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आपकी कॉलिंग-डेटा महंगे होने की बात हो रही है, 3 महीने में 30% इजाफा संभव

8 महीने पहले
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यह तस्वीर सितंबर 2016 की है, जियो 5 सितंबर को लॉन्च हुआ था। जियो की 4जी स्पीड पाने के लिए इस तरह देशभर में कतारें लग गई थीं।
  • 4जी सेवा शुरू होने के बाद से यह पहला अवसर है जब टेलीकॉम कंपनियां मोबाइल डेटा और उससे जुड़े सर्विस चार्जेज में बढ़ोतरी करने जा रही हैं
  • 2016-17 में जियो के लांच होने के बाद से छिड़े प्राइसवार के चलते ग्राहकों को अनलिमिटेड वॉइस कॉलिंग और डेटा का लाभ मिला
  • कीमतों की इस लड़ाई में नामी कंपनियां चित्त हो गईं तो कई मैदान छोड़ने की स्थिति में हैं

नई दिल्ली. तीन साल में यह पहली बार है, जबकि देश में कॉलिंग और डेटा टैरिफ बढ़ाने की बात हो रही है। 2016 में जियो के आने के बाद से अब तक तो सिर्फ कीमतों में कटौती की खबरें आई थीं। अब अचानक ऐसा क्या हो गया? क्यों टेलीकॉम कंपनियां ऐसा फैसला ले रही हैं? कॉलिंग-डेटा कितना महंगा हो सकता है? इन्हीं सवालों के जवाब भास्कर ने एक्सपर्ट्स के जरिए तलाशने की कोशिश की।

टेलीकॉम क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि तीन महीनों में ही डेटा-टैरिफ तीस फीसदी तक महंगा हो सकता है। जियो, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया पहले ही कह चुकी हैं कि दिसंबर में वे दाम बढ़ाने वाली हैं। टेलीकॉम कंपनियों के इस संकट के मूल में एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) का विवाद छिपा है।


2005 में सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने सरकार की इस परिभाषा को अदालत में चुनौती दी। अब इसी 14 साल पुराने केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है। इसमें उसने कंपनियों को 92 हजार करोड़ रुपए चुकाने का आदेश दिया है। इसी के चलते टेलीकॉम कंपनियां चिंतित हैं।


सरकार ने भी कंपनियों की मदद के लिए कमेटी बनाई, जिसके बाद कंपनियों को दो साल की मोहलत मिल गई।  एजीआर का सबसे बड़ा नुकसान वोडाफोन को उठाना पड़ सकता है। इसकी वजह से  वोडाफोन-आइडिया को 50,921 करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ा है। जो कि काॅपोर्रेट इतिहास में अब तक सर्वाधिक है।    


कंपनियों की इस खस्ता हालत का असर 5जी की तैयारियों पर भी पड़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार देश में अब 2022 से ही 5जी सब्सक्रिप्शन शुरू हो पाएंगे।  इतना ही नहीं,  कंपनियां 5जी स्पेक्ट्रम की कीमतों को घटाने की भी सरकार से मांग कर रही हैं।


टेलीकॉम कंपनियों के घाटे और उससे हम पर क्या असर पड़ेगा, इसे आसान भाषा में  समझा रहे हैं- टेकआर्क के फाउंडर और चीफ एनालिस्ट फैजल कोसा और टेलिकॉम टॉक के अमित शर्मा।

1. टेलीकॉम कंपनियां दाम क्यों बढ़ा रही हैं?
एजीआर की वजह से कंपनियां घाटे में दिख रही हैं। हाल ही घोषित हुए तिमाही नतीजों में वोडाफोन-आइडिया को कॉपोर्रेट इितहास का सबसे बड़ा घाटा हुआ है। कंपनियों को सरकार को 92 हजार करोड़ रुपए चुकाने हैं। ऐसे में वे दाम बढ़ाने की बात कर रही हैं। 

