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गुजरात / मानवाधिकार आयोग ने जीवित 10 महिलाओं को बना दिया सती, जबकि जिंदा हैं इनके पति भी

Human Rights Commission declared 10 women as Sati both women and husband alive
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Human Rights Commission declared 10 women as Sati both women and husband alive

  • वैधानिक रिपोर्ट में जानकारी शामिल किए जाने पर सामने आई गफलत

Jun 09, 2019, 09:54 AM IST

चिंतन आचार्य, गांधीनगर. सती प्रथा को लेकर गुजरात राज्य मानव अधिकार आयोग की एक बड़ी त्रुटि सामने आई है। आयोग ने 10 जिंदा महिलाओं को सती घोषित कर दिया जबकि ये महिलाएं और इनके पति दोनों जीवित हैं। चौंकाने वाली बात ये है आयोग साल 2011 से 2018 की अवधि में 10 महिलाओं को सती करार दिया। इस विवरण को आयोग की संवैधानिक रिपोर्ट में शामिल कर दिया। मतलब अब ये पहलू संवैधानिक रिपोर्ट का हिस्सा बन गया है।

 

बहरहाल, रिपोर्ट के अनुसार ये घटनाएं राज्य के मुख्य शहर अहमदाबाद के अलावा महेसाणा, भावनगर और बनासकांठा में दर्ज हुईं किसी को भनक तक लगी! वास्तविकता में ये केस घरेलू हिंसा-प्रताड़ना के हैं। ‘दिव्य भास्कर’ ने आयोग की इस गफलत को उजागर किया। आयोग ने भी स्वीकारा कि- त्रुटिवश ऐसा हो गया।

 

आयोग सालाना रिपोर्ट करवाता है तैयार

मानवाधिकार आयोग हर साल अपनी कार्यसूची और अन्य कामकाज की सालाना रिपोर्ट तैयार करके जारी करता है। इसे गुजरात विधानसभा के रिकॉर्ड पर रखा जाता है। ऐसी रिपोर्ट में आयोग संस्थान को मिली शिकायतों, स्वसंज्ञान के साथ की गई कार्रवाई सहित मामलों की वर्गीकृत जानकारी देता है। वर्गीकरण की इस प्रकिया में आयोग ने ‘सती’ के मामलों को कोड संख्या- ‘1300-02’ दी है।

 

1860 के दशक से प्रतिबंधित है ये प्रथा

राजा राम मोहन राय के जागरूकता अभियान के बाद साल 1861 में तत्कालीन अंग्रेस शासकों ने भारत में सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया था।

 

त्रुटि आखिर हुई कैसे

‘दिव्य भास्कर’ ने मानवा अधिकार आयोग के रिकॉर्ड नियमित करने की प्रक्रिया समझने का प्रयास किया। संयुक्त सचिव पी.एल. पंचाल ने बताया कि- राज्यभर में घटित और दर्ज होने वाले विविध मानवा अधिकार संबंधी मामलों की जानकारी संबंधित थानों से आयोग को मिलती है। तत्पश्चात इन मामलों का अध्ययन कर विविध श्रेणी में वर्गीकरण किया जाता है। केसों को वर्गीकृत करने का काम वर्ग-3 के कर्मचारी की जिम्मेदारी है। ऐसे कर्मचारी ने त्रुटिवश कुछ मामलों को सती प्रथा के कोष्टक में दर्ज कर दिया जबकि सच में ऐसा कुछ था ही नहीं।

 

वर्ग -3 के कर्मचारी की गफलत से ऐसा हुआ

सती प्रथा के मामलों को मानव अधिकार भंग संबंधी मामलों के कोष्टक में दर्ज किया जाता है। इसकी कोड संख्या है -‘1300-02’। बकौल, संयुक्त सचिव फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि अन्य श्रेणी के मामलों को सती प्रथा के रूप में क्यों वर्गीकृत किया गया। वर्ग-3 के कर्मचारी अथवा इस कार्य के लिए जिम्मेदारी व्यक्ति की समझ में भूल से संभव है ऐसा हो गया। राज्य मानवाधिकार आयोग की इस गफलत से आयोग के संयुक्त सचिव अनभिज्ञ से थे। ‘दिव्य भास्कर’ ने जब इस बिंदु पर जानकारी मांगी तो वह खुद चौंक गए। अपने स्तर पर रिपोर्ट तलब कर देखने के बाद विश्वास हुआ कि-आयोग ने बीते 10 साल में इतने मामले बतौर ‘सती प्रथा’ दर्ज किए हैं। संयुक्त सचिव ने भी स्वीकार किया के यह बहुत संवेदनशील मसला है।

 

सती प्रथा के केस कब और कहां

वर्ष स्थल संख्या
2011-2012 गांधीनगर 02
2014-2015 अहमदाबाद ग्रामीण (1) भावनगर(1) 02
2015-2016 अहमदाबाद शहर, ग्रामीण (3), महेसाणा-(1) 04
2017-2018 अहमदाबाद शहर (1) और बनासकंठा-(1)

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