करतारपुर / रेडक्लिफ ने रावी नदी को ही सीमा माना, इसलिए दरबार साहिब पाकिस्तान में चला गया



Gurudwara Kartarpur Sahib's story before and after independence
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Gurudwara Kartarpur Sahib's story before and after independence

  • भारत-पाक के बीच विभाजन रेखा खींचने वाले ब्रिटिश वकील सिरिल रेडक्लिफ ने गुरदासपुर की शंकरगढ़ तहसील पाकिस्तान को दी, यहीं पर गुरुद्वारा है
  • आजादी के बाद से अब तक भारतीय यात्री वाघा बॉर्डर होते हुए ही करतारपुर जाते थे, 2000 से पहले इनकी संख्या बेहद कम होती थी
  • 90 के दशक में पाकिस्तान ने गुरुद्वारे का पुनर्निर्माण शुरू कराया, इसी के बाद श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 07:45 PM IST

नई दिल्ली. पंजाब में स्थित डेरा बाबा नानक को पाकिस्तान के दरबार साहिब करतारपुर से जोड़ने के लिए बनाए गए कॉरिडोर का रोजाना 5000 सिख श्रद्धालुओं को फायदा मिलेगा। वे बिना वीजा के पाकिस्तान जाकर दरबार साहिब के दर्शन कर सकेंगे। इसके पाकिस्तान के हिस्से में जाने की कहानी भी रोचक है। दैनिक भास्कर APP ने गुरुद्वारे के इतिहास को जानने के लिए करतारपुर रावी दर्शन अभिलाखी संस्था के जनरल सेक्रेटरी गुरिंदर सिंह बाजवा और भारत-पाकिस्तान मामलों के जानकार और लेखक त्रिदिवेश सिंह मैनी से बातचीत की।

 

गुरुदासपुर की तीन तहसीलें भारत के पास रहीं, करतारपुर वाली शंकरगढ़ तहसील पाकिस्तान को मिली 
मैनी ने बताया कि करतारपुर गुरुद्वारा पंजाब के गुरदासपुर जिले में आता था। आजादी से पहले गुरदासपुर में चार तहसील होती थीं। इनमें गुरदासपुर, बटाला, पठानकोट और शंकरगढ़ शामिल थीं। शंकरगढ़ तहसील में ही ये गुरुद्वारा है। वे बताते हैं कि भारत-पाक के बीच विभाजन रेखा खींचने की जिम्मेदारी ब्रिटिश वकील सिरिल रेडक्लिफ की थी और उन्होंने शंकरगढ़ तहसील पाकिस्तान को दे दी, जबकि बाकी की तीनों तहसील भारत का हिस्सा बनीं।

 

रावी नदी का नेचुरल फ्लो ही बॉर्डर बना
लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लैपियर की किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के मुताबिक, रेडक्लिफ को भारत-पाक के बीच विभाजन रेखा खींचने के लिए 2 महीने से भी कम का समय मिला था और उन्होंने भारत की भौगोलिक स्थिति के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। इसलिए, उन्होंने विभाजन रेखा खींचते समय रावी नदी के नेचुरल फ्लो को ही बॉर्डर बना दिया और रावी नदी के उस पार का हिस्सा पाकिस्तान और इस पार का हिस्सा भारत को दे दिया। क्योंकि, करतारपुर गुरुद्वारा रावी नदी के दूसरी तरफ था, लिहाजा यह हिस्सा पाकिस्तान को मिल गया।

 

करतारपुर से ही शुरू हुई थी सिखी, बांटकर खाने का संदेश भी यहीं से दिया गया 
मैनी के मुताबिक- सिखों के पहले गुरु नानकदेव जी 1522 में करतारपुर आए थे और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 17-18 साल यहीं बिताए। नानक साहब ने यहां खेती की। लंगर की शुरुआत भी यहीं से की। करतारपुर ही वह जगह है, जहां नानक जी ने समाधि ली थी। इस लिहाज से करतारपुर बहुत अहमियत रखता है।


गुरिंदर सिंह बाजवा बताते हैं, इसी गुरुद्वारे से सिखी शुरू हुई थी। गुरु नानक जी ने अपना ज्योति जोत चौला यहीं छोड़ा था। गुरु नानक ने नाम जपो, किरत करो और वंड छको' (नाम जपें, मेहनत करें और बांटकर खाएं) का संदेश भी यहीं से दिया था। इसी जगह उन्होंने भाई लहणा जी को गुरु गद्दी भी सौंपी थी, जिन्हें सिखों के दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाता है।

 

