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कांग्रेस छोड़ बने दूसरी पार्टी से CM:ममता से जगन और माणिक साहा तक, कहानी 8 मुख्यमंत्रियों की जो कभी पार्टी में साइड लाइन थे

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: अविनीश मिश्रा

त्रिपुरा में चुनाव से 8 महीने पहले भाजपा ने मुख्यमंत्री बदल दिया है। पार्टी ने 2016 में कांग्रेस से आए डॉ. माणिक साहा को राज्य का CM बनाया है। कांग्रेस छोड़कर मुख्यमंत्री बनने वाले साहा पहले शख्स नहीं हैं। साहा से पहले ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल), जगनमोहन रेडी (आंध्र प्रदेश), हिमंत बिस्वा सरमा (असम), एन.बीरेन सिंह (मणिपुर), नेफ्यू रियो (नगालैंड), एन. रंगास्वामी (पुडुचेरी) और पेमा खांडू (अरुणाचल प्रदेश) मुख्यमंत्री बन चुके हैं।

दिलचस्प बात है कि ये सभी एक वक्त में कांग्रेस में रहे हैं और पार्टी में साइड लाइन कर दिए गए थे। 8 में से 4 मुख्यमंत्री भाजपा से और दो भाजपा के समर्थन से बने हैं। आइए इन सभी की कहानी को विस्तार से जानते हैं...

1. ममता बनर्जी: 90 के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की बागडोर नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी की जोड़ी के पास आ गई थी। राजीव गांधी के समय यूथ कांग्रेस की महासचिव रहीं ममता बनर्जी लगातार हाईकमान के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक रही थीं। ममता पर शिकंजा कसने के लिए तत्कालीन बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष सोमनाथ मित्रा ने तैयारी कर ली। हालांकि, कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और कुछ साथियों के साथ 1998 में ममता ने पार्टी को अलविदा कह दिया।

तस्वीर नई दिल्ली के 10 जनपथ की है। बंगाल में तीसरी बार जीत हासिल करने के बाद ममता बनर्जी सोनिया गांधी से मिलने पहुंची थीं।
तस्वीर नई दिल्ली के 10 जनपथ की है। बंगाल में तीसरी बार जीत हासिल करने के बाद ममता बनर्जी सोनिया गांधी से मिलने पहुंची थीं।

ममता ने इसके बाद तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। तृणमूल का अर्थ है- जमीन से जुड़ा हुआ। ममता की पार्टी में कांग्रेस से नाराज कुछ नेता धीरे-धीरे जुड़ने लगे। 2011 में ममता बनर्जी बंगाल की 34 साल पुरानी लेफ्ट की सरकार को उखाड़ कर मुख्यमंत्री बनीं। ममता पहली बार 1984 में कद्दावर लेफ्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को जाधवपुर लोकसभा सीट से हराकर सुर्खियों में आई थीं।

2. जगनमोहन रेड्डी: 2009 से पहले जगनमोहन रेड्डी की पहचान कद्दावर कांग्रेसी नेता और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई. राजशेखर रेड्डी के बेटे कै तौर पर थी, जो पिता के लिए कैंपेन करते थे, मगर पिता की मृत्यु के बाद जगन पॉलिटिक्स में पूरी तरह एक्टिव हो गए। जगन ने पहले कांग्रेस हाईकमान से राज्य की बागडोर देने की गुहार लगाई, लेकिन सपोर्ट न मिलता देख खुद की पार्टी बना ली।

तस्वीर 4 सिंतबर 2009 की है, जब जगनमोहन रेड्डी के पिता के निधन पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हैदराबाद गईं थी।
तस्वीर 4 सिंतबर 2009 की है, जब जगनमोहन रेड्डी के पिता के निधन पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हैदराबाद गईं थी।

2014 से लेकर 2019 तक जगन आंध्र प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। 2019 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने भारी जीत हासिल की और पिता की मृत्यु के 10 साल बाद ही प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। 2012 में कांग्रेस की सरकार के वक्त भ्रष्टाचार के एक आरोप में जगन को CBI ने गिरफ्तार भी किया था। हालांकि, जगन की पार्टी के नेता इसे राजनीतिक बदला बताते रहे।

3. हिमंत बिस्वा सरमा: असम में तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हिमंत बिस्वा सरमा 2015 में भाजपा में शामिल हो गए। कांग्रेस छोड़ते वक्त उन्होंने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी से जब मिलने पहुंचे, तो उनकी बात सुनने के बजाय राहुल कुत्ते को बिस्किट खिला रहे थे। सरमा तरुण गोगोई की सरकार में मंत्री थे और खुद को मुख्यमंत्री के लिए प्रोजेक्ट करने की मांग कर रहे थे। कांग्रेस हाईकमान ने उनकी इस मांग को ठुकरा दिया।

असम कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के साथ हिमंत बिस्वा सरमा।
असम कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के साथ हिमंत बिस्वा सरमा।

भाजपा ने सरमा को असम चुनाव में संगठन की जिम्मेदारी सौंपी और इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य में 2017 में पहली बार भाजपा की सरकार बनी। 2017 में सरमा की बजाय पार्टी ने सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन 5 साल में ही सरमा ने जबरदस्त वापसी की। 2022 के चुनाव में भाजपा दूसरी बार असम की सत्ता पर काबिज हुई और हिमंत को मुख्यमंत्री बनाया गया। हिमंत अपने विवादित बयानों के कारण अक्सर सुर्खियों में रहते हैं।

