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राजस्थान के बांसवाड़ा से ग्राउंड रिपोर्ट:मछली से काेराेना की अफवाह; आदिवासी बोले- वायरस से बच जाएंगे, लेकिन मछलियां नहीं बिकीं तो भूख से मर जाएंगे

एक महीने पहले

राजस्थान के बांसवाड़ा में कुछ गांव ऐसे हैं, जहां लाेग काेराेना जैसी महामारी के बारे में कुछ नहीं जानते। ये गांव चाराें ओर से पानी से घिरे हुए हैं। दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड रिपोर्ट के लिए राजस्थान के आखिरी छाेर बांसवाड़ा से 40 किलोमीटर दूर छाेटी सरवन पंचायत समिति के चार गांवाें में पहुंची। माही के बैकवॉटर में बसे काेटड़ा पंचायत के इन गांवाें में जाने के लिए कभी पगडंडी ताे कभी नाव का सफर तय करना पड़ा।

टीम ने पहले पहाड़ाें में चार किलोमीटर पैदल सफर पूरा किया। आगे पता चला कि बस्तियाें में नहीं जा सकते, क्याेंकि चाराें ओर पानी भरा हुआ है। इसके बाद नाव से सफर काे आगे बढ़ाया। संक्रमण के खतरे के बीच टीम के रिपाेर्टर PPE किट सहित पूरी सुरक्षा के साथ नाव में डेढ़ किलोमीटर की यात्रा करते हुए पहुंचे।

पहले ताे हमें देख आदिवासी गांवाें के लाेग सहम से गए, लेकिन बाद में उन्हें समझाया ताे वे नजदीक आए और खुलकर अपनी समस्याएं रखीं। उन्हें काेराेना के बारे में बताया ताे बाेले- साहब! काेराेना से ताे बच जाएंगे पर लाॅकडाउन में भूख से मर जाएंगे। यहां मछली पकड़ना ही प्रमुख धंधा है। काेराेना फैलने की अफवाह से मछली बिकना बंद हाे गई है। राशन भी समय पर नहीं मिल रहा है। ऐसे हालात में कैसे गुजर-बसर करें।

न काेराेना के बारे में पता न कभी मास्क पहना
टीम जब पातीनगरा गांव में पहुंची ताे माही के बैकवॉटर में ककड़ी की खेती हो रही थी। ये लाेग ककड़ी काे मार्केट में बेचने के बजाय उसे सड़ाकर बीज निकाल रहे थे। किसान भीमसिंह निनामा ने बताया कि साहब, यहां काेराेना ताे कुछ नहीं है पर इसके कारण लगे लाॅकडाउन से बर्बाद हाे गए।

इतनी मेहनत की, ककड़ी, तरबूज, खरबूज उगाए, लेकिन लाॅकडाउन में खरीदार नहीं मिले। ऐसे में ककड़ी काे खेताें में ही सड़ाकर इसके बीज बना रहे हैं ताकि लागत ताे निकल सके। यहां काम कर रही गीतादेवी, शांति ने बताया कि वे काेराेना के बारे में नहीं जानतीं, कहीं बाहर जाने पर मास्क भी नहीं लगाती हैं।

लाॅकडाउन में ककड़ी, तरबूज, खरबूज के खरीदार नहीं मिले। ऐसे में ककड़ी काे खेताें में ही सड़ाकर इसके बीज बना रहे हैं ताकि लागत निकल सके।
लाॅकडाउन में ककड़ी, तरबूज, खरबूज के खरीदार नहीं मिले। ऐसे में ककड़ी काे खेताें में ही सड़ाकर इसके बीज बना रहे हैं ताकि लागत निकल सके।

अब तक नहीं आया काेराेना का केस, बाहरी व्यक्ति की एंट्री नहीं
भास्कर टीम बाद में टामटिया गांव पहुंची। इस गांव में करीब चालीस घर हैं जाे बिखरी बस्तियाें में हैं। गांव के गाैतमभाई, रूपाभाई व नानूभाई ने बताया कि पिछले साल से अब तक एक भी काेराेना का केस नहीं आया। वे बाेले, हमने ताे मास्क ही पहली बार लगाते देखा है। हम ताे यहीं मछली का काराेबार करते हैं, लेकिन मछली से काेराेना फैलने की अफवाह से मछली बिकना बंद हाे गई।

हम काेराेना से ताे नहीं मरे, लेकिन भूख से जरूर मर जाएंगे, क्याेंकि न समय पर राशन है, न काेई सुविधा। इस गांव में बाहरी व्यक्तियाें का प्रवेश वर्जित है। गांव के लाेगाें ने बताया कि न ताे यहां काेई सर्वे के लिए आया और न ही टीका लगाया क्याेंकि जब काेई बीमारी ही नहीं है, ताे टीका क्याें लगवाएं।

गेहूं आया-गेहूं आया सुन दाैड़ पड़ा गांव
कटूम्बी गांव में लाॅकडाउन से भुखमरी के हालात हैं। लाॅकडाउन की वजह से मजदूर घर लाैट आए हैं। मनरेगा भी बंद है। लाेग घराें में खाली बैठे हैं। घराें में खाने-पीने का प्रबंध भी नहीं बचा। गुरुवार सुबह जब गांव में यह सूचना मिली की आज राशन का गेहूं बंटेगा। यह पता लगते ही पूरा गांव गेहूं लेने उमड़ पड़ा।