कंपनियां  घाटा/मुनाफा
वोडा-आइडिया50,921
एयरटेल23,079
जियो990

- स्थिति  करोड़ रु. में, सितंबर तिमाही

2.  एजीआर का यह विवाद है क्या, शुरू कैसे हुआ?
1994 में टेलीकाॅम सेक्टर को लिबरलाइज्ड किया गया था। कंपनियों को फिक्सड फीस के बदले लाइसेंस मिले थे। 1999 में सरकार रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल लेकर आई। इसके तहत टेलिकॉम ऑपरेटर्स को सरकार के साथ एजीआर का एक हिस्सा और स्पेक्ट्रम यूसेज़ चार्ज चुकाने थे। झगड़ा इसी परिभाषा को लेकर खड़ा हुआ। टेलिकॉम कंपनियों ने इसे सिर्फ कोर सर्विस से जोड़कर देखा, वहीं सरकार ने हर तरीके के रेवेन्यू से। डिविडेन्ड से लेकर हर तरह की कमाई तक।

3.  एक्सपर्ट से समझिए, हम पर क्या पड़ेगा असर ?
टेलीकॉम टॉक के अमित शर्मा के अनुसार, टेलिकॉम कंपनियां अगले तीन महीने में 30% तक की बढ़ोतरी कर सकती है। रिलांयस भी आईयूसी चार्ज शुरू कर चुकी है। उधर, टेकआर्क के फाउंडर एंड चीफ एनालिस्ट फैसल कोसा कहते हैं- कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो एग्रेसिव प्राइसिंग करती हैं, जिससे उनके प्रतिद्वंदी या तो खत्म हो जाएं या हार मान लें। जियो ने ऐसा ही किया है। प्रतिद्वंदियों के हार मानने के बाद उसने प्राइस बढ़ाने शुरू किए हैं। एक साल में 25% तक की बढ़ोतरी काॅम्बो पैक में हो सकती है।

4.  क्या जियो इफेक्ट का प्राइसवॉर पर कोई असर है?
जियो के आते ही देश ने बड़े बदलाव देखे। वित्तीय वर्ष 2008-10 में देश में 13 टेलीकॉम ऑपरेटर थे, जिनकी संख्या अब घटकर मात्र चार पर आ गई है। जियो के अाने के पहले डेटा की खपत के मामले में भारत दुनिया में 155वें स्थान पर था जोिक अब पहले स्थान पर पहुंच गया है। भारत में जियो के पहले डेटा की खपत 20 करोड़ जीबी/माह थी जो बढ़कर 370 करोड़ जीबी/प्रतिमाह हो गई है। औसतन 250 रुपए प्रतिजीबी मिलने वाला डेटा अब मात्र 15/जीबी के हिसाब से मिल रहा है।

डेटा क्रांति की तस्वीर
यह तस्वीर सितंबर 2016 की है, जियो 5 सितंबर को लॉन्च हुआ था। जियो की 4जी स्पीड पाने के लिए इस तरह देशभर में कतारें लग गई थीं। मुफ्त डेटा पाने के लिए रात-रात भर लोग जियो टॉवर के नीचे बैठे रहा करते थे। जियो के मार्केट में आने से दूसरी कंपनियों को भी अपने दामों में कटौती करनी पड़ी थी।

5.  किस कंपनी पर सरकार का कितना बकाया?

कंपनियां घाटा/मुनाफा
वोडा-आइडिया28,308 करोड़
एयरटेल 21,682 करोड़
जियो13 करोड़

कुल - 92 हजार करोड़ रु.  का बकाया है सभी टेलीकॉम कंपनियों पर

6.  किस कंपनी के पास कितने ग्राहक?

