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भास्कर एक्सप्लेनर:अफगानिस्तान को लेकर नीति बदल रहे देश, तालिबान पर भारत बैक डोर स्ट्रैटेजी बना रहा; विदेश मंत्री जयशंकर के ईरान दौरे से मिल रहे संकेत

10 महीने पहले
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अमेरिका में हुए 9/11 के आतंकी हमले के बाद अफगानिस्तान में करीब दो दशक बिताकर अमेरिकी सेना अब वतन लौट रही है। तालिबान बीते कुछ सालों में फिर से ताकतवर बनकर उभरा है और उसका एक तिहाई देश पर कब्जा भी हो गया है। जानते हैं कि दो दशक पहले और आज के अफगानिस्तान को लेकर दुनिया में क्या चल रहा था। तब और अब में क्या बदलाव हुए। कौन उभरा और कौन गर्त में गया।

अमेरिका
तब: पाकिस्तान के सहारे ऑपरेशन साइक्लोन छेड़ा

1979 में सोवियत सेना अफगानिस्तान में आई। उसे हटाने के लिए राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय CIA ने पाकिस्तानी तानाशाह मोहम्मद जिया उल हक के साथ मिलकर ऑपरेशन साइक्लोन छेड़ दिया। इसके तहत वेतनभोगी सैनिकों की जगह अफगानी लड़कों को धर्म के साथ सैन्य तालीम दी जाने लगी। 1983 में रीगन ने स्वतंत्रता सेनानी कहे जा रहे मुजाहिदीन नेताओं से मुलाकात की थी।

इन लड़ाकों के चलते सोवियत सेना 1989 में अफगानिस्तान से चली गई। अमेरिका ने तालिबानियों के जरिए अफगानिस्तान पर हमला कराया। फिर ओसामा बिन लादेन को भेजा। बाद में इन लड़ाकों को पैसा देना बंद किया। इससे दरार आ गई। फिर अमेरिका में 9/11 हमला हुआ, जिसमें लादेन का हाथ निकला।
अब: अमेरिका दो दशक में तालिबान को खत्म नहीं कर सका। उसके फिर खड़ा होने पर वहां से निकलने में ही अमेरिका को समझदारी महसूस हुई।

नॉर्दर्न अलायंस
तब: तालिबान से लड़ा था, उसे सत्ता से हटाने में कामयाब रहा

1996 में काबुल पर तालिबान ने कब्जा किया था। उसके मुकाबले के लिए नॉर्दर्न अलायंस का गठन पूर्व राष्ट्रपति बुरहानुद्दीन रब्बानी और पूर्व रक्षामंत्री अहमद शाह मसूद ने किया था। अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले से तालिबान तबाह हुआ और करजई की सरकार बनी तो ये गठबंधन टूट गया।
अब: गठबंधन सहयोगी मोहम्मद नूर फिर लड़ने की बात कर रहे।

ईरान
तब: तालिबान के विरोध में अमेरिका की मदद की थी

पहले सत्ता में आने पर तालिबान ने ईरान जाने वाली कजाकी डैम की जल धारा बंद कर दी थी। इससे ईरान के हमाउं क्षेत्र में नुकसान हुआ। अमेरिका ने जब हमला किया तो तालिबान से परेशान ईरान ने अमेरिका की मदद की थी। 2002 में इनकी दोस्ती खत्म हो गई।
अब: अफगानिस्तान में तालिबान को लेकर ईरान असहज है। वह उसे सत्ता में देखना नहीं चाहता।

भारत
तब: नॉदर्न अलायंस और अफगान सरकार के साथ था

दो दशक पहले भारत ने अहमद शाह मसूद के नेतृत्व वाले नॉर्दर्न अलायंस और फिर तालिबान विरोधी अफगान सरकार का साथ दिया। इसी कारण करीब 22 हजार करोड़ रुपए का निवेश भी किया।
अब: कतर के अफसर का जून में दावा था कि भारत ने तालिबान से संपर्क किया है। तब केंद्र ने इसकी पुष्टि नहीं की। विदेश मंत्री एस जयशंकर की ईरान यात्रा अफगानिस्तान रणनीति से जोड़कर देखी जा रही है। विदेश मंत्री हाल ही में जब बातचीत के लिए ईरान पहुंचे, तो वहां तालिबानी प्रतिनिधि भी मौजूद थे। लग रहा है कि भारत इस समय ईरान और रूस के साथ मिलकर अफगानिस्तान रणनीति पर काम कर रहा है।

पाकिस्तान
तब: तालिबान सरकार को मान्यता देने वाले 3 देशों में था

सऊदी अरब और ईरान के साथ यह उन तीन देशों में शामिल था, जिन्होंने 90 के दशक में तालिबान सरकार को मान्यता दी थी।
अब: पाक तालिबान को सत्ता में लौटते देखना चाहता है, ताकि सीमाई क्षेत्रों में स्थिरता ला सके।

चीन : अमेरिका की रवानगी के साथ अब चीन अचानक से अफगानिस्तान में दिलचस्पी लेने लगा है। उसके विदेश मंत्री वांग यी हाल ही में तालिबान के नेता मुल्ला बरादर से मिले थे।
तुर्की: ये भी अफगानिस्तान में तालिबान को देखना नहीं चाहता। वह तालिबान को रोकने के लिए भारत के साथ मिलकर काम कर सकता है।

(स्रोत: CFR US वॉर इन अफगानिस्तान, भारतीय विदेश मंत्रालय, वाॅल स्ट्रीट जर्नल, AP और BBC की रिपोर्ट।)

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