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विवाद / जावेद अख्तर ने कहा- फैज को हिंदू विरोधी कहना बेतुका, उनकी नज्म का किसी धर्म से लेना-देना नहीं

पाकिस्तानी शायर फैज की नज्म को हिंदू विरोधी कहने पर जावेद अख्तर को ऐतराज। - फाइल पाकिस्तानी शायर फैज की नज्म को हिंदू विरोधी कहने पर जावेद अख्तर को ऐतराज। - फाइल
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पाकिस्तानी शायर फैज की नज्म को हिंदू विरोधी कहने पर जावेद अख्तर को ऐतराज। - फाइलपाकिस्तानी शायर फैज की नज्म को हिंदू विरोधी कहने पर जावेद अख्तर को ऐतराज। - फाइल

  • जावेद अख्तर ने कहा- फैज ने जिया उल हक की सांप्रदायिक और कट्ट्‌रपंथी सरकार के खिलाफ ‘हम देखेंगे’ नज्म लिखी थी
  • ‘फैज के नज्म को लेकर हो रहे विवाद के बारे में गंभीरता से बात करना कठिन है, उन्होंने अपना आधा जीवन पाकिस्तान के बाहर बिताया था’

Dainik Bhaskar

Jan 02, 2020, 08:33 PM IST

नई दिल्ली. पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज को हिंदू विरोधी कहे जाने पर गीतकार जावेद अख्तर ऐतराज जाहिर किया है। जावेद अख्तर ने गुरुवार को कहा कि यह बेतुका और हास्यास्पद है। उन्होंने कहा कि फैज ने यह नज्म पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जिया उल हक की सरकार के खिलाफ लिखी थी। 

दरअसल, आईआईटी कानपुर के छात्रों ने दिल्ली की जामिया यूनिवर्सिटी में नागरिकता कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शन में छात्रों पर लाठीचार्ज का विरोध किया था। छात्रों ने फैज की नज्म "हम भी देखेंगे' पढ़ी थी। आईआईटी की एक फैकलटी ने इस नज्म के कुछ हिस्सों को हिंदू विरोधी कहा था, जिसके बाद शिक्षण संस्थान ने जांच का फैसला किया है।

पाकिस्तान की कट्टरपंथी सरकार के विरोध में लिखी थी फैज ने नज्म- अख्तर
जावेद अख्तर ने कहा- फैज ने अपना आधा जीवन पाकिस्तान के बाहर बिताया और उन्हें पाकिस्तान विरोधी कहा गया। उनकी लिखी नज्म की जांच कराने का निर्णय बेतुका है। इस मुद्दे पर बात करना भी कठिन है, क्योंकि इसका किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने यह नज्म सांप्रदायिक और कट्टरपंथी सरकार के खिलाफ लिखी थी।

1979 में फैज ने लिखी थी ये नज्म

सत्ता से विरोध के चलते फैज कई साल जेल में भी रहे। उन्होंने 1979 में पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जिया उल हक के सैनिक शासन के विरोध में यह नज्म लिखी थी। इसमें 'बस नाम रहेगा अल्लाह का' पंक्ति को लेकर विवाद है। आईआईटी के उपनिदेशक मनिंद्र अग्रवाल ने इसके बारे में यूनिवर्सिटी से शिकायत की थी।

फैज की नज्म

हम देखेंगे...
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब जुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

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