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ग्लोबल वॉर्मिंग:गर्मी से दरक रहे ग्लेशियर, 100 करोड़ लोग खतरे में; वैश्विक तापमान के बढ़ने से सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र नदी घाटी क्षेत्र के 20.75 लाख वर्ग किमी पर असर

2 महीने पहले
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इंदौर, रुड़की, दिल्ली, अहमदाबाद और नेपाल के शोधकर्ताओं की स्टडी। - Dainik Bhaskar
इंदौर, रुड़की, दिल्ली, अहमदाबाद और नेपाल के शोधकर्ताओं की स्टडी।

हिमालय-काराकोरम पहाड़ों में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटी क्षेत्र में रह रही लगभग एक अरब आबादी का जीवन और आजीविका खतरे में है। ग्लेशियर के पिघलने से नदियां उफन रहीं हैं। इससे निचले इलाकों में बाढ़ की स्थिति बन रही है। वहीं, मौसम में बदलाव खेती, आजीविका के अन्य साधनों और जल बिजली क्षेत्र को प्रभावित करेगी। यह बात भारत और नेपाल के शोधकर्ताओं के अध्ययन में कही गई है।

अध्ययन इंदौर, रूड़की, दिल्ली, बेंगलुरू, अहमदाबाद और नेपाल के शोधकर्ताओं ने किया है। अध्ययन के अनुसार, हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में नदियों का जलस्तर बर्फ या ग्लेशियर का पिघलना, वर्षा और भूजल से प्रभावित होता है। हिमालय-काराकोरम क्षेत्र की आधी बर्फ हिमनदों में जमा है।

अलग-अलग मौसम में ग्लेशियरों के पिघलने की दर नदी में पानी के प्रवाह को प्रभावित करता है। आमतौर पर अप्रैल से जून तक गर्मियों में हिमालय-काराकोरम पहाड़ों से बर्फ पिघलने से प्रवाह हाेता है। फिर ग्लेशियर अक्टूबर तक पिघलते हैं।

सर्दियों में बर्फ जम जाती है। लेकिन वैश्विक तापमान हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में हिमनदों, हिमपात और वर्षा पैटर्न को प्रभावित कर रहा है। इसका असर नदी घाटी के निचले इलाकों में भी पड़ेगा। अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक विभिन्न मौसमों के दौरान ग्लेशियर के पिघलने से नदी में जलप्रवाह बढ़ेगा।

अध्ययन के अनुसार, इसका असर हिमालय-काराकोरम नदी घाटी के 20.75 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर पड़ेगा। इसमें 5.77 लाख वर्ग किमी का सिंचित क्षेत्र है। हिमालय-हिंदूकुश क्षेत्र में 50 हजार से अधिक ग्लेशियर हैं और जिनमें से केवल 30 का ही बारीकी से अवलोकन किया जा रहा है।

अब अप्रैल में ही पिघलने लगे हैं ग्लेशियर
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदौर में शोध के प्रमुख लेखक और सहायक प्रोफेसर फारूक आजम ने बताया कि स्टडी में पाया गया कि नदी के प्रवाह में बदलाव से सिंचाई के लिए जरूरी पानी की उपलब्धता के समय और मात्रा पर असर पड़ेगा। ग्लेशियर पहले जून में पिघलते थे, वे अब अप्रैल में ही पिघलने लगे हैं। यह बदलाव आजीविका और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा।

वैश्विक आबादी के 13% लोग रहते हैं इन इलाकों में, भारत, पाक, बांग्लादेश ज्यादा प्रभावित होंगे
स्टडी के अनुसार, हिमालय और कराकोरम पहाड़ों पर तापमान बढ़ने से बदलाव का असर भारत पर सबसे ज्यादा होगा। इसके अलावा दिल्ली, लाहौर, कराची, कोलकाता और ढाका महानगरों पर भी खासा असर पड़ेगा यहां प्रभावित व्यक्तियों की संख्या 2021 में वैश्विक आबादी का लगभग 13% या 8 लोगों में से एक है।

भारत में केेंद्रशासित जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उत्तरी हरियाणा, राजस्थान का कुछ हिस्सा सिंधु नदी बेसिन में आता है। उत्तराखंड, दिल्ली, दक्षिणी हरियाणा, यूपी, बिहार, झारखंड, प. बंगाल, राजस्थान और मप्र के बड़े हिस्से गंगा बेसिन में स्थित हैं। सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और अधिकांश असम, मेघालय, नगालैंड ब्रह्मपुत्र बेसिन में स्थित हैं।

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