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जल योद्धा:किसी ने करोड़ों लीटर पानी बचाया, किसी ने सूखे गांवों तक पानी पहुंचाया और बदल दी लाखों लोगों की जिंदगी

25 दिन पहलेलेखक: उदिता सिंह परिहार
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भारत अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। देश में करीब 60 करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। करीब दो लाख लोग स्वच्छ पानी न मिलने के चलते हर साल जान गंवा देते हैं। नीति आयोग के मुताबिक 2018 में पानी की गंभीर समस्या झेल रहे 122 देशों की लिस्ट में भारत 120वें नंबर पर था। पानी की इस गंभीर समस्या को देखते हुए कुछ वॉटर वॉरियर्स ने पानी बचाने और लाखों लोगों तक पानी पहुंचाने का जिम्मा उठाया। किसी ने गांव की जमीन को उपजाऊ बनाया तो किसी ने पेड़-पौधे लगाकर ईको सिस्टम को मजबूत किया। इन जल योद्धाओं ने किस तरह अपना योगदान दिया, आइए जानें...

मुंबई की रहने वालीं 75 साल की अमला रुइया को 'वॉटर मदर' के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से लगभग 200 चेक डैम बनाकर राजस्थान के 100 गांवों की तस्वीर बदल दी है। सूखे से परेशान गांव के 2 लाख लोगों को डैम बनने के बाद पानी मिलने लगा और इन गांवों की सालाना आय 300 करोड़ रुपए से ज्यादा हो गई। अमला सोनी टीवी के गेम रियलिटी शो कौन बनेगा करोड़पति में भी जा चुकी हैं। जहां पर उन्होंने बताया था कि वो अब तक 6 लाख लोगों की पानी की समस्या को सुलझा चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश में जन्म लेने वाली अमला रुइया ने अब तक 518 गांवों की जिंदगियां बदल दी है। उन्होंने अब तक कई सूखे गांव की पानी से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया है। केबीसी में अमला ने अमिताभ बच्चन को बताया था कि राजस्थान के मारवाड़ रीजन में एक साल (1999-2000) में एक बूंद भी बारिश नहीं हुई थी और लोग पानी की समस्या से जूझ रहे थे, तब अमला ने वहां पानी पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था। उसके बाद यह सिलसिला चलता गया।

मैग्सेसे से सम्मानित जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
मैग्सेसे सम्मान से सम्मानित जल-पुरुष राजेन्द्र सिंह दुनिया के उन पचास लोगों में शुमार हैं, जिनके भरोसे धरती को बचाया जा सकता है। साल 1981 में अपनी शादी के कुछ समय बाद घर का सारा सामान बेचकर जल-पुरुष पानी की लड़ाई लड़ने निकल पड़े। आज उनकी कोशिश से करीब सात हजार जोहड़ों के निर्माण से राजस्थान के एक हजार गांव पानी के मामले में खुशहाल हो उठे हैं।

वॉटर मैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर राजेन्द्र सिंह ने 1975 में तरुण भारत संघ की नींव रखी। जिसने करीब 1000 गांवों को पानी मुहैया कराया। राजेन्द्र सिंह ने राजस्थान में 1980 के दशक में पानी के संकट पर काम करना शुरू किया। राजेन्द्र सिंह को स्टॉकहोम वॉटर प्राइज, जमनालाल बजाज पुरस्कार और अहिंसा पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

जल योद्धा नाम से मशहूर मेरठ की रहने वालीं अदिति चंद्रा ने पानी बचाने के लिए एक पहल शुरू की थी। बच्चों के साथ मिलकर उन्होंने बूंद-बूंद जल बचाने को लेकर डोर-टू-डोर कैंपेन शुरू किया और लोगों से पानी बचाने के लिए आग्रह करने लगीं। इस दौरान उन्हें कई जगह पर लीकेज की समस्या दिखी, जिसे उन्होंने तुरंत ठीक करवाया। करीब एक साल में अदिति ने 850 से अधिक लीकेज ठीक करवाकर करोड़ों लीटर पानी बचाया।

