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कांग्रेस के 22 बागी विधायक जिन सीटों से जीते थे, उनमें से 20 पर भाजपा दूसरे नंबर पर थी, 11 सीटों पर जीत-हार का अंतर 10% से भी कम था

6 महीने पहले
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10 मार्च को बागी विधायकों ने बेंगलुरू से स्पीकर को इस्तीफा भेजा था।
  • इन 22 विधायकों ने औसतन 15% वोट के अंतर से जीत दर्ज की थी, डबरा सीट से जीतीं इमरती देवी सबसे ज्यादा 57,446 वोटों से जीती थीं
  • बागी विधायक हरदीप सिंह डंग ने सुवासरा सीट पर सबसे कम 350 वोटों से भाजपा के राधेश्याम को हराया था

भोपाल. मध्य प्रदेश से कांग्रेस के 22 बागी विधायक बेंगलुरु से लौटने का नाम नहीं ले रहे हैं। इनमें 6 बर्खास्त मंत्री भी शामिल हैं। विधानसभा स्पीकर ने इन छह मंत्रियों का इस्तीफा तो मंजूर कर लिया है, पर 16 विधायकों से खुद ही आकर इस्तीफा सौंपने को कहा है। इन विधायकों का इस्तीफा मंजूर हो जाता है तो उसके 6 महीने के भीतर ही उनकी खाली हुई सीटों पर उपचुनाव कराने होंगे। ऐसे में कांग्रेस के ये बागी विधायक अपनी-अपनी सीटों पर भाजपा के टिकट से दोबारा प्रत्याशी बन सकते हैं। हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि कांग्रेस के ये विधायक भाजपा की सदस्यता ले ही लेंगे और भाजपा सभी को टिकट दे ही देगी।


2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के ये 22 विधायक अपनी सीटों पर औसतन 15% वोटों के अंतर से जीते थे। वहीं, इन 22 में से 20 सीटों पर भाजपा प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे। 22 में से 11 सीटों पर जीत और हार का अंतर 10% से भी कम था। ऐसे में भाजपा यदि कांग्रेस के बागियों को टिकट देती है तो उसके पूर्व प्रत्याशी विरोध में मैदान में उतर सकते हैं।

कांग्रेस के विधायक बागी बनकर भाजपा को समर्थन दे रहे हैं। क्या वे फिर से चुनाव लड़ सकते हैं? इसको लेकर दो बातें सामने हैं...

1) दल-बदल कानून तो कहता है कि विधायक अयोग्य तो चुनाव नहीं लड़ सकते
1985 में राजीव गांधी की सरकार इस कानून को लाई थी। इसके तहत अगर कोई विधायक या सांसद पार्टी बदलता है तो उसकी सदस्यता भी खत्म हो सकती है। कर्नाटक में स्पीकर ने कांग्रेस-जेडीएस के 17 बागियों को इसी के तहत अयोग्य करार दिया था। अगर कोई विधायक-सांसद अयोग्य हो जाता है, तो वह बचे हुए कार्यकाल में दोबारा चुनाव नहीं लड़ सकता और न ही विधान परिषद का सदस्य बन सकता है।
इसका मतलब :  मध्य प्रदेश में स्पीकर ने 22 बागी विधायकों को अयोग्य करार दिया, तो वह बचे हुए कार्यकाल में दोबारा चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। मध्य प्रदेश विधानसभा का 14 महीने का कार्यकाल पूरा हो चुका है और 46 महीने का बचा है। यानी, जो विधायक अयोग्य होंगे, वे 46 महीनों तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।

2) लेकिन, कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- स्पीकर विधायकों को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकते
कर्नाटक में स्पीकर ने कांग्रेस-जेडीएस के 17 विधायकों को अयोग्य करार देने के साथ-साथ उनपर बचे हुए कार्यकाल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी थी। स्पीकर के इस फैसले के खिलाफ बागी विधायक सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए थे। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- स्पीकर ये तय नहीं कर सकता कि विधायक कब तक चुनाव नहीं लड़ सकता। इसके बाद 17 में से 15 विधायक चुनाव लड़े थे, उनमें से 12 जीते भी थे।
इसका मतलब : अगर मध्य प्रदेश में भी बागी विधायकों पर बचे हुए कार्यकाल में चुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई, तो ये कर्नाटक मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ होगा। हो सकता है कि बागी विधायक इसके खिलाफ कोर्ट भी जाएं और कोर्ट फिर यही बात कहे और बागियों को चुनाव लड़ने की इजाजत दे दे। 

चुनौती : अगर कांग्रेस के बागी विधायक दोबारा चुनाव लड़े, तो भाजपा ही मुश्किल बनेगी
जाहिर सी बात है कि कांग्रेस के 22 बागी विधायक अगर दोबारा चुनाव लड़ेंगे, तो वे उन्हीं सीटों से लड़ेंगे, जिससे वे 2018 के विधानसभा चुनाव में लड़े थे। पिछली बार तो ये विधायक कांग्रेस के टिकट पर खड़े हो गए थे, लेकिन इस बार उन्हें भाजपा की टिकट पर या भाजपा की मदद से लड़ना होगा। इसका मतलब हुआ कि इन सीटों से भाजपा के जो उम्मीदवार पिछली बार लड़े थे, उनका टिकट इस बार कटेगा। इससे इस बात की पूरी संभावना है कि जिन भाजपा नेताओं का टिकट कटेगा, वो सभी कांग्रेस से भाजपा में आए बागी विधायकों के लिए चुनौती बनेंगे ही बनेंगे।
इसका कारण भी है : ये 22 विधायक 2018 में जिन विधानसभा सीट से जीतकर आए थे, उनमें से 20 पर भाजपा दूसरे नंबर पर थी। यानी भाजपा के जो नेता इस बार इन सीटों से उपचुनाव नहीं लड़ पाएंगे, तो वो ऐसा तो नहीं चाहेंगे कि उनके वोट उसे मिले, जिसके खिलाफ वो पिछले बार लड़े थे।



22 बागी 14 जिलों से जीते, इनमें से 15 सिंधिया के गढ़ ग्वालियर-चंबल से हैं
कांग्रेस के 22 बागी विधायक मध्य प्रदेश के 14 जिलों से जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। इनमें मुरैना से 4, ग्वालियर से 3, अशोकनगर, शिवपुरी और भिंड से 2-2 हैं। इनके अलावा दतिया, देवास, रायसेन, इंदौर, गुना, सागर, मंदसौर, अनूपपुर और धार जिले से 1-1 हैं। ये विधायक 11 लोकसभा सीट पर असर डालते हैं। इनमें से करीब 15 विधायक ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ ग्वालियर-चंबल इलाके से जीते हैं। 

22 बागी विधायकों में से 10 पहली बार विधानसभा पहुंचे
पहली बार विधायक: रघुराज सिंह कंसाना, कमलेश जाटव, रक्षा सरोनिया, मनोज चौधरी, जजपाल सिंह जज्जी, सुरेश धाकड़, ओपीएस भदौरिया, गिरराज दंडौतिया, जसमंत जटावे, मुन्नालाल गोयल।
2 बार विधायक: महेंद्र सिंह सिसोदिया, रनवीर जाटव, हरदीप सिंह डंग, ब्रजेंद्र सिंह यादव।
3 बार विधायक: प्रद्युम्न सिंह तोमर, इमरती देवी, प्रभुराम चौधरी, गोविंद सिंह राजपूत, राजवर्धन सिंह।
4 बार विधायक: तुलसी सिलावट, ऐदल सिंह कंसाना।
5 बार विधायक: बिसाहूलाल सिंह।

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