ग्राउंड रिपोर्ट / कन्याकुमारी में बंदरगाह ही मुद्दा, त्रिची के आसपास नोटबंदी और जीएसटी हिसाब मांग सकते हैं

Dainik Bhaskar

Mar 20, 2019, 05:51 PM IST


Ground Report: Issue of Port in Kanyakumari
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Ground Report: Issue of Port in Kanyakumari
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अमित कुमार निरंजन, कन्याकुमारी/त्रिची. देश के अंतिम दक्षिणी छोर कन्याकुमारी से लगा हुआ है कोडछला बंदरगाह। दोपहर के एक बजे के आसपास बंदरगााह की भारी चहल-पहल के बीच मैथ्यू बेहद जल्दबाजी में अपनी नाव किनारे पर लगाकर लगभग दौड़ता हुआ मछली नीलामी केंद्र की ओर भागता है। जल्दबाजी की वजह पूछने पर बेहद गुस्से में बताता है कि अब मछलियां पकड़ने समंदर में काफी आगे तक जाना पड़ता है। पहले तीन घंटे लगते थे...अब पांच लगते हैं। बंदरगाह जो बना दिया है, मछलियां दूर गहरे पानी में चली गई हैं। मैथ्यू जैसे मछुआरों का यही गुस्सा यहां सबसे बड़ा मुद्दा है। तीस से ज्यादा गांवों के छोटे मछुआरे इस बंदरगाह का विरोध कर रहे हैं। 15 से 20% ये मछुआरे कन्याकुमारी का भविष्य बदलने का माद्दा रखते हैं।

 

पिछले चुनाव में डीएमके और कांग्रेस अलग-अलग थे

फ्रीलांस पत्रकार ठागुर थॉमस कहते हैं पिछले चुनाव में डीएमके और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इसलिए मछुआरों का वोट बंट गया और फायदा भाजपा को मिला और तमिलनाडु की यह सीट भाजपा के खाते में चली गई। इस बार डीएमके और कांग्रेस साथ हैं और बंदरगाह की नाराजगी मछुआरों को भाजपा के साथ जाने से रोक सकती है।

 

भाजपा दफ्तर में संगठन मंत्री कृष्णामर्थी ने मछुआरों के मुद्दे को स्वीकारते हुए कहा केन्द्र छोटे बंदरगाह बनाने पर विचार कर रहा है। कांग्रेस के जिला अध्यक्ष राधाकृष्णन ने कहा- मछुआरे लगातार हैलीपैड की मांग कर रहे हैं, ताकि आपात स्थिति में उन्हें बचाया जा सके, लेकिन देखिए कोई उनकी सुन ही नहीं रहा है। हम मछुआरों के मुद्दे पर ही लड़ेंगे।

 

यहां मुद्दे क्या हैं? : सवर्ण आरक्षण और नोटबंदी का असर पड़ेगा

नोटबंदी और सवर्ण आरक्षण बड़े मुद्दे होंगे। डीएमके ने इसके खिलाफ चेन्नई हाईकोर्ट में पिटीशन फाइल की थी। जिससे डीएमके के खिलाफ नाराजगी नाराजगी दिखती है। पर डीएमके ने यह फैसला करीब 80 प्रतिशत ओबीसी एसएसीएसटी आबादी को ध्यान में रखकर उठाया था।

  • जीत के समीकरण क्या कहते हैं

सीट: सिर्फ दो बार भाजपा के खाते में आई

2014 में मोदी लहर के बीच भाजपा के राधाकृष्णन कन्याकुमारी से सांसद चुने गए थे। 1.28 लाख के अंतर से जीते थे। 1999 में भी यह सीट (तब नगरकॉई) भाजपा के खाते में थी। कुल दो बार भाजपा को मिली यह सीट।

 

वोटर : निर्णायक साबित होंगे मछुआरे

40% हिन्दू और 45% क्रिश्चियन वोटर हैं। 5% मुस्लिम और अन्य 5% में अन्य धर्मोें के लोग हैं। क्रिश्चियन में एक चौथाई आबादी मछुआरों की है। यानी करीब डेढ़ से पौने दो लाख तक। यह जीत का गणित तय कर सकते हैं।

 

