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खेती ने बदल दी जिंदगी:20 साल में ग्रेवाल बंधु ने ऑस्ट्रेलिया में 3 हजार एकड़ जमीन खरीदी, पूरे देश में खुद ही घूम-घूमकर मार्केटिंग की

मेलबर्न5 महीने पहलेलेखक: अमित चौधरी
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ऑस्ट्रेलिया में किसानों ने फसल बेचने के लिए सोसायटी बनाई है। कॉर्पोरेट से सही दाम नहीं मिलता तो किसानों के पास भंडारण व्यवस्था है। - Dainik Bhaskar
ऑस्ट्रेलिया में किसानों ने फसल बेचने के लिए सोसायटी बनाई है। कॉर्पोरेट से सही दाम नहीं मिलता तो किसानों के पास भंडारण व्यवस्था है।

ग्रेवाल आटा, ग्रेवाल घी, ग्रेवाल दालें और न जाने कितने प्रोडक्ट्स... ये वो नाम हैं, जो ऑस्ट्रेलिया के घर-घर में जाने जाते हैं। 20 साल में 4 भाइयों की गिनती ऑस्ट्रेलिया के गिने-चुने अरबपति किसान कारोबारियों में होने लगी है। इस पर आज्ञाकार सिंह कहते हैं कि किसान के हाथ में यह ताकत है कि वो ‘फार्म से फोर्क’ तक खुद अपनी फसल की किस्मत तय कर सकता है। बशर्ते सरकार ईमानदारी से साथ दे। वे खुद बता रहे हैं अपनी कहानी...

20 एकड़ जमीन से शुरुआत की
उन्होंने बताया कि बात 1988 की है। लुधियाना के मनसूरां गांव में हम चार भाइयों के बीच 20 एकड़ जमीन थी। खेती से गुजारा नहीं चला, तो मैंने रेल फैक्ट्री में मैकेनिक का काम शुरू किया। छोटा भाई हरजस कमाई के लिए न्यूजीलैंड गया। फिर 1990 में मैं भी न्यूजीलैंड पहुंच गया। गुजारे के लिए टैक्सी चलाई, मजदूरी की, फैक्ट्री में काम किया। इस बीच बाकी दो भाई भी आ गए। काम ठीक चल रहा था, लेकिन मन में अपने पुश्तैनी काम खेती को लेकर कुछ कसक थी। 1997 में मामा की सलाह पर खेती में किस्मत आजमाने हम ऑस्ट्रेलिया पहुंच गए। बात नहीं बनी तो फिर न्यूजीलैंड लौट आए।

मेलबर्न से 500 किमी दूर जमीन खरीदी
उन्होंने बताया कि 2000 में फिर ऑस्ट्रेलिया पहुंचे और 18 एकड़ जमीन खरीदी। अंगूर की खेती शुरू की। साल भर बाद अच्छा मुनाफा मिला। मुनाफा बढ़ा, तो मेलबर्न से 500 किमी दूर मिलदूरा में 3000 एकड़ जमीन खरीदी। गेहूं की खेती शुरू की। उन दिनों ऑस्ट्रेलिया में भारत से आटा आयात पर रोक थी। इसलिए हमने अपना आटा बेचने के लिए स्टोन रोलिंग मिल की मशीनें खरीदीं।

उन्होंने बताया कि जैसे ही काम शुरू किया कि सरकार ने आटे के आयात से बैन हटा दिया। आटा तैयार था, लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं। लिहाजा पूरे देश में दुकानदारों के पास अपना आटा लेकर पहुंचे। अब हालत यह है कि हम 365 दिन, हर घंटे एक टन आटा बना रहे हैं। इसके अलावा चीन को अंगूर का निर्यात कर रहे हैं।

4 बेटियां भी खेती करती हैं
उन्होंने बताया कि मेलबर्न से 40 किमी दूर किंगलेक में 220 एकड़ जमीन में ब्लू बेरी, रेड बेरी की खेती शुरू की है। कुल मिलाकर हमारी सफलता का राज यह है कि पूरा परिवार एकजुट है। मेरी 4 बेटियां भी खेती करती हैं। हम खुद अपनी फसल को प्रोसेस करते हैं। इसे बेचने के लिए बाजार तलाशते हैं।

क्या अंतर है भारत और ऑस्ट्रेलिया की खेती में

  • बकौल आज्ञाकार सिंह ऑस्ट्रेलिया में सरकार फसल नहीं खरीदती। यहां MSP भी नहीं है। पर सरकार किसानों को प्रशिक्षण देती है। सही कीमत दिलाती है। फसल तबाह हुई तो मुआवजा खाते में आ जाता है।
  • ऑस्ट्रेलिया में किसानों ने फसल बेचने के लिए सोसायटी बनाई है। कॉर्पोरेट से सही दाम नहीं मिलता तो किसानों के पास भंडारण व्यवस्था है। इसी तरह भारत में किसान एकजुट होकर फसल उगा सकते हैं। बाजार की मांग के मुताबिक फसल प्रोसेस कर सीधे ग्राहक तक पहुंचा सकते हैं।