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इसरो / जीसैट-30 सैटेलाइट की लॉन्चिंग 17 जनवरी को; इससे इंटरनेट स्पीड बढ़ेगी, मोबाइल नेटवर्क का विस्तार होगा

इसरो ने बुधवार को जीसैट-30 की तस्वीरें जारी कीं। इसरो ने बुधवार को जीसैट-30 की तस्वीरें जारी कीं।
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इसरो ने बुधवार को जीसैट-30 की तस्वीरें जारी कीं।इसरो ने बुधवार को जीसैट-30 की तस्वीरें जारी कीं।

  • 2020 में इसरो का पहला मिशन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटर फ्रेंच गुआना से लॉन्च होगा
  • 3357 किलो वजनी जीसैट-30 देश का सबसे ताकतवर संचार उपग्रह, 15 साल तक काम करेगा

दैनिक भास्कर

Jan 14, 2020, 09:52 AM IST

बेंगलुरु. इसरो के संचार उपग्रह जीसैट-30 को 17 जनवरी को यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटर फ्रेंच गुआना से लॉन्च किया जाएगा। यह इसरो का 2020 का पहला मिशन होगा। इसे अत्याधुनिक एरियन-5 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) ने सोमवार को जीसैट-30 की तस्वीरें भी जारी कीं। इसरो के मुताबिक, 3357 किलो वजनी सैटेलाइट लॉन्चिंग के बाद 15 साल तक काम करेगा।

इसके लॉन्च होने के बाद देश की संचार व्यवस्था और मजबूत हो जाएगी। इससे इंटरनेट की स्पीड बढ़ेगी। साथ ही देश में जहां नेटवर्क नहीं है, वहां मोबाइल नेटवर्क का विस्तार हाेगा। यह एक दूरसंचार उपग्रह है, जो इनसेट सैटेलाइट की जगह काम करेगा। इस मिशन की अवधि 38 मिनट, 25 सेकंड होगी। इसे जियो-इलिप्टिकल ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा। इसमें दो सोलर पैनल होंगे और बैटरी होगी, जिससे इसे ऊर्जा मिलेगी। यह 107वां एरियन 5वां मिशन होगा।

दावा: यह देश का सबसे ताकतवर संचार उपग्रह; गुआना से लॉन्च होगा
समय: 38 मिनट 25 सेकंड की अवधि होगी इस मिशन की

उपलब्धि: 3,357 किलो वजनी उपग्रह 15 साल तक काम करेगा

14 सैटेलाइट काम कर रहे

जीसैट-30 इस सीरीज का सबसे ताकतवर संचार उपग्रह है। इसकी मदद से देश की संचार प्रणाली में इजाफा होगा। अभी जीसैट सीरीज के 14 सैटेलाइट काम कर रहे हैं। इनसे ही देश में संचार व्यवस्था कायम है।

इसकी जरूरत क्यों पड़ी ?
पुराने संचार उपग्रह इनसैट सैटेलाइट की उम्र पूरी हो रही है। देश में इंटरनेट की नई तकनीक आ रही है। 5जी पर काम चल रहा है। ऐसे में ज्यादा ताकतवर सैटेलाइट की जरूरत थी। जीसैट-30 उपग्रह इन्हीं जरूरतों को पूरा करेगा।

25 उपग्रह लॉन्च किए जाएंगे

वर्तमान में इसरो के पास आदित्य-एल 1 उपग्रह सहित 25 उपग्रह लॉन्च करने की योजना है, जिन्हें पृथ्वी से करीब 15 लाख किमी की दूरी पर लग्रनिज बिंदु (एल 1) के आसपास हॉलो ऑर्बिट में प्रवेश कराया जाएगा।

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