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'गुरु' का गोरखपुर, योगी का 'शहर':बाबा फरीद-कबीर-गुरुनानक के दिल में रहे गोरखनाथ, 1000 साल पहले जलाई धूनी, जिसके 'आशीर्वाद' से आदित्यनाथ बने यूपी CM

गोरखपुर5 महीने पहलेलेखक: दिनेश मिश्र

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधानसभा चुनाव, 2022 में गोरखपुर शहर से मैदान में हैं। इस ऐलान के साथ ही गोरखपुर और गोरक्ष पीठ चर्चा में है। गोरखनाथ मंदिर जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के अध्यात्म का केंद्र रहा और जिसने सियासी जमीन को सींचा भी। यही वह क्षेत्र है, जहां जड़ हो रहे समाज में अलख जगाने वाले गुरु गोरक्षनाथ ने बियाबान जंगल में अपनी धूनी रमाई थी। ऐसी धूनी जिसने हर तरह के पाखंड, कुरीतियों और सामाजिक भेदभाव को नकार दिया था। गुरु के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम गोरखपुर पड़ा। आइए-जानते हैं लोककथाओं और इतिहास के चंद पन्नों में मौजूद बाबा गोरखनाथ के बारे में वे बातें, जिसने पूर्वी यूपी के इस शहर को एक खास पहचान दी।

गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
गोरखनाथ मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

गोबर में लिया अवतार,12 साल वहीं रहे, मोहमाया में पड़े गुरु को जगाया
नाथपंथ के अनुयायियों को योगी कहा जाता है। कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ का जन्म गोबर में हुआ था, जिस वजह से उनका नाम गोरखनाथ पड़ा। इसके पीछे की कथा यह है कि एक बार गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने संतान की चाह रखने वाली एक महिला को जाै से बना हुआ प्रसाद खाने को दिया। जिसने प्रसाद को समाज के डर से पास ही गोबर के ढेर के पीछे फेंक दिया। 12 साल बाद जब मत्स्येंद्रनाथ वहां पहुंचे तो महिला ने डरते-डरते वह बात उन्हें बता दी। इस पर मत्स्येंद्रनाथ ने पुकारा तो 12 साल का एक तेजवान बालक गोबर के ढेर के पीछे से निकलकर सामने आ गया, जो गोरक्षनाथ बने। कहा जाता है कि गोरखनाथ स्त्री के मोहपाश में बंध चुके अपने गुरु मत्स्येंद्रनाथ को उबारा था। तभी से यह कहावत बन गई 'जाग मछंदर गोरख आया'।

नाथ पंथ के सभी गुरुओं और योगियों की प्रतिमाएं मंदिर परिसर में बनाई गई हैं, जो पूरे नाथ पंथ के व्यापक इतिहास को बयां करती हैं।-फोटो: राज मिश्रा
नाथ पंथ के सभी गुरुओं और योगियों की प्रतिमाएं मंदिर परिसर में बनाई गई हैं, जो पूरे नाथ पंथ के व्यापक इतिहास को बयां करती हैं।-फोटो: राज मिश्रा

कभी बाबा फरीद तो कभी गुरुनानक की वाणियों में नजर आए गोरखनाथ
गुरु गोरखनाथ किस दौर में थे, इस पर एक राय नहीं है। कोई उन्हें महाभारत काल का मानता है तो कोई कहता है कि वह आदि शंकराचार्य के बाद भारत के सबसे बड़े संत थे। नाथ पंथ में गोरखनाथ को शिव का अवतार भी माना जाता है। इतिहासकार भी बंटे हुए हैं। कोई उन्हें 9 वीं सदी का मानता है तो कोई उन्हें 11वीं सदी के शुरुआत का मानता है। हालांकि, मशहूर सूफी संत बाबा फरीद, दिल्ली सल्तनत को चुनौती देने वाले कबीर और सिखों के आदि गुरु गुरुनानक की वाणियों पर उनका प्रभाव झलकता है। कई रचनाओं में गोरखनाथ का जिक्र है।

बाबा गोरखनाथ की जलाई हुई धूनी आज भी जल रही है। सैकड़ों साल से इसे बुझने नहीं दिया गया। इसे आस्था का प्रतीक माना जाता है।
बाबा गोरखनाथ की जलाई हुई धूनी आज भी जल रही है। सैकड़ों साल से इसे बुझने नहीं दिया गया। इसे आस्था का प्रतीक माना जाता है।

ज्वाला देवी खिचड़ी बनाने की तैयारियों में लगीं तो साधना में लीन हो गए गोरखनाथ
लोककथाओं में कहा जाता है कि त्रेता युग में गुरु गोरक्षनाथ भिक्षा मांगते हुए हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के मशहूर ज्वाला देवी मंदिर गए तो वहां देवी ने प्रकट होकर गोरखनाथ को न्योता दिया। मगर, गोरखनाथ ने भिक्षा में प्राप्त चावल-दाल ही खाने की बात कही। इस पर देवी ने उन्हें भिक्षा में मिले अनाज को पकाने के लिए एक पात्र में पानी चढ़ा दिया।

मंदिर परिसर में लगने वाला मेला सामाजिक सदभाव का भी उदाहरण है। मंदिर परिसर में हिंदू और मुस्लिम दुकानें बड़ी संख्या में हैं।
मंदिर परिसर में लगने वाला मेला सामाजिक सदभाव का भी उदाहरण है। मंदिर परिसर में हिंदू और मुस्लिम दुकानें बड़ी संख्या में हैं।

