह सकते हैं। फिर ख़्याल आता है कि यादें अगर ज़िंदा होतीं तो उन्हें पास बैठाकर गपशप करते। हंसी-ठट्ठा करते! लेकिन यह कहाँ संभव है?

ख़ैर, हम जिस दौर में किताबी साहित्य की बात कर रहे हैं, उसमें किताबें पढ़ने का समय बहुत कम रह गया है। किताबें पढ़ने वाले लोग ही कम हो चले हैं। टेक्स्ट बुक से इतर कोई बात की जाए तो सचाई यह है कि अब तो फ़ेसबुक और वॉट्सएप पर ही सारी पढ़ाई हो जाती है। चूँकि पढ़ते यहाँ हैं, इसलिए लिखना-लिखाना भी पूरी तरह फ़ेसबुक और वॉट्सएप पर ही हो जाता है। अब हम पढ़ाकू या लिक्खाड नहीं, बल्कि फेसबुकिए या वॉट्सएपिए कहलाना ज़्यादा पसंद करने लगे हैं। जमाना ही ऐसा है, कोई करे तो क्या करे?

कई जाने- माने लेखक और साहित्यकार आज की युवा पीढ़ी को पढ़ने-लिखने की सलाह देते हैं। कहते हैं कि फ़ेसबुक और वॉट्सएप से हटकर कुछ किताबों में झांकिए। कुछ कहानियों से जूझिए। कुछ नहीं तो दादा-नाना के लिखे वे पुराने अंतर्देशीय पत्रों को पढ़ लीजिए। कुछ न मिले तो पुरानी, जिल्द फटी कॉपियों या कैलेण्डर के कोरे कोने में लिखे हुए दूध के हिसाब को ही पढ़ लीजिए। मगर रोज़ कुछ पढ़िए ज़रूर!

…और कुछ नहीं तो अपनी दादियों-नानियों से कुछ कहानियाँ, कुछ क़िस्से सुन लीजिए! लेकिन सुनिए ज़रूर। सुनना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इससे हमारे भीतर धैर्य का संचार होता है। हमारी सोच का दायरा बढ़ता है। उसको नया आयाम मिलता है।

… और इस वक्त जब दुनिया में होड़ मची है, आगे बढ़ने की। पीछे छोड़ने की, तब बहुत ज़रूरी है कि हम अपनी सोच को भी आगे बढ़ाएँ। हर स्तर पर। हर मौक़े पर। चाहे वह युद्ध की स्थिति हो, या गृह युद्ध की। पढ़ने-लिखने की स्थिति हो या पढ़ाने-लिखाने की। हर हाल में सोच ऊँची ही होनी चाहिए। …और यह सब पढ़ने से ही संभव हो सकता है।

यही वजह है कि तमाम बड़े लेखक, साहित्यकार युवा पीढ़ी को किताबें पढ़ने की सलाह दे रहे हैं। जैसे कहावत है कि मरे बिना स्वर्ग नहीं मिल सकता, वैसे ही कहा जा सकता है कि पढ़े बिना भीतर का ज्ञान मिलना संभव नहीं है। किताबें इसलिए ज़रूरी हैं,क्योंकि इनमें जो भावुकता, ख़्यालों की जो उड़ान आप महसूस कर सकते हैं वो वॉट्सएप या फ़ेसबुक पर पढ़ने या लिखने से कभी नहीं मिल सकती। कभी भी नहीं। इसलिए नहीं कि इन पर लिखा कुछ भी अच्छा नहीं होता, बल्कि इसलिए कि इन्हें पढ़ते वक्त चित्त में वो किताबों वाली गंभीरता नहीं आ पाती।