मुद्दे : सवर्ण आरक्षण बड़ा गेमचेंजर

यहां सर्जिकल स्ट्राइक असरदार नहीं दिखती। एयरस्ट्राइक की बात जरूर होती है। पर यह बड़ा फैक्टर नहीं है। ना ही राममंदिर यहां कभी मुद्दा रहा है। हां, सवर्ण आरक्षण गेमचेंजर हो सकता है। इसकी चर्चाएं भी खूब है।

 

रोचक रिकॉर्ड.... एक समय कांग्रेस का गढ़ थी यह सीट

2008 में परिसीमन के बाद कन्याकुमारी सीट बनी। इससे पहले यह नगरकॉई के नाम से जानी जाती थी। यहां से एन डेनिस छह बार सांसद रहे (1980,84,89,91 में कांग्रेस से और 96 और 98 के चुनाव में तमिल मनीला कांग्रेस से।) डेनिस के बाद यहां से कोई भी चेहरा लगातार नहीं जीता।

 

त्रिची और पास की सीटों पर नोटबंदी और जीएसटी का मुद्दा हावी

कन्याकुमारी से निकलकर हम त्रिचिल्लापल्ली (त्रिची) पहुंचे। यहां 40 डिग्री की गर्मी। कावेरी ब्रिज के किनारे खड़े मुथु से नारियल खरीदा। नारियल में पानी इतना कि एक सांस में न पीया जाए...पर अचानक यह क्या...? मुथु के ठीके पीछे तमिलनाडु की लाइफ लाइन कही जाने वाली कावेरी नदी बिल्कुल सूखी...। आखिरी छोर तक सिर्फ रेत। कर्नाटक और तमिलनाडु में टकराव की वजह बनी रही कावेरी का मुद्दा यहां हमेशा हरा रहता है। कावेरी ही है जो पैरम्बलूर और सेलम शहर की प्यास बुझाती है।

 

किसानों के लिए पानी सबसे बड़ा मुद्दा

इतना ही नहीं, तिरुचिरापल्ली, करूर, नामाक्कल और तंजावूर सीट पर पानी ही किसानों के लिए सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है। यहां करीब 40% वोट शहर और 60% वोट ग्रामीण इलाकों में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि  शहरी युवा का रुझान मोदी की ओर हो सकता है, लेकिन पानी न मिलने से नाराज किसान डीएमके-कांग्रेस गठबंधन की ओर शिफ्ट हो सकते हैं।

 

त्रिची सांसद पी कुमार (एआईएडीमके) ने बताया कि चुनाव विकास के मुद्दों पर लड़ा जाएगा। वहीं कांग्रेस के शहर अध्यक्ष जवाहर कहते हैं कि हम विकास के मुद्दों पर ही इन्हें घेरेंगे। त्रिची एयरपोर्ट और स्मार्ट सिटी जो प्रस्तावित थे...वे कहां हैं? पानी की कमी से किसानों को दिक्कत हुई...उसे कोई कैसे भूलेगा। फिर भी द हिन्दू के पूर्व पत्रकार वी गनापथी कहते हैं- लोग यहां चेहरे को देखकर वोट देते हैं। मुद्दे चुनाव के वक्त बहुत पीछे हो जाते हैं। करूर के स्मॉल स्केल डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष कनागसाबपाथी कहते हैं नोटबंदी और जीएसटी से कपड़े का धंधा प्रभावित हुआ है। इसलिए मोदी से नाराजगी दिखती है। असर चुनाव में दिखेगा।

 

मौजूदा गणित? : निर्मला सीतारमन यहां युवाओं में लोकप्रिय

अगर निर्मला सीतारमन जैसे बड़े नाम को त्रिचिल्लापल्ली से उतारा जाता है तो जीत की संभावना बढ़ जाती है। सीतारमन ने यहीं से पढ़ाई की है। युवाओं के बीच ज्यादा पॉपुलर हैं। वहीं डीएमके का कॉडर ग्रास रूट स्तर पर पिछली बार के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित है।

 

पिछली बार का नतीजा

छह सीटें तिरुचिरापल्ली, करूर, पैरम्बलूर, नामाक्कल, सेलम और तंजावूर एआईएडीएमके के पास हैं। अब चूंकि यहां भाजपा के साथ उसका गठबंधन है, इसलिए ये मिलकर लड़ेंगे।

 

जातियों का गणित

यहां ओबीसी वोटर ही डिसाइडिंग फैक्टर है। 70 से 75% वोट इन्हीं के हैं। इनके अलावा 15% वोट ब्राह्मणों और सवर्णों के हैं।

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