छह वर्ष की उम्र में मां से सीखी थी मधुबनी पेंटिंग, आज हजारों महिलाओं के लिए पैसा कमाने का जरिया

4 वर्ष पहले
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  • 90 वर्ष की आयु में गोदावरी दत्त को इस साल मिला पद्मश्री अवॉर्ड 
  • गोदावरी की बनाई पेंटिंग पहली बार एक अमेरिकी ने 25 रुपए में खरीदी थी

आज मधुबनी पेंटिंग और मैं, एक सिक्के के दो पहलू हैं। इसके लिए मैंने घर-परिवार सब कुछ भुला दिया। अब तक 49 हजार लोगों को मधुबनी पेंटिंग में पारंगत कर चुकी हूं। आधा जीवन संघर्ष में बीत गया तब कहीं जाकर मेरी पहचान बनी है। पता नहीं था कि यह मुझे इतनी इज्जत और शोहरत दिलाएगी। 90 वर्ष की आयु में मुझे इस साल पद्मश्री अवॉर्ड मिला है। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी इतना बड़ा पुरस्कार भी मिलेगा। 

 

मेरा जन्म दरभंगा (बिहार) के बहादुरपुर गांव में 1930 में निम्न वर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ। पांच वर्ष की हुई तो मां सुभद्रादेवी को दीवारों पर कुछ बनाते देखती रहती थी। मैं पूछती थी कि आप क्या बनाती हो तो वे हंसकर टाल देती थीं। फिर एक दिन बोलीं कि बेटा यह मधुबनी आर्ट है। इसमें देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं। कोई भी शुभ काम इन चित्रों को बनाए बगैर संपन्न नहीं होते। मां को देख मेरा मन भी इसमें रमने लगा। वे उस जमाने की चर्चित चित्रकार थीं। मां ने इस कला की हर बारीकी मुझे सिखाई। चित्र बिकते थे तो पैसे आते थे और खर्च चलता था। उन दिनों (शादी के पहले) ए ग्रेड की पेंटिंग को 10 रुपए, बी को 7 और सी ग्रेड की पेंटिंग को 5 रुपए मिलते थे।

 

पहली बार मेरी पेंटिंग एक अमेरिकी ने 25 रुपए में खरीदी थी। पैसे आते देख मैं इस कला में रच-बस गई। होश संभाला ही था कि पिता रासबिहारी का साया सिर से उठ गया। मैं कक्षा 9वीं तक पढ़ी थी, जो उस वक्त बहुत पढ़ाई मानी जाती थी। मां ने खूब संघर्ष के साथ मुझे पाला और 16 बरस की उम्र में मेरा विवाह रांटी गांव के उपेंद्र दत्त से कर दिया। 

 

विवाह होने तक मैं चित्रकारी की कला में पारंगत हो चुकी थी। ससुराल आकर मेरी कला ठहर-सी गई। इस बीच मैं एक बेटे की मां बनी। मैं चित्रकारी करने के लिए छटपटाती रहती थी, लेकिन ससुराल में किसी को मेरा चित्र बनाना पसंद नहीं था। उस जमाने में घूंघट में रहने वाली महिलाएं दहलीज के बाहर नहीं निकल पाती थीं तो मैं बाहर जाकर चित्रकारी कैसे कर पाती? इस वजह से पति के साथ मेरे मतभेद और मनभेद बढ़ते चले गए। मतभेद इतने बढ़े कि मैं चार वर्ष के बेटे हेमचंद्र को लेकर पति से अलग हो गई और अपनी कला यात्रा फिर शुरू कर दी। पति इतने नाराज हो गए कि मुझे छोड़कर दिल्ली चले गए, दूसरी शादी कर ली और कभी नहीं लौटे।

 

