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नई दिल्ली / आईआईटी के इंजीनियर्स ने थ्रीडी प्रिंटर से बनाई मानव अंग जैसी हड्डी



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Dainik Bhaskar

Oct 14, 2018, 03:55 AM IST

पवन कुमार, नई दिल्ली. आईआईटी दिल्ली के इंजीनियर्स ने थ्रीडी बायोप्रिंटिंग तकनीक से विश्व में पहली बार कोशिकाओं की मदद से मानव अंग जैसी ही हड्डी और कार्टिलेज तैयार कर लिए हैं। अब इनके क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी चल रही है। अगर ट्रायल सफल रहता है तो लैब में तैयार इन अंगों का इस्तेमाल इंसानों पर किया जा सकता है।

 

दिल्ली आईआईटी के प्रोफेसर डॉ. सौरभ घोष ने बताया कि विश्व में पहली बार हड्डी को इस तरह से तैयार किया गया है, जैसे गर्भ में भ्रूण के विकास के दौरान हड्‌डी बनती है। इसके लिए हमने सेल्स (कोशिकाओं) की मदद ली और उसे लैब में उसी माहौल और तापमान में विकसित किया।

 

अभी तक की रिसर्च से यह स्पष्ट हुआ है कि सेल्स की मदद से जो हड्‌डी विकसित की गई है, उसकी प्रकृति भी इंसान की हड्‌डी जैसी ही है। हालांकि इस पर अभी और काम किया जाना बाकी है। इसके इम्प्लांट के बाद दवा के प्रभाव और दुष्प्रभाव पर भी काम होना है। लेकिन सफलता मिलने पर यह तकनीक स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा बदलाव साबित हो सकती है।

 

डॉ. घोष ने बताया कि थ्रीडी बॉयोप्रिंटिंग में लाइव ह्ययूमन सेल्स पर काम करना मुश्किल होता है क्योंकि प्रिंटिंग के दौरान हाई प्रेशर और तापमान की वजह से सेल्स के डेड होने का खतरा रहता है। लिहाजा सेल्स और सिल्क प्रोटीन को मिक्स करने की ऐसी खास तकनीक विकसित की गई ताकि प्रिंटिंग के दौरान या इसके बाद भी सेल्स जीवित रहें।

 

इतना ही नहीं सेल्स की बॉयोलॉजिकल प्रणाली में भी कोई बदलाव न आए, इस पर भी काम किया। इससे पहले स्किन और कार्टिलेज को भी यहां के इंजीनियर्स ने विकसित किया है, जिस पर अभी दवाओं  के असर का परीक्षण चल रहा है। 

 

सीटीस्कैन, एमआरआई से ज्यादा जानकारी थ्रीडी तकनीक से - थ्रीडी तकनीक की मदद से अभी तक करीब 400 सर्जरी और प्रोसिजर करने वाले सफदरजंग अस्पताल के यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख और रीनल ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ अनूप बताते हैं कि इस तकनीक ने न सिर्फ सर्जरी को आसान बना दिया बल्कि मरीज के लिए भी बेहद फायदेमंद साबित हुई है।

 

भारत में करीब-करीब सभी बड़े सेंटर पर इन्वेस्टिगेशन के लिए थ्रीडी तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। बड़े सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों में पेचीदा सर्जरी में मरीज के 80 फीसदी रेडियोलॉजिकल व अन्य जांच में थ्रीडी का इस्तेमाल हो रहा है।

 

सीटी स्कैन और एमआरआई से सिर्फ बीमारी अथवा शरीर के अंदर फैले ट्यमूर की लंबाई-चौड़ाई का पता लग पाता था लेकिन थ्रीडी से ट्यूमर की गहराई तक का पता लग जाता है। जरूरत पड़ने पर थ्रीडी का इस्तेमाल करके इसका एनिमेटेड वीडियो तक बन जाता है, जिससे सर्जरी और आसान हो गई।

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