खंडहर में बदल रही थी गुरुद्वारे की इमारत, लोग यहां पशु बांध दिया करते थे
बाजवा बताते हैं, 1965 और 71 की जंग में इस गुरुद्वारे का काफी नुकसान हुआ। 90 के दशक तक तो इसकी इमारत बहुत खराब हो गई थी। लोग यहां पशु बांधते थे। लोग इसका इतिहास तक भूल गए थे। भारत से तो जिन्हें इसकी अहमियत पता थी, वे इक्का-दुक्का लोग ही यहां जाते थे। इन्हें भी वाघा बॉर्डर से ही जाना पड़ता था। क्योंकि गुरुदासपुर की सीमा पर तो बाउंड्री लगी होती थी और आने-जाने की मनाही थी। 1998 के बाद पाकिस्तान सरकार ने गुरुद्वारे पर ध्यान दिया और इसका पुनर्निमाण कराया। सालों तक काम चलता रहा। तब जाकर लोगों ने यहां फिर से आना शुरू किया।

 

2001 से करतारपुर कॉरिडोर की मांग तेज हुई
गुरिंदर कहते हैं, नवंबर 2000 में गुरु नानक साहिब के गुरुपर्व पर लाहौर में पाकिस्तान सरकार ने पहली बार कहा कि वह भारत के सिख श्रद्धालु के लिए एक कॉरिडोर पर काम करने को तैयार है। इस ऐलान के बाद सिख समितियों ने तेजी दिखाई। करतारपुर रावी दर्शन अभिलाखी संस्था के साथ-साथ विदेशों में रहने वाले सिखों ने भी भारत और पाकिस्तान की सरकारों से इस कॉरिडोर को जल्द से जल्द बनाने की मांग रखी। 17-18 साल की कोशिशों के बाद पिछले साल दोनों देशों की सरकारों की इस पर सहमति बनी। हालांकि 4-5 साल पहले ही पाकिस्तान ने यह मंशा जाहिर कर दी थी कि गुरु नानक के 550वें प्रकाश पर्व पर वे करतारपुर कॉरिडोर खोल देंगे।

 

2005 में पहली बार पाकिस्तान के गुरुद्वारे जाने वाले सिखों के जत्थे में करतारपुर साहिब शामिल हुआ
गुरिंदर बताते हैं, 2004 तक शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से श्रद्धालुओं का जो जत्था पाकिस्तान जाता था, उसमें गुरुद्वारा करतारपुर साहिब का नाम नहीं होता था। यह जत्था गुरुद्वारा पंजा साहिब, ननकाना साहिब, डेरा सच्चा सौदा (शेखुपुरा) जाता था। 2005 में पहली बार इस सूची में करतारपुर को शामिल कराया गया। तब से करतारपुर जाने वाले भारतीय यात्रियों की संख्या और ज्यादा बढ़ने लगी। 

 

26/11 आतंकी हमला नहीं होता तो 2008 में खुल जाता कॉरिडोर
गुरिंदर यह भी कहते हैं कि 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मसले पर बात आगे बढ़ाने का आश्वासन दिया था। 2008 में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी गलियारे की संभावना तलाशने डेरा साहब नानक आए थे। अगर मुंबई में 26/11 आतंकी हमला न होता तो शायद 2008 में ही इस कॉरिडोर के लिए काम शुरू हो जाता।

 

2000 से पहले : कभी करतारपुर को भारत में शामिल करने की कोशिश तो कभी कॉरिडोर शुरू करने की बात
आजादी के बाद अकाली दल ने 1948 में करतारपुर गुरुद्वारे को भारत में शामिल कराने की मांग रखी थी। 1959 तक यह मांग जारी रही, लेकिन तत्कालीन पंजाब सरकार ने ये मांग ठुकरा दी। इसके बाद 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गुरु नानक देव की 500वीं जयंती पर करतारपुर को भारत में शामिल कराने के लिए जमीन की अदला-बदली का वादा किया था। यानी करतारपुर भारत में शामिल हो और उसके बदले में पाकिस्तान को उतनी दूसरी जमीन दी जाए। लेकिन यहां भी बात नहीं बनी।

 

1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में करतारपुर कॉरिडोर बनाने पर चर्चा हुई। इसके अगले 1999 में वाजपेयी सरकार में दिल्ली से लाहौर तक 'दोस्ती बस सेवा' शुरू की गई। वाजपेयी खुद इस बस में सवार होकर लाहौर पहुंचे थे और उस समय के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से करतारपुर कॉरिडोर बनाने पर दोबारा चर्चा की। लेकिन ठीक इसके बाद करगिल युद्ध छिड़ने के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी।

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