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किसान नेताओं में फूट:चंढूनी ने कक्का को RSS एजेंट बताया, कहा- मुझ पर जो आरोप लगे, वे किसान मोर्चा के नहीं हो सकते

नई दिल्ली3 महीने पहले
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किसान आंदोलन के दौरान पहली बार संयुक्त मोर्चा की बैठक में किसानों में फूट नजर आई। रविवार को मीटिंग में हरियाणा भाकियू के अध्यक्ष गुरनाम चंढूनी पर आंदोलन को राजनीति का अड्डा बनाने, कांग्रेस समेत राज नेताओं को बुलाने और दिल्ली में सक्रिय हरियाणा के एक कांग्रेस नेता से आंदोलन के नाम पर करीब 10 करोड़ रुपए लेने के गंभीर आरोप लगे। आरोप था कि वह कांग्रेसी टिकट के बदले हरियाणा सरकार को गिराने की डील भी कर रहे हैं।

चंढू़नी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने सोमवार को कहा, "जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे संयुक्त किसान मोर्चा के नहीं हो सकते, बल्कि किसी व्यक्ति विशेष के होंगे। ये शिवकुमार सिंह कक्का जी के आरोप हैं। कक्का खुद RSS के एजेंट हैं। वे लंबे समय तक RSS के राष्ट्रीय किसान संघ के प्रमुख रहे थे। वे फूट डालकर राज करने की कोशिश कर रहे हैं।"

संयुक्त मोर्चा ने कहा- कमेटी 3 दिन में रिपोर्ट देगी
सयुंक्त किसान मोर्चा ने सोमवार को कहा कि चंढूनी की तरफ से बुलाई गई राजनीतिक दलों की बैठक से मोर्चे का कोई लेना-देना नहीं। राजनीतिक दलों के साथ चंढूनी की गतिविधियों पर ध्यान देने के बाद रविवार को मोर्चे की मीटिंग में एक कमेटी बनाई गई जो 3 दिनों में रिपोर्ट देगी।

आंदोलन से जुड़े लोग NIA के सामने पेश नहीं होंगे
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) किसान आंदोलन में टेरर फंडिंग की जांच कर रही है। आंदोलन से जुड़े 50 से ज्यादा लोगों को समन भेजे गए हैं। इससे खफा किसान संगठनों ने कहा कि उनसे जुड़ा कोई नेता या कार्यकर्ता NIA के सामने पेश नहीं होगा।

मान बोले- किसानों की बात नहीं रख सकता तो कमेटी में रहने का हक नहीं
कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बनाई गई कमेटी से इस्तीफा दे चुके भूपिंदर सिंह मान ने जिस तरह कमेटी छोड़ी, उनके इस्तीफे को लेकर धमकियां मिलने समेत कई कयास लगाए जाने लगे। दैनिक भास्कर ने इस्तीफे की वजहों और किसान आंदोलन को लेकर उनकी राय जानी, पढ़ें बातचीत के मुख्य अंश-

सवाल: क्या आप पर कोई दबाव था?
जवाब: नहीं। न तो विदेशी संगठनों या संस्थाओं का और न ही सत्ता पक्ष का दबाव था। न ही मुझे किसी से धमकी मिली है, जैसी अफवाहें फैलाई जा रही हैं।

कमेटी से इस्तीफा देने का फैसला क्यों किया?
जब किसान कमेटी से बात नहीं करना चाहते, मैं इनकी आवाज रिपोर्ट में शामिल नहीं कर सकता तो सदस्य बने रहने का हक नहीं।

फैसला लेने में कोई दिक्कत?
मैंने 48 घंटे तक लगातार विचार किया कि क्या मैं किसानों की आवाज उठा पाऊंगा, तो अंतर्मन से आवाज आई कि यह संभव नहीं। मैंने चीफ जस्टिस से बात की और 15 मिनट में ही इस्तीफा दे दिया।

किसान आंदोलन को लेकर आपका क्या नजरिया है?
निजी हितों के लिए किसान सड़कों पर नहीं उतरता। किसानों की मांगें जायज हैं। केंद्र को संजीदगी से मांगों का हल निकालना चाहिए। मैं कानूनों के पक्ष में नहीं हूं।

किसानों की बड़ी दिक्कतें क्या हैं?
किसानों की आमदनी पर टैक्स की मार है। मौसम की मार भी झेलते हैं। फसलों के दाम जैसी समस्याओं पर केंद्र को काम करने की जरूरत है। मौजूदा नीतियों में ऐसा दिखता नहीं।

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