जल संरक्षण में अदिति के इस योगदान के लिए उनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज किया जा चुका है। पिछले दो साल से जल संरक्षण में जुटी अदिति मेरठ छावनी परिषद और नगर निगम के साथ मिलकर पानी बचाने के अलावा साफ-सफाई को लेकर भी काम कर रही हैं। अदिति घर-घर जाकर लोगों से पानी बचाने के अलावा घरों में किचन गार्डन लगाने, गीले कचरे से ही खाद बनाने और प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने की भी अपील करती हैं।

पानी की एक-एक बूंद बचाने की जद्दोजहद कर रहे 85 साल के आबिद सुरती एक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखक, कार्टूनिस्ट, पेंटर, पर्यावरणविद और एक एक्टिविस्ट हैं। वे मुंबई के मीरा रोड इलाके में हर रविवार एक प्लंबर के साथ लोगों के घर जाते हैं और उनके लीक हो रहे वॉटर टैप को मुफ्त में ठीक करवाते हैं। इन नलों में लगे रबर गैस्केट रिंग को बदलते हैं ताकि पानी लीक होकर बर्बाद न हो। इसी अभियान के चलते उन्होंने 12 साल में करीब 2 करोड़ लीटर पानी बर्बाद होने से बचाया है।

आबिद का बचपन पानी की भारी कमी के बीच गुजरा। आबिद ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 2007 में उनकी नजर अचानक एक लीक करते पानी के टैप पर पड़ी और अगर हर सेकंड एक बूंद पानी बर्बाद होता है, तो हर महीने करीब 1 हजार लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। इसलिए उन्होंने लोगों को इसके प्रति जागरूक करना शुरू किया। वन मैन आर्मी की तरह काम करने वाले आबिद सप्ताह में 6 दिन काम करते हैं और रविवार को लोगों में पानी को लेकर जागरूकता फैलाने का काम करते हैं।

महाराष्ट्र के लघु सिंचाई विभाग में बतौर इंजीनियर काम कर रहे शिरीष ने वहां के सरकारी तालाबों के पुनरुद्धार का 2008 में बीड़ा उठाया। दो साल में ही पहला तालाब ठीक हो गया। इससे इलाके का भूजल स्तर काफी बढ़ गया, कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई और मछली पालन बढ़ा। बाद में उनके नक्शेकदम पर सरकार भी सक्रिय हुई।

शिरीष आप्टे ने 300 साल पुराने मालगुजार टैंक की मरम्मत और उसे बहाल करने के प्रोजेक्ट से शुरुआत की थी। दरअसल, यह टैंक पुराने समय में पानी के प्रमुख स्रोत के रूप में काम करता था, लेकिन सही से देखरेख नहीं होने के कारण खराब हो गया था। जब यह प्रोजेक्ट सफल हो गया और कृषि उत्पादन बढ़ा उसके बाद से उन्होंने पानी की कमी को पूरा करने का लक्ष्य बना लिया।

दक्षिण के जो भी राज्य पानी के संकट से जूझ रहे हैं, उनमें से एक कर्नाटक भी है। उसी कर्नाटक के हैं, 'पानी के डॉक्टर', 'वॉटर मैजिशियन', 'वॉटर गांधी' कहे जाने वाले अयप्पा मसागी, जिन्होंने अपने खेत को ही 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब' बना दिया। पांच सौ झीलें और एक लाख बोरवेल रिचार्ज करने पर अयप्पा मसागी लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। अयप्पा मसागी का जन्म उत्तरी कर्नाटक के गडग जिले में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। अपने पिता की अनिच्छा के बावजूद मसागी जैसे-तैसे पढ़कर मैकेनिकल इंजीनियरिंग बन गए। उनकी पढ़ाई के लिए मां को अपने गहने बेचने पड़े। इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करते ही मसागी को बेंगलुरु के बीईएमएल में नौकरी मिल गई। इसके बाद वे एल एंड टी में आ गए। मसागी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब वह छोटे थे, देखा करते थे कि किस तरह उनके किसान पिता पानी की कमी से जूझते रहते हैं। तभी से उनका सपना था कि वे गांवों के विकास के लिए साइंस एंड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करें।

