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इंटरव्यू / जेट एयरवेज बंद होने पर ब्रांड गुरु हरीश बिजूर ने कहा- बिजनेस में दूसरों के हित का ध्यान रखना जरूरी



हरीश बिजूर, 29 साल से ब्रांड गुरु। हरीश बिजूर, 29 साल से ब्रांड गुरु।
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हरीश बिजूर, 29 साल से ब्रांड गुरु।हरीश बिजूर, 29 साल से ब्रांड गुरु।

  • कहा- लालच रखना और दूरदर्शिता न होने से जेट बंद हुई, वोडाफोन-आइडिया मर्जर की वजह भी यही 
  • देश की राजनीति में भी ब्रांडिंग हावी, 2024 का चुनाव भी इसी पॉलिटिकल ब्रांडिंग के दम पर लड़ा जाएगा

Dainik Bhaskar

May 18, 2019, 09:02 AM IST

मुंबई. जेट एयरवेज का बंद होना हो या फिर वोडाफोन का आइडिया के साथ मर्जर, इन सबके पीछे दूरदर्शिता न होना और लालच ही वजह है। जेट ने गलाकाट प्रतिस्पर्धा का मॉडल अपनाया था। उसे नुकसान हुआ। प्रतिस्पर्धा करें, पर गला न काटें। जब आप ऐसा करते हैं तो आपका भी गला कटने का अंदेशा होता है। अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी है, ऐसे में कंपनियां बंद होने से बेरोजगारी बढ़ेगी ही। यह कहना है ब्रांड गुरु और हरीश बिजूर कंसल्ट्स इन कॉर्पोरेशन के सीईओ हरीश बिजूर का। भास्कर की विशेष संवाददाता मनीषा भल्ला से उन्होंने राजनीति, ब्रांड और बाजार को लेकर बात की।

 

जेट एयरवेज बंद हो चुकी है, वोडाफोन को आइडिया से मर्जर करना पड़ा है, इस पर क्या कहेंगे? 
दूर तक न देख पाना और लालच इसकी वजह है। अमेरिका में किसी ने बोला कि लालच अच्छी चीज है और हमने अपना लिया। किंगफिशर अच्छी थी, लालच आ गया कि एयर डेक्कन खरीदना है। इंडिगो में भी गड़बड़ है। इसलिए मैं कॉरपोरेट में क्लीन प्रैक्टिस ब्रांडिंग लाया हूं। यानी हम जब भी किसी के पास जाएं तो उनके हित भी ध्यान रखें। अमीर लोगों को गरीबों को ऊंचा उठाने में मदद करनी चाहिए। 

 

पिछली तिमाहियों में ऑटो-एफएमसीजी जैसे सेक्टरों में मांग घटी है। अर्थव्यवस्था के लिए इसे कैसे देखते हैं? 
ऑटो सेक्टर में जब डिमांड में कमी आने लगती है तो दूसरे क्षेत्रों पर इसका नकारात्मक असर होता है। डिमांड कम होने लगती है तो उत्पादन कम होता है। इससे बेरोजगारी बढ़ती है। बेरोजगारी भविष्य का सबसे बड़ा मुद्दा है। सरकारी नौकरियां हल नहीं हैं। आंत्रप्रेन्योरशिप बढ़ानी होगी। पर ऐसा नहीं हो रहा। 

 

राजनीति में ब्रांडिंग की एंट्री को किस तरह देखते हैं? 
देश में ब्रांडिंग सेंटर स्टेज पर है। इसका श्रेय पीएम मोदी को है। वह पहले ऐसे पीएम हैं जिन्होंने कहा- राजनीति में ब्रांडिंग होनी चाहिए। सभी विभागों-मंत्रालयों का सोशल मीडिया पर आना अनिवार्य किया। पर ब्रांडिंग में विश्वसनीयता होना जरूरी है। 

 

तो क्या 2024 के चुनाव में भी ब्रांडिंग हावी रहेगी? 
बिल्कुल। अभी दो मीडिया हैं। सोशल और रेगुलर। भारतीयों का सोशल मीडिया से मोह भंग हो रहा है। प्रिंट-टीवी इससे अलग हंै। प्रिंट मीडिया आज भी विश्वसनीय है, लोग प्रिंट मीडिया की ओर लौटेंगे। 

