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जनता का विद्रोह / सत्याग्रह और स्वदेशी आंदोलनों में लाेगों की भागीदारी के आगे झुके अंग्रेज



3 मार्च 1939 को गांधीजी राजकोट में अनशन पर बैठ गए। इसके बाद पूरे देश में हड़ताल शुरू हो गई। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा। 3 मार्च 1939 को गांधीजी राजकोट में अनशन पर बैठ गए। इसके बाद पूरे देश में हड़ताल शुरू हो गई। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा।
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3 मार्च 1939 को गांधीजी राजकोट में अनशन पर बैठ गए। इसके बाद पूरे देश में हड़ताल शुरू हो गई। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा।3 मार्च 1939 को गांधीजी राजकोट में अनशन पर बैठ गए। इसके बाद पूरे देश में हड़ताल शुरू हो गई। अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा।

  • राजकोट रियासत के करों से कराह उठी जनता, हुआ सत्याग्रह का आगाज
  • एक चिंगारी ने सभी रियासतों में जला दी आजादी की मशाल

Dainik Bhaskar

Aug 24, 2019, 04:36 PM IST

गुजरात में राजकोट एक छोटी-सी रियासत थी, लेकिन अंग्रेजों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। पश्चिम भारत की सारी रियासतों पर नजर रखने के लिए अंग्रेजी हुकूमत अपनी एजेंसी राजकोट से ही चलाती थी। राजकोट रियासत के राजा लखाजी राज ने 1930 तक 20 साल अच्छे से राज किया था और आजादी की गतिविधियों को राजकोट में समर्थन दिया था। 1939 में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र धर्मेंद्र सिंह का राज चला, जो आनंद और वासना में फंस चुके थे। ताकत उनके दीवान वीरावल के हाथों में थी, जिसने धर्मेंद्र पर कभी रोकटोक नहीं लगाई। लिहाजा, रियासत की सपंत्ति इतनी तेजी से घटी कि माचिस, चावल, चीनी तथा सिनेमा का लाइसेंस बेचना पड़ा। सामान महंगे होते गए और जनता में आक्रोश बढ़ता गया। 


ऐसे में आंदोलन शुरू हो गए। पहल राजकोट कॉटन मिल की लेबर यूनियन ने की। 1936 में 800 कर्मियों ने 21 दिन की हड़ताल शुरू की। दरबार को इनके आगे झुकना पड़ा। इसके बाद आंदोलन के नेता जेठालाल जोशी ने 1937 में काठियावाड़ राजकीय परिषद की मीटिंग बुलाई, जो 8 साल बाद की गई थी। इसमें 15 हजार लोग आए और मांग की कि सरकार करों में कटौती करे। दरबार ने इस मांग को अनसुना कर दिया। लिहाजा 15 अगस्त 1938 को परिषद के कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया, जिन्हें रियासत और अंग्रेजों की पुलिस ने बेरहमी से पीटा। जवाब में फिर हड़ताल की गई। इस बार नेतृत्व सरदार पटेल ने किया। हड़ताल ने सत्याग्रह का रूप लिया। मालगुजारी और रियासत के बनाए सामान जैसे बिजली और कपड़े का बहिष्कार किया गया। 


नवंबर 1938 का अंत आते-आते अंग्रेजी हुकूमत को यह डर सताने लगा था कि कांग्रेस यहां अंग्रेजों से जीत जाएगी। उस वक्त के वॉयसराय लिनलिथगो ने ब्रिटेन के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को एक पत्र में यह लिखा भी कि अगर राजकोट में कांग्रेस अपनी गतिविधियों को जारी रखती है, तो वह काठियावाड़ होते हुए समूचे पश्चिम की रियासतों में आग की तरह फैल जाएगी। दरबार ने 26 दिसंबर 1938 को सत्याग्रह की मांगें मान लीं। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने दरबार के इस एकतरफा फैसले को नकार दिया।

 

26 जनवरी 1939 को सत्याग्रह फिर शुरू हुआ, जिसमें कस्तूरबा गांधी ने तबीयत खराब होने के बावजूद अकेले शिरकत की। उन्हें और सरदार पटेल की बेटी मनीबेन पटेल को तत्काल हिरासत में ले लिया गया। तभी महात्मा गांधी ने सत्याग्रह से जुड़ने का मन बनाया। 3 मार्च 1939 को गांधीजी अनशन पर बैठ गए। पूरे देश में हड़ताल शुरू हो गई। 7 मार्च को वॉयसराय ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से मध्यस्थता करने की बात रखी। चीफ जस्टिस ने सत्याग्रहियों के पक्ष में निर्णय किया और इसके बाद गांधीजी ने अनशन तोड़ा। इसके बाद देशभर की रियासतों के लोग आजादी की लड़ाई से जुड़ने लगे।