लेकिन, मेरी कला को देखकर कुछ समय बाद ससुराल वालों का सपोर्ट मिलने लगा। ससुराल ने मुझे न सिर्फ साथ रखा बल्कि मेरी जरूरतों का भी ख्याल रखा। जो भी मेरी मधुबनी पेंटिंग्स देखता, तारीफ करता। मैं लोगों के घर जाकर कई मौकों पर इसे बनाती थी। मेरी पेंटिंग्स काफी पसंद की जाने लगी। लोग मनुहार करने लगे कि मैं उन्हें भी सिखाऊं। जितना आनंद मधुबनी पेंटिंग बनाने में आता था, उतना ही अन्य महिलाओं को सिखाने में आने लगा। इस कला पर जल्दी ही किसी का हाथ सेट नहीं होता, बारीकी सीखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

 

मेरी पेंटिंग्स के साथ ही मेरे सिखाने की चर्चा भी जगभर में फैलने लगी। बिहार में शिल्प के लिए राज्य सरकार ने 1973 में मुझे सम्मानित किया। जब नीलम संजीव रेड्‌डी प्रेसिडेंट बने तो उन्होंने भी मेरा सम्मान किया। अपने राज्य और देश में जो प्यार मिलने लगा, उससे मेरा जोश बढ़ता गया। समुद्र मंथन, त्रिशूल, कोहबर कृष्ण, डमरू, चक्र, बासुकीनाग, अर्द्धनारीश्वर और बोधि वृक्ष की पेंटिंग ने मुझे प्रसिद्धि दिलाई।

 

भारत की ओर से इस कला को जर्मनी, अमेरिका सहित दुनिया के 12 देशों में पहचान दिलाने के लिए मुझे चुना गया। इन विदेश यात्राओं में जापान में बना मधुबनी म्यूजियम सबसे खास है। टोकियो के हासिगावा ने अनुरोध किया कि मैं उनके म्यूजियम के लिए पेंटिंग बनाऊं। मैं छह महीने तक वहां एग्जीबिशन के लिए पेंटिंग बनाती रही।

 

इस काम का मुझे कोई पैसा नहीं मिला, लेकिन वहां की सरकार के पुरस्कार और लोगों के प्यार ने सारी कमी पूरी कर दी। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरू, मद्रास, हैदराबाद सहित तमाम शहरों में मेरी कला सराही गई। देश-विदेश में मेरे चित्रों की अनगिनत प्रदर्शनियां लग चुकीं हैं। पहली प्रदर्शनी जर्मनी में 1985 में 17 दिन की लगी थी। 1989 से 1995 के बीच सात बार मधुुबनी पेंटिंग के लिए जापान की यात्रा की। 

 

मधुबनी पेंटिंग के बारे में बताना चाहती हूं कि इसमें हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें, प्राकृतिक नजारे, सूर्य-चंद्रमा, पेड़-पौधे, धार्मिक और विवाह के दृश्य दिखाए जाते हैं। चित्रों में निखार लाने के लिए चटख रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। मिथिला क्षेत्र के कई गांवों की महिलाएं इस कला में दक्ष हैं। अपने असली रूप में तो ये पेंटिंग मिट्‌टी से लीपी गई झोपड़ियों पर देखने को मिलती थी। अब इसे कपड़े, पेपर या कैनवास पर बनाया जाता है। कागज पर मैंने पहली पेंटिंग 1971 में बनाई थी।

 

मेरी कला ने एक मुकाम हासिल कर लिया है। जिन लोगों को मैंने मधुबनी पंेटिंग्स बनाना सिखाया, उनके लिए रोजगार के नए दरवाजे खुलने लगे। शौक में सीखा एक हुनर मेरे द्वारा सिखाई हुई हजारों महिलाओं के लिए पैसा कमाने का जरिया बना हुआ है। मेरे हिसाब से सीखने की शुरुआत उस दिन से ही शुरू हो जाती है जब कोई सीखने की ठान लेता है। मैंने अपनी चारों पोतियों को भी मिथिला कला में निपुण कर दिया है। 
(जैसा उन्होंने नई दिल्ली के अमित मिश्रा को बताया।)

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