यहां काेई साेशल डिस्टेसिंग नहीं थी और न ही मास्क लगा रखा था। लाेगाें से पूछा मास्क क्याें नहीं लगाया ताे बाेले-यहां जब काेराेना जैसा कुछ है ही नहीं ताे क्याें मास्क लगाएं? कई महिलाएं ताे काेराेना व वैक्सीन से भी बेखबर थीं।

कटूम्बी गांव में लाॅकडाउन से भुखमरी के हालात हैं। लोगों को पता चला कि राशन का गेहूं बंटेगा तो लोग दुकान पर लाइन लगाकर इंतजार करने लगे।
कटूम्बी गांव में लाॅकडाउन से भुखमरी के हालात हैं। लोगों को पता चला कि राशन का गेहूं बंटेगा तो लोग दुकान पर लाइन लगाकर इंतजार करने लगे।

न टीका, न सर्वे, गांवाें में काेराेना से अनजान
बैकवॉटर में बसी इन बस्तियाें में हैरान करने वाली बात यह है कि यहां अधिकांश लाेगाें काे काेराेना वैक्सीन नहीं लगी है। काेराेना काे लेकर काेई सर्वे भी नहीं हुआ। भास्कर टीम ने इन चार गांवाें के राेशन, शंकरू, माेहन सहित एक दर्जन लाेगाें से बातचीत की। ये लाेग काेराेना से अनजान नजर आए। जब मास्क के बारे में पूछा ताे बाेले-यहां ऐसी काेई बीमारी नहीं है। यहां एक फायदा जरूर यह है कि बिखरी बस्तियाें की वजह से संक्रमण फैलने का खतरा कम नजर आया।

बांसवाड़ा का ऐसा क्षेत्र, जहां सबसे कम संक्रमण दर
भास्कर टीम ने इस क्षेत्र का चयन इसलिए किया क्याेंकि यहां बांसवाड़ा जिले में काेराेना की सबसे कम संक्रमण दर है। ब्लाॅक CMHO गणेश मईड़ा बताते हैं कि छाेटी सरवन ब्लाॅक में अब तक एक भी माैत नहीं हुई है। इसकी वजह ब्लाॅक क्षेत्र में बड़ा बाजार नहीं है और छितरी बस्तियां हैं। मजदूरी से जुड़े लाेग ज्यादा हैं, जिनकी इम्युनिटी पावर ज्यादा है।

2,133 मछुआरों की आय का जरिया माही बैकवाॅटर
​​​​​​​बांसवाड़ा के माही बांध क्षेत्र के बैक वाॅटर में बड़े स्तर पर मछली पालन किया जाता है। यहां 18 समितियाें के 2,133 मछुआरे सदस्य हैं, जिनकी आय का जरिया यही है। यहां कतला, रऊ, नरेन मछलियाें की मुख्य प्रजातियां है। इसके अलावा लाची, सिंगाड़ा, संवल और तलेपिया प्रजाति की मछलियां भी पाई जाती हैं। यहां सरकार ने 0 रेवेन्यू माॅडल लागू कर रखा है, यानी बैकवाॅटर में सरकार काे काेई कमाई नहीं हाेती है। विभाग केवल एक दर तय कर टेंडर देता है। जिसके बाद जाे फर्म ठेका लेती है, वह मछुआरों काे तय कीमत के हिसाब से मछलियां खरीदने पर भुगतान करती है।

बांसवाड़ा की मछली दिल्ली, जयपुर, इंदाैर मंडी में सप्लाई की जाती है। फिलहाल मार्च में ठेका खत्म हाेने पर नया ठेका नहीं हुआ है। मत्स्य विभाग के डिप्टी डायरेक्टर अकील एहमद बताते है कि बांसवाड़ा में हर साल औसतन 250 से 300 टन मछली का उत्पादन होता है।

सूखे पेटे में गर्मियाें में बड़े पैमाने पर खेती
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माही बैकवाॅटर में गर्मियाें में पानी उतरने के साथ ही सूखे पेटे में किसान खेती करते हैं। इनमें से खीरा ककड़ी, खरबूज, तरबूज मुख्य रूप से हैं। पानी सूखने से यहां कई नए टापू उभर आते हैं, जिन पर किसान खेती करते हैं। यहां करीब 3 हजार से भी ज्यादा किसान इस सीजन की खेती करते हैं।

राजस्थान का ऐसा ब्लाॅक जहां काेराेना से एक भी माैत नहीं
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बांसवाड़ा का छाेटी सरवन ब्लाॅक ऐसा क्षेत्र है, जहां अब तक काेराेना का असर बेदह कम रहा है। यहां दूसरी लहर के बावजूद अब तक काेराेना से एक भी मौत नहीं हुई है। 1.25 लाख की आबादी वाले इस ब्लाॅक में अब तक महज 235 इतने लाेग ही काेराेना से संक्रमित हुए हैं। इनमें से कुछ प्रवासी भी थे।

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