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  • If The Vaccine Is Given To People Between 20 And 45 Years Of Age, Then Options Like Curb, Lockdown In Six Months Are Also No Longer Effective.

कोरोना पर नया दावा:एक्सपर्ट्स बोले- 20 से 45 साल की उम्र वालों को टीका लगाएं तो छह महीने में कोरोना पर अंकुश, लॉकडाउन अब प्रभावी नहीं

4 महीने पहले
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जाने-माने हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. देवी शेट्‌टी बोले- टीकाकरण में तेजी लाने पर ध्यान देना होगा। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar
जाने-माने हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. देवी शेट्‌टी बोले- टीकाकरण में तेजी लाने पर ध्यान देना होगा। (फाइल फोटो)

सालभर पहले देश में लॉकडाउन की हिमायत करने वाले डॉक्टर्स, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञों के दल में शामिल नारायणा हेल्थ के संस्थापक और कार्डियक सर्जन डॉ. देवी शेट्टी आज के हालात में दोबारा लॉकडाउन काे फिजूल करार देते हैं।

वे कहते हैं कि पहले लॉकडाउन से देश को बदतर हालात से बचा लिया गया, लेकिन अब उस विकल्प को फिर चुनने से कोई फायदा नहीं होगा। दूसरा लॉकडाउन कोई नई तैयारी का मौका लेकर नहीं आएगा और जब दोबारा लॉकडाउन खुलेगा तब वायरस हमला करने के लिए तैयार बैठा होगा। पेश है उनकी जुबानी...

संपूर्ण लॉकडाउन का जो फायदा मिलना था मिल चुका, दूसरा लॉकडाउन खत्म होगा तो वायरस फिर हमला कर देगा

आज हम गर्व से कह सकते हैं कि हम जरूरत से ज्यादा पीपीई, मास्क, वेंटिलेटर्स और वैक्सीन दुनियाभर में निर्यात कर रहे हैं। यदि हम युद्ध स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाएं, 20 से 45 वर्ष के लोगों को भी टीका दें तो अगले 6 माह में कोरोना पर बहुत हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। क्योंकि यही आयु वर्ग है, जो ज्यादा संक्रमण को फैला रहा है। राज्यों को भी लॉकडाउन या नाइट कर्फ्यू जैसे कदम उठाने के बजाए टीकाकरण बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

कोविड से निपटने मजबूत तंत्र और वैक्सीन विकसित करने के बाद लॉकडाउन जैसे कड़े कदम भारत की जलवायु से भी मेल नहीं खाते। यही कारण है कि मास्क के फायदों से 99% लोग वाकिफ होने के बावजूद घर से महज 44% लोग ही मास्क पहनते हैं, क्योंकि उमस और उससे होने वाली घुटन में मास्क पहनना मुश्किल हो जाता है।

हम न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से सोशल डिस्टेंसिंग में मुकाबला नहीं कर सकते। यहां एक किमी में औसतन 18 लोग रहते हैं, जबकि मुंबई के धारावी जैसे इलाकों के एक किमी में दो लाख लोग रह रहे हैं। दिल्ली के गांधीनगर में प्रति वर्ग किमी में करीब 89,185 लोग रहते हैं। यह ठीक है कि सक्रिय मरीजों की संख्या और उनके लिए अस्पताल में बेड की संख्या को लेकर दबाव आ सकता है।

लॉकडाउन से जो लाभ होना था, वह हो चुका है। अब देश की 130 करोड़ की आबादी को जल्द टीके लगाने की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा। विकसित देशों की सरकारें अपने नागरिकों पर लाखों-करोड़ डॉलर्स खर्च कर चुकी हैं। यहां के लोगों का एक बड़ा हिस्सा घर बैठे नौकरी कर सकता है, लेकिन भारत में यह सौभाग्य बहुत कम लोगों को उपलब्ध है।

देश में लोगों को रोजी-रोटी कमाना जरूरी है। अगर उनके सामने कोविड से मरने की संभावना और भूख से शर्तिया मरने के बीच किसी एक विकल्प को चुनना हो, तो सब जानते हैं कि वे कोविड के खतरे के बावजूद अपने काम को ही चुनेंगे। पिछले साल के आंकड़े के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि आने वाले कुछ हफ्तों में बेंगलुरु में जांच करवाने वाले लोगों में 24% पॉजिटिव पार कर जाएंगे।

ऐसी परिस्थिति में हमारे अपने अस्पताल में 500 कोविड मरीज होंगे। आने वाले समय में दो महीने तक लाखों की संख्या में लोग पूरे देश में अस्पताल में भर्ती होंगे। इससे सरकारों पर कुछ करने का दबाव पड़ेगा। लिहाजा, वे लॉकडाउन का विकल्प चुन सकती हैं। हर वह शख्स जो मुझे पढ़ रहा है, उनसे मेरा अनुरोध है कि वे दोबारा लॉकडाउन के विकल्प को न चुनें।

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