 

अंग्रेजों ने स्वदेशी आंदोलन को दबाने के लिए शराब के फायदे बताने वाले पोस्टर लगाए थे

ब्रिटिश सरकार ने एक लिस्ट जारी की, ऐसे ऐतिहासिक पुरुषों की, जो शराब पीया करते थे। इसमें मोजेस, अलेक्जेंडर द ग्रेट, जूलियस सीजर, नेपोलियन, शेक्सपियर, ग्लैड स्टोन, टेनिसन और बिस्मार्क के नाम थे। बात 1921-22 की है, जब स्वतंत्रता सेनानी देश भर में विदेशी सामानों का बहिष्कार कर रहे थे। कुछ सेनानियों ने अलग अलग जगहों पर शराब की दुकानों को घेरना शुरू कर दिया था और शराब की बिक्री बंद करवा दी थी। सरकार का कर इस कारण बड़ी तेजी से घटना शुरू हुआ और सरकार को जगह-जगह पर विज्ञापन के माध्यम से लोगों को ये बताना पड़ा कि शराब के स्वास्थ्यवर्धक गुण क्या हैं? 


कहानी की शुरुआत 1920 में होती है। ब्रिटेन और तुर्की के राजा के बीच मई 1920 में एक संधि हुई जो सेवरेस ट्रिटी के नाम से जाना गया। इसके अंतर्गत तुर्की साम्राज्य खंड-खंड कर दिया गया। जिसका विरोध भारत के मुसलमानों में गहरा हुआ। मुसलमान तुर्की के खलीफा को अध्यात्मिक प्रमुख मानते थे और इस संधि से पहले वे ब्रिटिश हुकूमत से मांग कर रहे थे कि विश्व युद्ध प्रथम में हारने के बाद तुर्की के खिलाफ लचीला रवैया रखा जाए। इसी सिलसिले में नवंबर 1919 में खिलाफत कांफ्रेंस आयोजित की गई जिसमें गांधीजी को आमंत्रित किया गया।

 

फरवरी 1920 में गांधीजी ने खिलाफत समिति को अहिंसक असहयोग आंदोलन करने की राय दी, जिसे 9 जून 1920 को इलाहाबाद में समिति ने सर्वसहमति से मान लिया और गांधीजी से नेतृत्व करने का आह्वान किया। 22 जून 1920 को गांधीजी ने वाइसरॉय को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि जनता का अधिकार है कि वह ऐसी सरकार को सहयोग न करे जो गलत तरीके से शासन करती हो। साथ के साथ चेतावनी भी दी कि अगर 30 जून तक ब्रिटिश सरकार ने रवैया नहीं बदला तो एक अगस्त 1920 से असहयोग आंदोलन शुरू होगा। 1 अगस्त 1920 को सुबह-सुबह असहयोग आंदोलन शुरू होने से पहले पूरे देश में बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु की खबर फैल चुकी थी। यह खबर और असहयोग आंदोलन देश भर में हड़ताल औऱ विरोध-प्रदर्शन के जरिए उमड़ पड़ा। 

 

दिसंबर 1920 में नागपुर के वार्षिक अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का आधिकारिक तौर पर प्रस्ताव पारित कर दिया गया। जनवरी 1921 तक कांग्रेस गांधी जी के नेतृत्व में पूरे देश में नई शक्ति से उभर चुकी थी और माना जाता है कि पहले ही महीने में 800 राष्ट्रीय स्कूल और कॉलेज देश भर में शुरू हो चुके थे और करीब 90000 विद्यार्थी अपने स्कूल-कॉलेजों को छोड़कर इन नए स्कूल-कॉलेजों में दाखिला ले चुके थे। एक अनुमान के अंतर्गत 1920-21 में जो सरकारी कपड़ों का आयात करीब 102 करोड़ रुपए का था, वह 1921-22 में घटकर 57 करोड़ रह गया। शराब न बिकने के कारण सरकार को जो नुकसान हुआ, उसके चलते सरकार को शराब के फायदे गिनवाने पड़े।

 

सोर्सः भारत का स्वतंत्रता  संग्राम, लेखक विपिन चंद्र

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