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विवाद / आईएमए ने कहा- डॉक्टरों को लड़कियां पेश करने का मोदी का कथित बयान मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश

आईएमए का आरोप- डॉक्टरों पर हमले और अस्पतालों में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई। -फाइल आईएमए का आरोप- डॉक्टरों पर हमले और अस्पतालों में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई। -फाइल
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आईएमए का आरोप- डॉक्टरों पर हमले और अस्पतालों में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई। -फाइलआईएमए का आरोप- डॉक्टरों पर हमले और अस्पतालों में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई। -फाइल

  • आईएमए का आरोप- आयुष्मान भारत योजना की रकम का 15% हिस्सा बीमा कंपनियां हड़प लेती हैं
  • देश का स्वास्थ्य बजट जीडीपी का 1% से 1.3%, बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन में कोई नया निवेश नहीं

Dainik Bhaskar

Jan 15, 2020, 10:39 PM IST

नई दिल्ली. इंडियन मेडिकल एसोशिएसन (आईएमए) ने बड़ी दवा कंपनियों की तरफ से डॉक्टरों को लड़कियां भेजे जाने संबंधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कथित बयान पर आपत्ति जताई है। मंगलवार को आईएमए ने लिखित बयान जारी करके कहा- मीडिया में कुछ ऐसी खबरें आई हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शीर्ष दवा कंपनियों की तरफ से बड़े डॉक्टरों को लड़कियां ऑफर की गईं। अगर यह बयान वाकई प्रधानमंत्री की तरफ से आया है, तो आईएमए इसकी कड़ी निंदा करता है। आईएमए यह मांग करता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) यह बताए कि क्या सच में ऐसी कोई बैठक हुई या प्रधानमंत्री ने ऐसा बयान दिया। आईएमए का कहना है कि अब तक पीएमओ ने इस खबर का खंडन भी नहीं किया है।

आईएमए की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति।

गंभीर मसलों से ध्यान भटकाने की कोशिश: आईएमए
आईएमए का कहना है कि इस तरह के बयान देकर गंभीर मसलों से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है। इनमें लोगों के इलाज और मेडिकल की पढ़ाई जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। डॉक्टरों की इस संस्था ने कहा कि स्वास्थ्य को लेकर वर्तमान सरकार की सबसे अहम योजना 'आयुष्मान भारत' असरदार नहीं पाई गई है और इसका ज्यादातर इस्तेमाल सरकारी अस्पतालों में होता है, जहां इलाज पहले ही मुफ्त है। योजना के तहत अस्पताल को मिलने वाली रकम का 15% हिस्सा बीमा कंपनियां हड़प लेती हैं। इनमें निजी और सरकारी दोनों तरह के अस्पताल शामिल हैं।

डॉक्टरों की हिफाजत में नाकाम रही सरकार
एसोसिएशन ने कहा कि पिछले कई साल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे या मानव संसाधन को बेहतर बनाने के लिए कोई नया निवेश नहीं हुआ है। स्वास्थ्य बजट जीडीपी का महज 1% से 1.3% है। डॉक्टरों पर हमले और अस्पतालों में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। सरकार चिकित्सा संस्थानों की हिफाजत करने में नाकाम रही है। एंबुलेंस तक सुरक्षित नहीं हैं। सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में उस केंद्रीय कानून को भी लागू नहीं किया, जिसका वादा खुद उन्होंने किया था। ऐसे हालात में आईएमए यह मानता है कि इस तरह की क्रूर रणनीति के जरिए स्वास्थ्य क्षेत्र में वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है।

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