 

प्रधानमंत्री मोदी, राहुल गांधी, ओबामा और ट्रम्प के राजनीतिक ब्रांडिंग पैटर्न में क्या अंतर है? 
सभी में राष्ट्रवाद समान है। ओबामा कहते थे- वी कैन, यस वी कैन। कट्टर राष्ट्रवाद था। ट्रंप का भी ऐसा ही है। मोदी का राष्ट्रवाद है। अंतर यह है कि ओबामा की टोन सॉफ्ट थी। ट्रंप और मोदी की टोन बहुत ऊंची है। राहुल की टोन ऊंची हो रही है। पर यह बाजार है, जो फुसफुसाएगा वही सुना जाएगा।  

 

क्या माना जाए काम पर ब्रांडिंग हावी हो रही है? 
हां, ब्रांड की पावर एक शब्द से परिभाषित की जाती है। जैसे हम चौकीदार की बात करते हैं तो दिमाग में मोदी आते हैं। अभी वो जमाना आने वाला है जब सिर्फ फोटो ब्रांड का नाम बताएगा। 

 

आप 15 हजार घंटे की कॉरपोरेट स्पीच रिकॉर्ड के करीब हैं। आपका यह सफर कैसे शुरू हुआ? 
बचपन से नेहरू, मंडेला जैसी हस्तियों की स्पीच पढ़ी थी। कॉलेज के दौरान अखबारों के लिए लिखता था। लेखन की शक्ति को बोलने की शक्ति बनाया। तभी शुरुआत हुई। 29 साल पहले चेन्नई में पहली स्पीच दी। कई कंपनियां मुझे 15 हजारवीं स्पीच के लिए बुला रही हैं। पर मैंने बेंगलुरू चुना है। 

 

मौजूदा राजनीति में स्पीच के पैटर्न को कैसे देखते हैं? 
यह बदला है। इस संदर्भ में हम भारत के प्रधानमंत्री को देख सकते हैं। मनमोहन सिंह साइलेंट वर्किंग पीएम थे। दस साल के बाद लोगों को लगने लगा कि साइलेंस काम नहीं कर रहा। वहीं, 5 साल में मोदी का स्टाइल बहुत बातें करने का रहा है। मनमोहन को लोग मौनमोहन भी बुलाते थे और मोदी की बातें लाउडस्पीकर के हिसाब से आती हैं। यह आदत है। लोग एक छोड़ दूसरे पर जाते हैं। फिर वापस उसी पर आते हैं। पहले साइलेंस अच्छा लगता है फिर शोर, और वापस साइलेंस अच्छा लगता है। 

 

आपकी किताब 'मार्केटिंग ट्रेंड्स- स्मार्ट इनसाइट्स...' में बिजनेस के 67 सूत्र बताए गए हैं, इनमें क्या अलग है? 
मेरी रिसर्च है कि अलग बनो, अलग करो नहीं। जो अमेरिका कर रहा है, वो हम नहीं कर सकते। नकल मत करो। मैंने पश्चिमी देशों से अलग बिजनेस का भारतीय मॉडल बनाया है। हमारे यहां एमबीए छात्र विदेशी किताबों से पढ़ते हैं जो देश में कारगर नहीं। भारतीय किताबें हैं नहीं। इसलिए सीखने की सबसे अच्छी जगह बाजार है। वहीं जाकर सीखना चाहिए। 

 

बाजार से कम दाम पर चीजें ऑनलाइन देने के बिजनेस मॉडल को कैसे देखते हैं? 
यदि कोई ग्राहक ऑनलाइन खाना ऑर्डर करता है, तो उसे 50% छूट दी जाती है। हकीकत यह है कि कुछ भी मुफ्त नहीं होता है। ऑनलाइन कंपनियां जितनी छूट हमें दे रही होती हैं, उससे ज्यादा कमाई वो हमारा डेटा बेचकर कर लेती हैं। यह दौर गिव एंड टेक का है। डेटा आपके मोबाइल से ज्यादा कीमती है।

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