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स्टे एट होम डैड:चेतन भगत के नजरिए में पिता; मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी बच्चों को बढ़ते देखना नहीं, उन्हें ‘बड़ा’ करने में है

5 महीने पहले
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लॉकडाउन ने पिता की सख्त जिल्द को हटा दिया है। - Dainik Bhaskar
लॉकडाउन ने पिता की सख्त जिल्द को हटा दिया है।

मैं आईआईटी-आईआईएम से पढ़ा था। अच्छी नौकरी कर रहा था, जब मेरे दिल की आवाज ने दस्तक दी और मुझे अपने मन का काम यानी लेखन चुनने को कहा। 10-11 साल पहले मैंने स्टे एट होम डैड का विकल्प चुना तो परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्तों को हैरानी हुई। कुछ तो हंसे भी जरूर होंगे। मेरे 5 साल के जुड़वा बेटे भी पूछते थे कि मैं क्यों दूसरे बच्चों के पापा की तरह ऑफिस नहीं जाता। मैंने उन्हें बहलाया- क्या कभी सुपरमैन को ऑफिस जाते हुए देखा?

उन दिनों स्टे एट होम फादर का कॉनसेप्ट नहीं था। हालांकि मैं मानता हूं कि लेखन अपने आप में लॉकडाउन जैसा ही है, क्योंकि आप एक विचार या कहानी के इर्द-गिर्द रहते हैं। लोग सोचते थे कि आदमी घर पर बैठकर कैसे काम कर सकता है? लेकिन आज देखिए- वर्क फ्रॉम होम आसानी से अपना लिया गया है। कोविड ने इसे सामान्य बना दिया है।

कोरोना ने भले ही हमारी जिंदगी को चुनौतीपूर्ण बनाया, लेकिन अपनों के साथ वक्त गुजारने का मौका भी बहुत दिया। खासकर लॉकडाउन ने पिता को बच्चों के साथ वक्त गुजारने का, उनके आसपास रहने का और उनकी मासूम दुनिया में चहलकदमी करने का भरपूर वक्त दिया। जब बच्चे देखते हैं कि पिता ऑफिस का काम करते हुए घर संभालने में माँ की मदद कर रहे हैं तो उनके मन से माता-पिता की स्टीरियोटाइप भूमिकाएं धुलने लगती हैं।

इन दिनों में बच्चों ने महसूस किया होगा- पिता इतने सख्त भी नहीं जितना वो सोचते थे। ऑफिस के काम के तनाव और नौकरी जाने की बेचैनी को बच्चों ने भी महसूस किया। लॉकडाउन ने पिता की सख्त जिल्द को हटा दिया है। वो एक्सेल शीट्स के साथ घर मैनेज करने लगे हैं।

यकीन मानिए, बच्चों से बड़ा सुकून कुछ नहीं। मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी बच्चों को बढ़ते देखना नहीं, उन्हें ‘बड़ा’ करने में है। मैंने कई सफलतम लोगों से उनकी सबसे बड़ी खुशी के बारे में सवाल किया तो 10 में से 9 का एक ही जवाब था-उनका सबसे खुशनुमा पल वो था जब वो पिता बने। - जैसा उन्होंने प्रेरणा बी साहनी को बताया

बतौर पिता मेरे 3 गोल्डन रूल्स
1. बच्चों के लिए मिसाल बनें। उनमें बदलाव की मशाल खुद जलेगी।
2. भावनाओं को अभिव्यक्त करने से झिझकें नहीं। अपनों के बीच खुद को खुलकर जाहिर करें।
3. अपने माता-पिता का ख्याल रखें, क्योंकि आपके बच्चे उनके प्रति आपके व्यवहार से चुपचाप बहुत कुछ सीख लेते हैं।