अयप्पा मसागी ने कर्नाटक के अपने पैतृक गांव गडाग में छह एकड़ जमीन पर 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब' बना दिया था। मसागी धरती को एक बड़ा फिल्टर मानते हैं। वे पानी को संग्रहित करते हैं और उसे जमीन में उतार देते हैं। इसके लिए पहले एक बड़े गड्ढे में बड़े पत्थर, बजरी, रेत और कीचड़ की मदद से एक स्ट्रक्चर खड़ा करते हैं। जब पानी गिरता है तो यह पानी बजरी और पत्थर से होता हुआ नीचे तक जाता है और भूमि को रिचार्ज करता है। वह प्रति आठ एकड़ में ऐसी संरचना बनाते हैं। इसमें बारिश का पानी जमा होने लगता है।

चेन्नई स्थित रेन सेंटर के डायरेक्टर 72 वर्षीय डॉ. शेखर राघवन को तमिलनाडु में रेन हार्वेस्टिंग को मुहिम का रूप देने के लिए जाना जाता है। डॉक्टर राघवन ने दक्षिण भारत में पानी की समस्या से निपटने के लिए रेन वॉटर हार्वेस्टिंग यानी बारिश के पानी का संग्रहण करने की वकालत की थी। इसी कारण उन्हें रेन मैन कहा जाने लगा। डॉ. राघवन का मानना है कि लोगों को बरसात के दिनों में सामुदायिक स्तरों पर बारिश का पानी जमा करना चाहिए। वे आखिर कब तक चार गुना अधिक पैसे देकर टैंकरों से पानी खरीदते रहेंगे। शुरुआत में जब राघवन रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के लिए लोगों को जागरूक करने घर-घर जाते थे, तो लोग उनके लिए दरवाजा भी नहीं खोलते थे, हालांकि बाद में लोग उन्हें गंभीरता से लेने लगे।

डॉ. राघवन ने 1995 में घर-घर जाकर लोगों को रेन हार्वेस्टिंग से जोड़ने के अभियान के साथ अपने सफर की शुरुआत की थी। डॉ. राघवन ने अनेक परिवारों की सिस्टम लगाने में मदद की। तमिलनाडु सरकार ने उनके प्रयासों को सराहा और उन्हें अपने साथ शामिल किया। डॉ. राघवन के प्रयासों से साल 2002 में आकाश गंगा ट्रस्ट ने चेन्नई में रेन वॉटर सेंटर शुरू किया, जिसका उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के हाथों हुआ था।

जलयोद्धा उमाशंकर पांडेय की बदौलत नीति आयोग द्वारा ‘जल ग्राम’ घोषित बांदा (बुंदेलखंड) का गांव जखनी पूरे देश के लिए मिसाल बन चुका है। पांडेय की कोशिशों ने जखनी को भारत ही नहीं, विश्व मानचित्र पर ला दिया है। वहां इजराइल, नेपाल तक के कृषि वैज्ञानिक और तेलंगाना, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों के छात्र आकर इस कारस्तानी पर रिसर्च करने लगे हैं। जखनी के खेतों में पैदा हो रही सब्जियां दूर-दूर तक बिकने लगी हैं।

उमाशंकर पांडेय 2005 में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम के एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। जिसमें डॉ. कलाम ने खेतों की मेड़ पर पेड़ लगाकर बारिश का पानी रोकने की बात कही थी। इससे प्रेरित होकर उमाशंकर पांडेय ने गांव लौटकर अपने पांच एकड़ खेत में मेड़ बनाकर बारिश का पानी रोक लिया। शुरुआत में तो किसानों को इस तरीके पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन बाद में जब पांडेय उसी पानी के बूते धान, गेहूं, दलहन और सब्जियों की पैदावार करने लगे, तब उन्हें पांडेय पर भरोसा हुआ। इससे पूरे गांव का जलस्तर बढ़ने लगा है। उमाशंकर पांडेय को इस योगदान के लिए केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की ओर से सम्मानित भी किया गया। और उनकी तकनीक को जखनी मॉडल नाम दे दिया गया।

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