कंपनियां 

ग्राहक
वोडा-आइडिया37.5 करोड़
एयरटेल32.7 करोड़
जियो34.8

    पिछले साल वोडाफोन और आइडिया में मर्जर हुआ था। इसके बाद दोनों के विलय से जो नई कंपनी बनी, उसके पास पहले ही दिन कुल ग्राहकों की संख्या 43 करोड़ से ज्यादा थी।

एक रोचक फैक्ट-  देश में पहली मोबाइल कॉल 24 साल पहल
31 जुलाई, 1995 को देश की पहली मोबाइल कॉल की गई थी। यह कॉल पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने की थी। उन्होंने यह प्रतीकात्मक कॉल तत्कालीन संचार मंत्री सुखराम को किया था। यह कॉल मोदी टेलस्ट्रा के नेटवर्क पर की गई थी। इसके बाद देश में मोबाइल का दौर शुरू हुआ। 2016 में 4जी क्रांति के बाद देश में सबसे सस्ता डेटा और कॉलिंग का सिस्टम खड़ा हुआ। बता दें भारत दुनिया में सबसे सस्ती मोबाइल सेवा वाला देश है।

बीएसएनएल क्यों बर्बाद हुई, 4जी भी नहीं हो पाई
ऐसा नही है कि केवल निजी टेलीकॉम कंपनियों की ही हालत आज खराब है। देश की सबसे प्रतिष्ठित टेलीकॉम कंपनी रही बीएसएनएल आज बंदी की कगार पर पहुंच गई है। टेलीकॉम कंपनियों में सबसे अधिक 1.76 लाख कर्मचारी वाली इस सरकारी टेलीकॉम कंपनी की दुर्दशा के पीछे चार प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। 

1. कंपनी ने 4जी स्पेक्ट्रम नहीं लिया :
वर्ष 2017 में बीएसएनएल ने 4जी स्पेस्ट्रम की नीलामी में हिस्सा ही नहीं लिया। जबकि उस समय सरकार ने कहा था कि उसे भी दूसरी निजी कंपनियों के दाम पर ही  स्पेक्ट्रम दिए जाएंगे। बीएसएनएल को उस समय ये दाम ज्यादा लगे।


2. डेटा स्पीड, वॉइस क्वालिटी में खराबी : 
डेटा स्पीड, वॉइस क्वालिटी और नेटवर्क में कंपनी गुणवत्ता नहीं दे पा रही है। नेटवर्क सुधारने के लिए उसने डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन्स सेे इजाजत ली है कि बैंक से 3500 करोड़ का लोन ले सके। ये लोन उसे मिला नहीं है।

3. सैलरी में खर्च होता है राजस्व का 55 से  60% :
कंपनी राजस्व का 55-60% हिस्सा कर्मचारियों की सैलेरी पर खर्च करती है। फरवरी में 850 करोड़ रु सैलेरी नहीं बांट पाई। 

4. राजस्व जुटाने का विकल्प नहीं :
कंपनी की देशभर में काफी जमीन है। वो इसे बेचकर कुछ पैसा जुटाना चाहती है। इसके लिए उसने प्रस्ताव वित्त मंत्रालय के विनिवेश विभाग को भेजा था। विभाग ने इस पर विचार नहीं किया है।

नियामक क्या कह रहे हैं?

ऑपरेटर्स निजी कारणों से दाम बढ़ा रहे हैं: ट्राई
चेयरमैन ट्राई आरएस शर्मा ने बताया कि ट्राई ने पिछले 16 साल में दरों को लेकर कोई बदलाव नहीं किया है। सर्विस चार्ज बढ़ाने के पीछे टेलीकॉम सर्विस प्रदाता कंपनियों के अपने निजी कारण हैं जिसके चलते वे दाम बढ़ा रही हैं।

यह विनाशकारी झटके की तरह : सीओएआई
महानिदेशक सीओएआई  राजन मैथ्यूज ने बताया कि टेलीकॉम उद्योग इस समय भारत में खराब दौर से गुजर रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक विनाशकारी झटके की तरह है। ऑपरेटरों की संकटपूर्ण वित्तीय स्थिति को देखते हुए इसे ताबूत में अंतिम कील कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

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