गोरखनाथ भिक्षा मांगने निकले तो वे वहां से होते हुए गोरखपुर चले आए और यहीं एक जगह पर साधना में लीन हो गए। उस वक्त जो लोग गोरखनाथ को साधना में लीन देखते तो उनके पात्र में चावल-दाल डालने लगे। जब वह पात्र नहीं भर पाया तो इसे गुरु का चमत्कार मानकर लोग उनके अनुयायी बनने लगे। फिर तो यह सिलसिला ही शुरू हो गया। वहीं, ज्वाला देवी के मंदिर में आज भी गर्म पानी खौल रहा है।

हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर यहां बड़ा मेला लगता है। इस मौके पर गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा है। महीने भर तक यहां चहल पहल रहती है।
हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर यहां बड़ा मेला लगता है। इस मौके पर गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा है। महीने भर तक यहां चहल पहल रहती है।

राप्ती के किनारे घने जंगलों के बीच बनाया हठ साधना का केंद्र
राप्ती नदी के किनारे घने जंगलों के बीच की जगह को गुरु गोरखनाथ ने अपनी हठ साधना का केंद्र बनाया। यहीं आने वाले साधु-संत तब गोरक्षनाथ की कभी न बुझने वाली धूनी के इर्द-गिर्द जमे रहते और ईश्वर साधना में लीन रहते। की सैयद अहमद अलीशाह की लिखी 'महबूब-उत-तवारीख़' के मुताबिक, गोरखपुर पहले एक वीरान और शांत जंगल था, जहां बहुत से साधु-संत रहा करते थे। गुरु गोरखनाथ ने भी यहीं साधना की। अंग्रेज विद्वान जॉर्ज ग्रियर्सन ने भी इस बात को माना है, जिन्होंने गोरखनाथ और नाथपंथियों के साहित्य पर काफी कुछ लिखा है।

मंदिर परिसर में बनी इस इमारत में नाथ योगियों से संबंधित प्रतिमाएं और साहित्य रखा गया है।
मंदिर परिसर में बनी इस इमारत में नाथ योगियों से संबंधित प्रतिमाएं और साहित्य रखा गया है।

12 साल की कड़ी तपस्या के बाद बनते हैं संन्यासी, राजपद लेने की नहीं है परंपरा
नाथ संप्रदाय में किसी तरह के भेदभाव नहीं रहा है। किसी भी जाति, वर्ण व किसी भी उम्र का व्यक्ति इसे कभी अपना सकता है। नाथ संप्रदाय को अपनाने के बाद 12 साल तक की कड़ी तपस्या से गुजरने के बाद संन्यासी को दीक्षा दी जाती है, जिसे ताउम्र कठोर नियमों का पालन करना होता है।

योगी आदित्यनाथ बाबा गोरखनाथ की पूजा करते हुए। फाइल फोटो।
योगी आदित्यनाथ बाबा गोरखनाथ की पूजा करते हुए। फाइल फोटो।

दीक्षा के बाद संन्यासी को कोई राजपद ग्रहण नहीं करना चाहिए और न ही उसे राजघराने में भोजन की ही अनुमति है। नाथ योगियों की चिता नहीं जलाई जाती है। माना जाता है कि योग से उनका शरीर शुद्ध हो जाता है। ये योगी भस्म भी रमाते हैं।

जनश्रुतियों के मुताबिक, महाभारत काल में राजसूय यज्ञ का निमंत्रण देने युधिष्ठिर के छोटे भाई भीम आए थे। उस वक्त गोरखनाथ साधना में लीन थे। उन्होंने कुछ वक्त तक यहां आराम किया था।
जनश्रुतियों के मुताबिक, महाभारत काल में राजसूय यज्ञ का निमंत्रण देने युधिष्ठिर के छोटे भाई भीम आए थे। उस वक्त गोरखनाथ साधना में लीन थे। उन्होंने कुछ वक्त तक यहां आराम किया था।

भीम देने आए थे न्योता, प्यास लगी तो अंगूठा दबाकर बना दिया तालाब
गोरखनाथ के बारे में यह भी कहा जाता है कि महाभारत काल में राजसूय यज्ञ का निमंत्रण देने युधिष्ठिर के छोटे भाई भीम आए थे। उस वक्त गोरखनाथ साधना में लीन थे। भीम थके हुए थे और उन्हें प्यास भी लगी थी। ऐसे में उन्होंने अपना अंगूठा दबाकर ही यहां तालाब बना दिया था और पानी पीकर यहीं कुछ समय के लिए आराम किया था। मंदिर का सरोवर भीम की ही देन माना जाता है। इसी के बगल में भीम की लेटी प्रतिमा भी है।

कहते हैं इस तालाब को भीम ने अपने पैर के अंगूठे से बना दिया था।
कहते हैं इस तालाब को भीम ने अपने पैर के अंगूठे से बना दिया था।

...तो क्या कबीर, रविदास और गुरुनानक ने एक साथ किया था भोजन
लोक कहानियों में यह भी कहा जाता है कि बाबा गोरखनाथ हीकी तपोस्थली पर गुरुनानक देव भी आए थे। कहा तो यह भी जाता है कि एक बार अकाल के वक्त गोरखपुर के पास ही मगहर में कबीर धूनी पर स्थानीय लोगों ने एक भंडारे का आयोजन किया, जिसमें गुरु गोरखनाथ, कबीर, संत रविदास और गुरुनानक ने भी हिस्सा लिया था। हालांकि, यह एक जनश्रुति ही है क्योंकि तीनों संतों का दौर अलग था।

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