4. नेफ्यू रियो: नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो भी 2002 से पहले कांग्रेसी थे, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री एससी जमीर से मतभेद होने के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। रियो लोकल पार्टी नगा पीपुल्स फ्रंट (NPF) में शामिल हो गए और 2003 में पहली बार मुख्यमंत्री बने। रियो 2008 और 2013 में भी मुख्यमंत्री बने। हालांकि, नेशनल पॉलिटिक्स में शिफ्ट होने की वजह से उन्होंने 2014 में मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया।

कभी कांग्रेस में रहे नेफ्यू रियो 2014 के बाद भाजपा के करीब आते गए। तस्वीर में प्रधानमंत्री मोदी के साथ रियो।
कभी कांग्रेस में रहे नेफ्यू रियो 2014 के बाद भाजपा के करीब आते गए। तस्वीर में प्रधानमंत्री मोदी के साथ रियो।

इधर, टीआर जेलियांग के नेतृत्व में NPF और भाजपा के बीच दरार पड़ने लगी, जिसके बाद रियो फिर एक्टिव हुए। 2018 में भाजपा के समर्थन से वे चौथी बार मुख्यमंत्री बनाए गए। रियो 1989 में नॉर्दन अंगामी सीट से पहली बार विधायक बने थे।

5. पेमा खांडू: वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने भी पॉलिटिकल करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। 2016 में वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2011 में पिता के निधन से खाली हुई सीट पर कांग्रेस के टिकट से उन्होंने जीत दर्ज की, जिसके बाद नबाम तुकी की सरकार में उन्हें जल संसाधन मंत्री बनाया गया।

2016 में 43 विधायकों के साथ खांडू भाजपा में शामिल हो गए थे।
2016 में 43 विधायकों के साथ खांडू भाजपा में शामिल हो गए थे।

जुलाई 2016 में पेमा के नेतृत्व में 43 विधायकों ने अलग समूह बनाने की घोषणा कर दी। सभी ने पीपुल्स पार्टी के बैनर तले नई सरकार बनाई। सितंबर 2016 में खांडू समेत सभी 43 विधायक भाजपा में शामिल हो गए। खांडू के नेतृत्व में भाजपा ने 2019 में भी जीत हासिल की।

6. एन. बीरेन सिंह: 2016 में भाजपा में शामिल होने के एक साल बाद ही मणिपुर के मुख्यमंत्री बनाए गए एन. बीरेन सिंह ने भी कांग्रेस से अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। बीरेन सिंह कांग्रेस की इबोबी सरकार में यूथ और फूड कंज्यूमर डिपार्टमेंट के मंत्री थे, लेकिन 2016 में शीर्ष नेतृत्व से नाराजगी के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी। वे खुद को ओकराम इबोबी की जगह मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे थे, जिसे कांग्रेस हाईकमान ने नहीं माना।

भाजपा ने ऑपरेशन नॉर्थ-ईस्ट के तहत एन, बीरेन सिंह को मणिपुर में पार्टी में शामिल कराया।
भाजपा ने ऑपरेशन नॉर्थ-ईस्ट के तहत एन, बीरेन सिंह को मणिपुर में पार्टी में शामिल कराया।

एन बीरेन ने फुटबॉल प्लेयर के तौर पर करियर की शुरुआत की थी। बाद में सीमा सुरक्षा बल (BSF) में शामिल हुए। उसके बाद पत्रकारिता की ओर रुख किया। एन बीरेन सिंह मणिपुर के हिंगांग सीट से 2002 में पहली बार चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे थे।

7. डॉ. माणिक शाह: पेशे से डेंटिस्ट डॉ. साहा सक्रिय राजनीति में आने से पहले त्रिपुरा मेडिकल कॉलेज में पढ़ाया करते थे। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। साहा कांग्रेस में रहने के दौरान त्रिपुरा क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। 2016 में भाजपा के ऑपरेशन नॉर्थ-ईस्ट के दौरान उन्हें पार्टी में शामिल कराया गया।

त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब के साथ नए मुख्यमंत्री माणिक साहा। तस्वीर त्रिपुरा राजभवन में शपथ ग्रहण के दौरान की है।
त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब के साथ नए मुख्यमंत्री माणिक साहा। तस्वीर त्रिपुरा राजभवन में शपथ ग्रहण के दौरान की है।

साहा को भाजपा ने त्रिपुरा चुनाव से पहले पन्ना प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके अलावा, उन्हें इलेक्शन इंचार्ज भी बनाया गया था। 2018 में त्रिपुरा में भाजपा ने पहली बार जीत हासिल की। 2020 में साहा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए और पिछ्ले महीने वे राज्यसभा के लिए भी मनोनीत हुए थे।

8. एन. रंगास्वामी: 71 वर्षीय एन. रंगास्वामी वर्तमान में केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी के मुख्यमंत्री हैं। रंगास्वामी ने भी कांग्रेस से पॉलिटिकल करियर की शुरुआत की थी। कांग्रेस ने उन्हें 2001 से लेकर 2008 तक पुडुचेरी का मुख्यमंत्री भी बनाया, लेकिन वी नारायणसामी के बढ़ते वर्चस्व के बाद 2011 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ खुद की ऑल इंडिया एन.आर कांग्रेस बना ली। इसी साल वे चुनाव जीतकर तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, हालांकि 2016 के चुनाव में उन्हें करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन.रंगास्वामी। तस्वीर 12 दिसंबर 2014 की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन.रंगास्वामी। तस्वीर 12 दिसंबर 2014 की है।

फिर अगले चुनाव, यानी 2021 में उन्होंने वापसी की और भाजपा की मदद से पुडुचेरी में चौथी बार मुख्यमंत्री बने। रंगास्वामी थाटनचावडी सीट से पहली बार 1991 में जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचे थे। ‌‌‌‌‌